






डॉ. एमपी शर्मा
चारों ओर हवन कुंडों से उठती अग्नि की लपटें, घी और समिधा की सुगंध से भरी हवा, और एक लय में गूंजता गायत्री मंत्र। यह सब मिलकर वातावरण को साधारण से असाधारण बना देता है। मंत्रोच्चार की ध्वनि केवल कानों तक नहीं रुकती, वह सीधी हृदय में उतरती है, जैसे भीतर जमी धूल को परत-दर-परत साफ कर रही हो। साधकों के चेहरे पर सहज शांति, आंखों में स्थिरता और देह-भाषा में अद्भुत संतुलन दिखता है। कोई आंखें मूंदे ध्यान में लीन है, कोई आहुति अर्पित करते हुए पूर्ण समर्पण में, तो कोई मंत्र की तरंगों में अपने तनाव, भय और संशय को चुपचाप बहा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि शब्द अब केवल उच्चरित नहीं हो रहे, बल्कि ऊर्जा बनकर साधकों के मन, शरीर और चेतना को सकारात्मकता से भर रहे हैं और यज्ञ स्थल एक साथ साधना, विश्वास और आशा का स्पंदित केंद्र बन गया है।
राजस्थान की पवित्र नगरी पुष्कर सदियों से तप, त्याग और साधना की धरती रही है। यहां की रेत, जल और वायु में अध्यात्म रचा-बसा है। ऐसे ही दिव्य वातावरण में परम श्रद्धेय स्वामी श्री प्रखरजी महाराज के सान्निध्य में आयोजित ‘शत गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ’ केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवता के लिए किया गया एक बड़ा और गहरा संकल्प है। यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि जब हालात बिगड़ते हैं, तब रास्ता अक्सर भीतर से निकलता है।
सनातन परंपरा में गायत्री मंत्र को यूं ही ‘वेदमाता’ नहीं कहा गया। यह कोई जादुई पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली ऊर्जा है। कहा जाता है कि गायत्री मंत्र व्यक्ति की सोच को शुद्ध करता है, मन को स्थिर करता है और कर्म को संयमित करता है। आज जब मन भटकता है, गुस्सा जल्दी आता है और धैर्य जल्दी टूटता है, तब यह मंत्र हमें ठहरना सिखाता है। यही इसकी असली ताकत है।
अक्सर लोग पूछते हैं, पुरश्चरण आखिर होता क्या है? सरल भाषा में कहें तो यह मंत्र साधना का अनुशासित तरीका है। निश्चित संख्या में जप, हवन, तर्पण और सेवाकृसब कुछ नियम, संयम और संकल्प के साथ। अब सोचिए, जब यह साधना ‘शत’, यानी सौ गुना स्तर पर हो, और हजारों साधक एक साथ करें, तो उसकी ऊर्जा कितनी व्यापक होगी। यही कारण है कि इस महायज्ञ का प्रभाव केवल साधक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और वातावरण तक फैलता है।
यह आयोजन अग्नि में आहुति डालने तक मात्र तक सीमित नहीं है। इसके उद्देश्य सीधे आज की दुनिया से जुड़े हैं। आज दुनिया डर और असुरक्षा से घिरी है। यह यज्ञ नकारात्मकता को शांत करने और सकारात्मक ऊर्जा फैलाने का प्रयास है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल श्लोक नहीं, जीने का तरीका है। यह महायज्ञ पूरी मानवता की सुख-शांति के लिए है। ज्ञान, संस्कार और नैतिकता के वाहक वर्ग का सशक्त होना समाज को सही दिशा देता है।
पुष्कर कोई सामान्य तीर्थ नहीं है। यह ऊर्जा का केंद्र है। यहां ब्रह्मा मंदिर सृष्टि के सृजन का प्रतीक है। ऐसी भूमि पर जब सामूहिक साधना होती है, तो उसका असर दूर-दूर तक जाता है। यह केवल आस्था का सवाल नहीं, अनुभव का विषय है। जो यहां आता है, वह कुछ न कुछ भीतर बदलकर लौटता है।
हम विज्ञान और तकनीक में बहुत आगे बढ़ गए हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन साथ ही तनाव, अवसाद, हिंसा और अकेलापन भी बढ़ा है। ऐसे में यह महायज्ञ हमें साफ संदेश देता है, सिर्फ बाहरी तरक्की काफी नहीं, भीतर की शांति भी जरूरी है। कानून से समाज चलता है, लेकिन संस्कार से टिकता है हर समस्या का हल बाजार में नहीं, कुछ समाधान साधना में भी हैं।
इस आयोजन से हम सब कुछ न कुछ सीख सकते हैं। रोज़मर्रा की जिंदगी में प्रार्थना और ध्यान के लिए थोड़ा समय निकालें। समाज में सहिष्णुता, सेवा और सद्भाव बढ़ाएं। बड़े बदलाव के लिए छोटे-छोटे सकारात्मक प्रयास करें। सचमुच, ‘शत गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ’ दरअसल एक आध्यात्मिक आंदोलन है। यह हमें अपने आप से, समाज से और परमात्मा से जोड़ता है। जब हजारों कंठों से एक साथ गायत्री मंत्र गूंजता है, तो वह केवल आवाज़ नहीं रहती, वह ऊर्जा बन जाती है। ऊर्जा, जो शांति फैलाती है। ऊर्जा, जो प्रेम जगाती है। और ऊर्जा, जो यह भरोसा दिलाती है कि अंधेरे चाहे जितने गहरे हों, दीप जलाने की परंपरा अभी ज़िंदा है।
-लेखक पेशे से विख्यात सर्जन, आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं






