





ग्राम सेतु डेस्क
हिन्दी पंचांग का दूसरा मास वैशाख आते ही प्रकृति का मिज़ाज बदल जाता है। सूरज अपने पूरे तेज के साथ आकाश में विराजमान होता है, धरती तपने लगती है और मानव जीवन को संयम, सेवा और सतर्कता का पाठ पढ़ाने लगता है। यह महीना भारतीय जीवन-दृष्टि का जीवंत उदाहरण है, जहाँ ऋतु, आस्था और कर्म, तीनों एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। शास्त्रों में वैशाख मास को सर्वाेत्तम माना गया है। स्कंदपुराण का प्रसिद्ध श्लोक इसकी महिमा को स्पष्ट करता है,
न माधवसमो मासो
अर्थात वैशाख जैसा कोई मास नहीं, गंगा जैसी कोई तीर्थ नहीं और वेद जैसा कोई शास्त्र नहीं। यह कथन केवल धार्मिक भाव नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन का संकेत है। वैशाख हमें बताता है कि जब प्रकृति कठोर हो, तब मनुष्य को और अधिक करुणामय होना चाहिए।
यह मास पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और संयमित जीवन का प्रतीक है। ज्योतिषाचार्य डॉ. नीतीश कुमार वशिष्ठ के अनुसार, वैशाख में खान-पान और रहन-सहन पर विशेष ध्यान दिया जाए तो मौसमी रोगों से बचाव संभव है। यह समय शरीर और आत्मा, दोनों को शुद्ध करने का है। सुबह सूर्याेदय से पहले उठना, सूर्याेदय के समय स्नान करना, ये केवल धार्मिक नियम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के शाश्वत सूत्र हैं।
मान्यता है कि वैशाख मास में सभी तीर्थ और देवता जल में वास करते हैं। सूर्याेदय के समय स्नान करने से रोगों का नाश होता है और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। यह विश्वास हमें जल के महत्व की याद दिलाता है, वही जल, जो जीवन है और वही जल, जो इस मास में सबसे बड़ा दान बन जाता है।
वैशाख में जलदान को अक्षय पुण्य कहा गया है। एक घड़ा पानी, एक प्याऊ, एक प्यासे को दिया गया जल, ये छोटे कर्म नहीं, बल्कि महान यज्ञ हैं। कहा गया है कि जो स्वयं जलदान न कर सके, वह दूसरों को प्रेरित करे, इतना ही पर्याप्त है। इस मास में प्याऊ लगवाने वाला देवता, ऋषि और पितरों, तीनों को तृप्त करता है। जिसने एक व्यक्ति को भी पानी पिलाया, उसने त्रिदेवों की कृपा प्राप्त कर ली, बात इतनी सीधी और सटीक है।
गर्मी से त्रस्त राहगीर को छाया देना, प्यासे को पानी, नंगे पाँव को चप्पल, थके हुए को पंखा, ये सब दान नहीं, बल्कि मानवता के सहज कर्म हैं। शास्त्र कहते हैं कि वैशाख में इन दानों से दस हजार राजसूय यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है। यानी बिना शोर, बिना दिखावे, सीधा पुण्य खाते में जमा।
शास्त्रों के मुताबिक, नारद मुनि ने राजा अंबरीष को वैशाख मास के दान का महत्व बताते हुए कहा था कि इस माह में जलदान से पितर संतुष्ट होते हैं। छाता दान करने से मरणोपरांत आत्मा को शांति मिलती है, पंखा और खड़ाऊ का दान व्यक्ति को वैकुंठ की ओर ले जाता है। गरीबों को भोजन कराना, अन्नदान करना और आवश्यक वस्तुओं का दानकृये सब श्रीहरि की अनंत कृपा के द्वार खोलते हैं।
वैशाख को सर्वश्रेष्ठ मास कहे जाने के पीछे ज्योतिषीय कारण भी हैं। इस समय सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में और चंद्रमा उच्च राशि वृषभ में होते हैं। यह दुर्लभ संयोग वर्ष में केवल एक बार बनता है। इसी कारण इस मास में ग्रह-दोष, नक्षत्र-दोष और योग-करण का प्रभाव क्षीण हो जाता है। यानी यह महीना स्वयं में शुभता का कवच है।
पर वैशाख केवल पूजा-पाठ का नहीं, व्यवहार का भी मास है। यह हमें सिखाता है कि जब प्रकृति कठिन हो, तब मनुष्य को सरल बनना चाहिए। तपती धरती पर छाया बनना, जल बनना, यही वैशाख का असली संदेश है।
आज जब जीवन भाग-दौड़ और दिखावे में उलझ गया है, वैशाख हमें मूल पर लौटने की सीख देता है। कम में संतोष, अधिक में सेवा और हर हाल में मानवता। सच कहें तो वैशाख कोई मास नहीं, यह संस्कार है। जो इसे समझ गया, उसके लिए हर महीना पुण्य का अवसर बन जाता है।





