



डॉ. अर्चना गोदारा.
भारतीय समाज को यदि किसी एक संस्था के माध्यम से समझा जाए, तो वह निःसंदेह परिवार है। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति जिन मूल्यों, संबंधों और जिम्मेदारियों के बीच जीता है, उनका पहला और सबसे गहरा अनुभव परिवार में ही होता है। यही कारण है कि भारतीय परिवार केवल निजी जीवन की व्यवस्था नहीं रहा, बल्कि सामाजिक संरचना की रीढ़ माना गया है। समय बदला है, परिस्थितियाँ बदली हैं, लेकिन परिवार आज भी समाज की संवेदनशील नब्ज़ बना हुआ है, हालाँकि उसका स्वरूप अब वैसा नहीं रहा, जैसा कुछ दशक पहले था।
एक समय था जब संयुक्त परिवार भारतीय जीवन का स्वाभाविक ढाँचा था। कई पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थीं और जीवन सामूहिकता के सिद्धांत पर चलता था। सुख-दुख साझा थे, जिम्मेदारियाँ बँटी हुई थीं और निर्णय व्यक्ति के नहीं, परिवार के होते थे। यह व्यवस्था भावनात्मक सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक स्थायित्व भी प्रदान करती थी। संकट की घड़ी में परिवार व्यक्ति के लिए सबसे मजबूत सहारा बनता था। आज पीछे मुड़कर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि उस व्यवस्था में अनुशासन और संरक्षण दोनों थे, लेकिन साथ ही सीमाएँ भी थीं।
समय के साथ औद्योगीकरण, शिक्षा और रोज़गार के नए अवसरों ने परिवार की इस संरचना को बदलना शुरू किया। गाँवों से शहरों की ओर बढ़ते कदम केवल भौगोलिक बदलाव नहीं थे, वे जीवन-दृष्टि के बदलाव भी थे। एकल परिवार का उदय इसी परिवर्तन का परिणाम है। जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि आज भारत में बहुसंख्यक परिवार एकल स्वरूप में रह रहे हैं। यह बदलाव सुविधा और स्वतंत्रता तो लाया, लेकिन इसके साथ भावनात्मक दूरी और संवाद की कमी भी धीरे-धीरे उभरने लगी।
आधुनिक परिवार ने व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अवसर दिया। महिलाओं की शिक्षा और कार्य-भागीदारी ने पारिवारिक संबंधों को अधिक समानतापूर्ण बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। विवाह अब केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि साझेदारी के रूप में देखा जाने लगा। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू भूमिकाओं की परिभाषाकृसब कुछ पुनर्गठित होने लगा। यह परिवर्तन आवश्यक भी था, क्योंकि समाज स्थिर नहीं रह सकता।
लेकिन यहीं एक मौन प्रश्न जन्म लेता है, क्या आधुनिकता ने रिश्तों को सरल बनाया या उन्हें जटिल कर दिया? आज परिवारों में साथ रहते हुए भी अकेलापन बढ़ा है। बुजुर्ग भावनात्मक उपेक्षा महसूस करते हैं, बच्चे समय से पहले परिपक्व हो जाते हैं और दांपत्य संबंधों में संवाद की जगह अपेक्षाएँ लेने लगती हैं। तकनीक ने संपर्क तो बढ़ाया है, पर निकटता कई बार कम होती दिखती है। यह विरोधाभास आज के परिवार की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है।
हिंदी साहित्य और सिनेमा ने इन बदलावों को केवल दर्ज ही नहीं किया, बल्कि उन्हें समझने का दृष्टिकोण भी दिया है। प्रेमचंद के साहित्य में परिवार सामाजिक यथार्थ का केंद्र था, जहाँ त्याग और कर्तव्य जीवन का आधार थे। वहीं समकालीन लेखन में परिवार एक ऐसे क्षेत्र के रूप में सामने आता है, जहाँ प्रेम के साथ-साथ तनाव भी मौजूद है। यह साहित्य हमें यह समझने में मदद करता है कि परिवार टूट नहीं रहा, बल्कि अपने अर्थ बदल रहा है।
सिनेमा भी इसी सामाजिक परिवर्तन का साक्ष्य है। पहले जहाँ परिवार को आदर्श और अटूट संस्था के रूप में दिखाया जाता था, वहीं आज की फिल्मों में उसके भीतर के संघर्ष, पीढ़ियों के बीच दूरी और बदलती संवेदनाएँ खुलकर सामने आती हैं। यह बदलाव नकारात्मक नहीं, बल्कि अधिक ईमानदार प्रतीत होता है, क्योंकि समाज को समझने के लिए उसका यथार्थ देखना आवश्यक है।
आज भारतीय परिवार परंपरा और आधुनिकता के बीच खड़ा है। परंपरा सामूहिकता, जिम्मेदारी और सहनशीलता की बात करती है, जबकि आधुनिकता स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और समानता पर ज़ोर देती है। समस्या तब पैदा होती है जब दोनों में से किसी एक को पूरी तरह नकार दिया जाता है। अंधी परंपरा व्यक्ति को कुंठित कर सकती है, और अति-व्यक्तिवाद रिश्तों को खोखला बना सकता है। समाधान टकराव में नहीं, संतुलन में है।
भविष्य का भारतीय परिवार शायद किसी तय ढाँचे में नहीं बँधा होगा। वह न तो पूरी तरह अतीत में लौटेगा, न ही बिना संदर्भ के पश्चिमी मॉडल अपनाएगा। वह एक ऐसा मानवीय स्थान बनेगा, जहाँ संवाद होगा, सहानुभूति होगी और हर सदस्य को सुना जाएगा। यदि परिवार इस संतुलन को साध सका, तो वह बदलते समय में भी भारतीय समाज की नैतिक और भावनात्मक नींव बना रहेगा। भारतीय परिवार की असली शक्ति उसकी अनुकूलन क्षमता में है। वह समय के साथ बदलता है, लेकिन टूटता नहीं। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है और शायद सबसे बड़ी आशा भी।
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं




