



शंकर सोनी.
आज के समय में पुल, सड़क, ओवरब्रिज और अन्य सार्वजनिक निर्माण कार्य केवल ईंट-गारे या कंक्रीट तक सीमित नहीं रह गए हैं। वे अब जनभावनाओं, राजनीतिक दावों और सोशल मीडिया की तीखी निगरानी के केंद्र में आ चुके हैं। हर निर्माण स्थल मानो एक खुला मंच बन गया है, जहाँ मोबाइल कैमरा, फेसबुक पोस्ट और व्हाट्सएप वीडियो के ज़रिये फैसले कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि लोकतंत्र, तकनीक और सत्ता-संतुलन के धीरे-धीरे बदलने का परिणाम है।
यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि एक समय सार्वजनिक निर्माण कार्य लगभग पूरी तरह नौकरशाही के नियंत्रण में हुआ करते थे। योजना बनाना, तकनीकी स्वीकृति, टेंडर प्रक्रिया और क्रियान्वयन सब कुछ विभागीय ढांचे के भीतर तय होता था। जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित, औपचारिक या अधिकतम अनुशंसात्मक मानी जाती थी। जनता की भागीदारी अप्रत्यक्ष थी और विवाद प्रायः फाइलों और बैठकों के भीतर ही सुलझ जाया करते थे।
पिछले कुछ वर्षों में यह संतुलन स्पष्ट रूप से बदला है। अब जनप्रतिनिधि केवल शिलान्यास या उद्घाटन तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे योजना के चयन, स्थान निर्धारण, डिजाइन, लागत और निगरानी तक सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं। लोकतांत्रिक दृष्टि से यह अस्वाभाविक भी नहीं है, क्योंकि जनप्रतिनिधि सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। जनता की अपेक्षा भी यही है कि उसका चुना हुआ प्रतिनिधि हर स्तर पर हस्तक्षेप करे और निगरानी रखे।
समस्या तब पैदा होती है, जब यह बढ़ी हुई राजनीतिक भूमिका प्रक्रिया, नियमों और तकनीकी विवेक से टकराने लगती है। सार्वजनिक निर्माण केवल इच्छा या दबाव से नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग मानकों, सुरक्षा, भूगोल और दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। जब निर्णय तकनीकी विशेषज्ञता के बजाय तात्कालिक लोकप्रियता या सोशल मीडिया के दबाव में लिए जाने लगें, तब विकास की गुणवत्ता और स्थायित्व दोनों खतरे में पड़ जाते हैं।
इन बदलती परिस्थितियों के पीछे सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया है। पहले मतभेद होते थे, लेकिन वे संस्थागत दायरे में अधिकारी और जनप्रतिनिधि आपस में बैठकर सुलझा लेते थे। आज स्थिति यह है कि किसी सड़क की मोटाई, पुल की ऊँचाई, निर्माण में देरी या लागत बढ़ने का मुद्दा सीधे सोशल मीडिया पर आ जाता है। कुछ ही मिनटों में वीडियो वायरल हो जाता है और मामला तकनीकी चर्चा से निकलकर सार्वजनिक बहस, आरोप-प्रत्यारोप और कभी-कभी आंदोलन का रूप ले लेता है।
नागरिक सहभागिता लोकतंत्र की आत्मा है और इसमें कोई संदेह नहीं कि सोशल मीडिया ने आम नागरिक को आवाज़ दी है। लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। आधी-अधूरी जानकारी, भावनात्मक आरोप और त्वरित निष्कर्ष कई बार प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं। अधिकारी अपने बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं, जनप्रतिनिधि सत्तापक्ष-विपक्ष के चश्मे से मुद्दे को देखने लगते हैं, और जो मामला आपसी संवाद से सुलझ सकता था, वह टकराव और बयानबाज़ी में बदल जाता है।
निर्माण और विकास कार्यों में पारदर्शिता आवश्यक है, लेकिन तमाशा नहीं। जवाबदेही होनी चाहिए, पर निर्णय विशेषज्ञता, नियम और दीर्घकालिक जनहित के आधार पर हों। सोशल मीडिया अदालत नहीं हो सकता और न ही हर तकनीकी निर्णय जनमत-संग्रह से लिया जा सकता है। विकास कार्यों को भावनाओं के नहीं, विवेक के सहारे आगे बढ़ना होता है।
समाधान टकराव में नहीं, संतुलन में है। सरकारी योजनाएँ ईमानदारी और स्पष्ट उद्देश्य के साथ जनहित को ध्यान में रखकर बनाई जाएँ। अधिकारी तकनीकी रूप से सक्षम और नैतिक रूप से दृढ़ रहते हुए योजनाओं को समय पर और गुणवत्ता के साथ अंजाम तक पहुँचाएँ। जनप्रतिनिधि हस्तक्षेप नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और निगरानी की भूमिका निभाएँ। नागरिक निगरानी करें, लेकिन तथ्य, मर्यादा और जिम्मेदारी के साथ। मीडिया और सोशल मीडिया संवाद का माध्यम बनें, संघर्ष का हथियार नहीं।
यदि यह संतुलन नहीं साधा गया, तो विकास कार्य जनहित के साधन न रहकर सत्ता, दबाव और प्रदर्शन का अखाड़ा बनते चले जाएँगे। अंततः इसका नुकसान न अधिकारी का होगा, न नेता का, बल्कि उसी आम नागरिक का होगा, जिसकी आवाज़ के नाम पर यह सारा शोर मचाया जा रहा है। विकास रुकता है तो सबसे पहले रोज़मर्रा का जीवन ठहरता है, और वही असली कीमत है, जो समाज को चुकानी पड़ती है।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं



