



डॉ. एमपी शर्मा.
सनातन धर्म में जन्म और मृत्यु कोई अंतिम रेखा नहीं, बल्कि एक अनंत यात्रा के पड़ाव माने गए हैं। यहां मृत्यु को पूर्णविराम नहीं, बल्कि अल्पविराम समझा गया है। आत्मा अजर-अमर है, देह नश्वर। ऐसे में प्रश्न उठता है, जब यह देह आत्मा के प्रस्थान के बाद मात्र पंचतत्वों का समूह रह जाती है, तो उसका श्रेष्ठतम उपयोग क्या हो सकता है? इसी प्रश्न का आधुनिक, वैज्ञानिक और धर्मसम्मत उत्तर है, देहदान।
सनातन दर्शन आत्मा को प्रधान और देह को गौण मानता है। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है,
‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।’ अर्थात जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करती है। जब आत्मा देह को त्याग चुकी, तब वह देह केवल भौतिक आवरण मात्र रह जाती है। वह या तो अग्नि में विलीन होगी या समय के साथ मिट्टी में। यदि उसी देह से पहले चिकित्सा विद्यार्थियों को ज्ञान मिले, रोगियों को जीवन का अवसर मिले, तो इससे बड़ा लोककल्याणकारी कर्म और क्या हो सकता है?

सनातन परंपरा में दान को जीवन का सर्वाेच्च पुण्य माना गया है। अन्नदान से क्षुधा मिटती है, विद्यादान से अज्ञान, और अंगदान से जीवन रक्षक सहायता मिलती है। देहदान इन सभी का समन्वय है, यह विद्यादान भी है और जीवनदान भी। एक देह से दर्जनों भावी चिकित्सक सीखते हैं, सैकड़ों रोगियों के उपचार का मार्ग प्रशस्त होता है। यह मृत्यु के बाद भी समाज के लिए उपयोगी बने रहने का संकल्प है, जो सनातन चिंतन के मूल में निहित ‘परोपकाराय पुण्याय’ के सिद्धांत को साकार करता है।

देहदान को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि इससे अंतिम संस्कार और धार्मिक कर्मकांड बाधित हो जाते हैं। वास्तविकता इससे भिन्न है। चिकित्सा शिक्षा में देह के उपयोग के बाद सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया जाता है। परिवारजन अस्थि-संग्रह, अस्थि-विसर्जन, दसगात्र, द्वादशा, तेरहवीं, सवा महीने का घड़ा, छह माही जैसे सभी संस्कार श्रद्धा से कर सकते हैं। धर्मशास्त्र कहीं भी यह नहीं कहते कि केवल तत्काल अग्नि संस्कार से ही मोक्ष संभव है। मोक्ष का मार्ग भावना, श्रद्धा और कर्म से प्रशस्त होता है, न कि केवल विधि से।

धर्मसम्मत तर्क स्पष्ट हैं। पहला, आत्मा प्रधान है, जब आत्मा चली गई, तब शरीर का श्रेष्ठ उपयोग ही सच्ची श्रद्धांजलि है। दूसरा, लोकहित सर्वाेपरि है, एक देह हजारों जीवन की गुणवत्ता सुधार सकती है। तीसरा, यह ऋषि परंपरा का आधुनिक रूप है। हमारे ऋषि-मुनियों ने त्याग, तप और बलिदान से समाज को दिशा दी। आज वही त्याग ज्ञान के लिए देहदान के रूप में प्रकट हो रहा है।

समाज में जागृति के लिए आवश्यक है कि देहदान को भावनात्मक और बौद्धिक दोनों स्तरों पर समझाया जाए। धर्मग्रंथों के संदर्भ, प्रतिष्ठित व्यक्तियों के उदाहरण, चिकित्सा महाविद्यालयों में देह के सम्मानजनक उपयोग की प्रक्रिया, और चिकित्सकों की दृष्टि कि एक देह से कितने डॉक्टर सीखते हैं, इन सबको सरल भाषा में रखा जाए। सबसे प्रभावी संदेश वह है, जो हृदय को छू जाए, ‘मृत्यु के बाद भी मैं किसी के जीवन का कारण बनूँ।’

देहदान को ‘अंतिम यज्ञ’ कहा जा सकता है। यह अग्नि में दी गई आहुति नहीं, बल्कि ज्ञान में दी गई आहुति है। यह वह सेवा है, जो मृत्यु के बाद भी जीवित रहती है। सनातन धर्म का सार ही यही है, सेवा, त्याग और लोककल्याण। जब देह अंततः पंचतत्व में मिलनी ही है, तो उससे पहले यदि वह चिकित्सा विद्यार्थियों के लिए ज्ञान का दीपक और रोगियों के लिए आशा की किरण बन जाए, तो इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है? देहदान धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म की आत्मा का विस्तार है। यह मृत्यु को अर्थ देता है और जीवन को दिशा। यही सनातन चिंतन की वास्तविक विजय है, जहां अंत भी एक नए आरंभ का कारण बनता है।
-लेखक पेशे से विख्यात सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



