


पंडित रतनलाल शास्त्री.
धार्मिक परंपराओं में एक सूक्ष्म सत्य यह भी है कि संशय ही सर्वाधिक अधर्म का द्वार है। जब किसी शुभ कार्य को लेकर भ्रम फैलता है, तो वह श्रद्धा की स्थिरता को विचलित करता है। यही कारण है कि सत्संगों में संतजन बार-बार कहते हैं, अधिक संशय उत्पन्न करना और भ्रम फैलाना भी घोर पाप है।
दीपावली और लक्ष्मी पूजन की तिथि को लेकर जनमानस में ऐसा ही संशय उत्पन्न हुआ है। कुछ पंचांगों ने लक्ष्मी पूजन का मुहूर्त 20 अक्टूबर बताया है, जबकि अधिकांश ने 21 अक्टूबर 2025 को ही शुभ माना है। अब प्रश्न यह है कि कौन-सा दिन शास्त्रसम्मत है? कौन-सा दिन लोकपरंपरा के अनुकूल है?

वास्तव में, इस वर्ष अमावस्या तिथि दो दिनों में व्याप्त हो रही है, प्रारंभ 20 अक्टूबर को प्रदोष के पहले हो रही है और समाप्ति 21 अक्टूबर की रात्रि में। शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि अमावस्या प्रदोषव्याप्ता तु लक्ष्मीपूजनं प्रशस्तं भवेत अर्थात जिस दिन अमावस्या प्रदोष काल में हो, उसी दिन लक्ष्मी पूजन करना शास्त्रसम्मत माना जाता है। यही कारण है कि अधिकांश ज्योतिषीय पंचांगों ने लक्ष्मी पूजन 21 अक्टूबर 2025 को लगाया है, ताकि ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए सूत्रों और वृतियों का उल्लंघन न हो।
यदि 20 अक्टूबर को ही लक्ष्मी पूजन कर लिया जाए, तो अगले दिन 21 अक्टूबर के प्रदोष में भी अमावस्या रहेगी, जिससे तिथ्यांतर का संदेह बनेगा और ‘ष’ (शास्त्रीय निषेध) का उल्लंघन माना जाएगा। अतः 21 अक्टूबर 2025 को लक्ष्मी पूजन करना शास्त्राज्ञा का पालन कहा जाएगा।

हालाँकि, हमारे समाज में लोकाचार भी उतना ही महत्त्व रखता है जितना शास्त्राचार। लोकपरंपरा के अनुसार, जिस वार को होई अष्टमी का व्रत, उसी वार को दीपावली और लक्ष्मी पूजन होता है। इसलिए यदि किसी क्षेत्र या कुल-परंपरा में दीपावली का उत्सव 20 अक्टूबर को ही मनाया जा रहा है, तो उस दिन पूजन करने में भी कोई दोष नहीं है। दोनों दिन शुभ मुहूर्त बन रहे हैं और देवी महालक्ष्मी की कृपा दोनों दिवसों में समान रूप से प्राप्त हो सकती है।

अतः निर्णय यही बनता है कि जो श्रद्धालु 20 अक्टूबर को लोकपरंपरा अनुसार पूजन करना चाहें, वे पूर्ण विधि से करें। और जो शास्त्र सम्मत मार्ग का अनुसरण करना चाहें, वे 21 अक्टूबर 2025 को लक्ष्मी पूजन करें।
दोनों ही दिवस में माता लक्ष्मी की आराधना शुभ है, किंतु शास्त्रज्ञों का मत है कि शास्त्राज्ञा परंपरा से ऊँची होती है। फिर भी, जैसा कहा गया है, ‘विशेष ष गांव करे सो गैली करें’ अर्थात समाज और श्रद्धा के अनुरूप चलना ही सर्वाेत्तम है।
अंततः यही कहना उचित होगा कि दीपावली का सार तिथि में नहीं, भावना में निहित है। सच्चे मन, निर्मल भाव और सदाचार के साथ किया गया पूजन ही लक्ष्मीजी को प्रसन्न करता है। जो कोई भी श्रद्धा से, विधिपूर्वक, और विनम्रता से माता महालक्ष्मी का पूजन करेगा, वह दोनों लोकों में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त करेगा। तथास्तु।




