



रूंख भायला.
राजी राखै रामजी! आज बात गांधी जी री, राजस्थानी में गांधीजी अर वां रै गांधीवाद माथै कांई लिखिज्यो है, आज इणी बात नै लेय’र पोथी पानड़ा फिरोळस्यां। कहीजै ‘ज्यांरी सोभा जगत में, वांरो जीवण धन्न’। सीधो-सादो दीसतो, हाड मांस रो अेक अेहड़ो ही मिनख, जिण नै कोई गोळी नीं मार सकी, जिको देस अर समै री सीवां सूं पार जाय’र अेक विचार बणग्यो, जिण री सोरम लगोलग बध रैयी है। छेवट उण में इसी कांई बात है जिकी उण नै मोहनदास सूं गांधी बणावै ? क्यूं आइंस्टीन नै कैवणो पड़ै कै ‘आवण आळी पीढयां स्यात ई इण बात रो भरोसो करैली कै धरती पर हाड मांस रो अेहड़ो कोई मिनख जलम्यो हुवैला’? कुण है ओ गांधी ? अर कांई है उणरो गांधीवाद ?, आज रै अबखै बगत में, जद कै दुनिया रा मानीता देस नूवां बम, तोप, गोळा अर मिसाइलां बणावण री आंधी दौड़ में भाज रैया है, गांधी अर उणरी दीठ माथै बंतळ होवणी ई चाइजै।

साबरमती आश्रम रै अेक कमरै में गांधी सारू आखी दुनिया सूं आयोड़ा कागद पत्तर भेळाकर’र राखीज्या है। आजादी री लड़ाई रै वां दिनां रो अेक अेहड़ो ई कागद अमेरिका सूं वांरै किणी हेताळू रो है जिण माथै ठिकाणो माण्ड्योड़ो है ‘गांधी, व्हैयर ही इज’ यानी गांधी हुवै जठैई। आखो मुलक जिण रो ठिकाणो हुवै, उण महामानव रो जस भूगोल री सींवा में कद बंधै। इस्या भोत सा कागद है जिका साख भरै कै गांधी अर उण रा विचार भारत री आजादी सूं पैली सात समंदरां पार लोक मानस में जाय उतर्या।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ‘द रोल ऑफ महात्मा गांधी इन इण्डियन इंडिपेंडेंस हिस्ट्री’ में लिखै-‘वां रै मांय कीं तो निरवाळी बात है जिकी वान्नै आपरै बगत रै दूजै नेतावां सूं अळघो मुकाम दिरावै। और वा बात है गांधी रो लोक सूं आत्मिक जुड़ाव, जिण रै कारणै वां फगत मांसाहार छोड़ बकरी रो दूध पीवणो ई सरू नीं करयो बल्कि लोक नै उघाड़ो फिरतां देख आपरा सूट-बूट ई बगाय’र लंगोटी धार ली।’ कदास ओ ई कारण सैं सूं मोटो हो कै आपरै बिच्चाळै आप जेहड़ो आदमी देख लोगां गांधी अर उणरी बात नै सिर माथै धर लिन्ही।

गांधी रा विचार, जिणां नै गांधी दरसण या गांधीवाद कहीजै, वै भारतीय जनमानस सारू जाबक ई नूंवां का ओपरा नीं है। गांधी रै जलम सूं पैली ही गांधीवादी विचारधारा आपणी संस्कृति री पिछाण रैयी है। भगवद्गीता, सनातनी संस्कृति, जैन अर बौद्ध धर्म रै मूळ सूं ही गांधी रा विचार उपज्या है। पण जिकी बात गांधी अर उणां रै विचारां नै गांधीवाद रो रूप दिरावै, बा आ है कै गांधी फगत ऊंचौ आदरसां री बात नीं करी बल्कि वान्नै बरताव में ल्यावण रा मारग भी साम्ही राख्या। सांच अर अहिंसा गांधीवाद रो मूळ है। गांधी कैवता ‘जठै सांच है, बठै भगवान है अर नैतिकता उण रो आधार है’। परेम अर उदारता री पराकाष्ठा नै गांधी अहिंसा बतायो है जिकी मिनख नै कदेई मन, वाणी अर कर्म सूं भी किणी रो बुरो नीं करणै री सीख दिरावै।

राजस्थानी साहित मायं गांधीवाद री बात करां तो ठाह लागै कै इण दरसण रा मूळ विचार तोे अठै री जूनी लोक संस्कृति में जुगां सूं लाधै। गांधीजी जॉन रस्किन री पोथी ‘अनटू दिस लास्ट’ सूं सर्वाेदय रै जिण सिद्धांत नै आपरै जीवन में उतार्याे वो आपणै वृहदारण्यक उपनिषद् रै इण सुक्त में लाधै ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःख भाग भवेद’। इणी ढाळै ‘मनसा, वाचा, कर्मणा’ किणी नै दुख नीं देवण री बात छान्दोग्य उपनिषद में लाधै, जठै सूं गांधी अहिंसा रै मारग पर चालण री बात करै। जैन धर्म में तो अहिंसा पंच महाव्रतां रो मूळ है। ‘नंई सांच नै आंच’ का फेर ‘संाच बरोबर तप नहीं, झूठ बरोबर पाप’ आपणै बडेरां री सीख हैै जिण सूं गांधीवाद जलम लेवै। इणी भांत बिसनोई पंथ में अहिंसा री बात करता थकां गुरू जाम्भोजी फरमावै ‘पाणी वाणी ईंधणी, दूध ज लीजै छाण’।

आधुनिक राजस्थानी साहित री ख्यात रा पानां फरोळां तो ठाह लागै कै राजस्थानी रा जगचावा कवि कन्हैयालाल सेठिया गांधी रै विचारां सूं खासा प्रभावित हा। 1940 में वां आपरी पैली पोथी ‘रमणियां रै सोरठा’ में गांधी री बात नै आगै बधावतां थकां लिखियो कै-
चरखो सांचो सस्त्र, मिटै गरीबी देस की
छोड़ विदेसी वस्त्र रैजी धारो रमणिया
इणी भांत लोक कवि उदयराज उज्ज्वळ लिखै कै-
जग मांय मानवी परेम बधै
जुध रोकण धरती री धुन है
आ माया सगळी मोवन री
अहिंसावाद उदय धिन है

उज्ज्वळ आपरै सोरठां में गांधी रै विचारां नै भळै जन-जन तांई पुगायो। वां लिख्यो कै-
सतधारी पलटै समै, समय रहै उण संग
कळजुग रो सतजुग कियो, रंग मोहन नर रंग
गांधी बांथा घात, उंचा लिया अछूत नै
सत उजळ सरसात भारत रो मुख भानिया

रामेश्वरदयाल श्रीमाळी बावन छंदां में ‘बावनो हिमाळो’ नांव सूं गांधीवाद नै ढाळयो है तो नाथूदान महियारिया ‘गांधी सतक’ लिख नै गांधी अर उणां रै विचारां री महिमा बखाणी है। महियारिया लिख्यो कै –
फौजां रोकी फिरंग री तोकी नह तरवार
गांधी थे लिधो गजब, भारत रौ भुज भार
खग्ग नै लेतो हाथ में, सैल न लेतो पास
गांधी अनसन लेवतो लेतो फिरंग निसांस

कल्याणसिंह राजावत तो गांधी दरसण गांवतां थकां कैवै है कै-
जियो जमारो जग री जोतां, जग में करयो उजास रे
जुग जुग रै जोधां रै खातर खुद बणग्यो इतिहास रे।
चावा ठावा कवि गिरधारी सिंह पड़िहार गांधी री महिमा इण ढाळै गाई है –
वो संत लंगोटी वाळो हो चाल्यो बळतै अंगांरा में
जिण करमजोग रो महामन्त्र फूंक्यो खादी रै तारां में
वो नेह रूप नारायण हो निबळां रो घणो सहारो हो
धरती री आंख्यां रो तारो भारत माता रो प्यारो हो

डॉ. शक्तिदान कविया आपरै दूहां रै मिस गांधी दरसण नै भोत सांतरै ढंग सूं साम्ही राख्यो है-
सत्य अहिंसा शांति गांधी रो सिणगार
मिनखपणै सूं महात्मा सै पूजै संसार
छोटां नै छिटकावियां मोटां बधै न मान
आजादी री ओट में गांधी दिन्हो ज्ञान
मिलसी गामां मांयनै, असली भारत ओप
करसां री सेवा करण बापू दिन्हो बोध

राजस्थानी गद्य में भी गांधी रै विचारां नै लेय’र घणै सांतरै सिगै सूं रचाव हुयो है। जगचावा लिखारा अन्नाराम ‘सुदामा’ रो उपन्यास ‘मेवै रा रूंख’ तो गांधीवाद रा जीवता जागता चितराम पाठकां साम्ही राखै। छुआछूत माथै लिख्योड़ी मोहन आलोक री कहाणी ‘गमछो’ राजस्थानी गद्य में गांधीवाद रै प्रभाव नै बखाणै। इण कहाणी मांय पण्डतजी अर हीणजात री लुगाई रो घणो सरावणजोग संवाद साम्ही आवै। कहाणीकार चन्द्रजी भी आपरी कहाण्यां में नारी मुगती री गाथा नै उजागर करता थकां गांधी रै आदरसां नै साम्ही लावै। मधु आचार्य ‘आशावादी’ री नारी सुतंतरता माथै लिख्योड़ी कहाण्यां भी नारी मुगती री दीठ रो वो दिरसाव दिखावै जिणरी बात गांधीजी कर्या करता। डॉ। सोनाराम बिश्नोई लिखै ‘गांधी भारत रा गौरव गुमान तो बिस्वाबीस है ईज, पण समूळै संसार अर आखै मानव समाज नै सैंचन्नण करण वाळी जोत है।’ डॉ. मदन केवळिया ‘विस्व सांयती अर गांधी जी रो जीवण सास्त्र’ मांय लिखै कै ‘आज रै संसार मांय घणी आपाधापी है, संयम री कमी है। इण सूं मुगती सत्य, अहिंसा अर सर्वधर्म समभाव री दीठ सूं ई होय सकै, जिकी गांधी दरसण रो मूळ है।’

डॉ. आईदानसिंह भाटी, जिणां गांधी री आत्मकथा रो राजस्थानी मांय उल्थो करयो है। वांरी अेक लाम्बी कविता है जिण में गांधी अर उणां रै विचारां री बात भोत सांतरै ढंग से लिखिजी है-
वै आंख्या अपणापै आळी/पत्तां-पत्तां/डाळी-डाळी/गांव गोरवां/ओरण डांडी/रिनरोही मगरा अर घाटी/नगर नगर अर स्हैर स्हैर में/बांध लंगोटी हाथां लाठी/ओ कुण आयो/ ओ कुण आयो।।।।उण गांधी नै उण वामन नै/आवण वाळी अजरी पीढयां/आवण वाळै अजरै जुग में/परमाणु रै पळकां बिच्च/अंधकार इन्यावां बिच्च/अरथावैला, अपणावैला, गुण गावैला….
राजस्थानी साहित में गांधी रै विचारां नै आगै बधावंती रचनावां री कमी नीं है। युवा कवि ओम नागर रो बापू सिरै नांव रो ताजा कविता संग्रै अेक घणो महताऊ संग्रै है जिण में गांधीवाद माथै नूवीं दीठ री रचनावां है। नागर री कविता री बानगी देखो-बापू थांरी धौवती सूं/घणौ मेळ खावै छै/म्हारा भाईजी को पंज्यौ/उघाड़ा डील/थनै जै सपना बोया छा/वै ई सपना काट रैया छै/आज म्हारा भाईजी/न्हं थारी न्हं वांकी/दोन्यंूू की आतमा नै/कद ओढ्या छै गाभा/ बापू थारी आतमा का उजास सूं ई/सहचंनण छै यां धरणी….

मातभासा अर भणाई माथै गांधीजी दीठ नै देखणी हुवै तो डॉ। जितेन्द्र सोनी री पोथी ‘भणाई रो मारग’ साम्ही आवै। आ पोथी इण बात री साख भरै कै राजस्थानी साहित में गांधी अर उणारां विचार कित्ती महताऊ ठौड़ राखै। अठै तांई कै युवा गीतकार राजूराम बिजारणियां री बाल कवितावां मांय भी गांधी निगै आवै। बानगी देखो-
‘मां म्हानै अेक सुपनो आयो/सपनै में लाठी लियोड़ा/ऊंची सी धोती पेर्याेड़ी/अेनक गोळ लगायां/ सुणी मां ! लोग केवै बै आंधी हा/सुण लाडेसर ! बै गांधी हा’
कवि अशोक दीप री ओळ्यां ‘बापू! आपरो आणो/आणो नीं/जुग रो करवट लेणो हो’ राजस्थानी में बापू री महिमा रो सांचो चितराम है। ‘आजादी रा भागीरथ गांधी’ सिरैनावं सूं आयोड़ी संकलन पोथी में अस्सी सूं बेस्सी लिखारां री रचनावां है जिण मांय अतुल कनक री ‘गांधी बाबा सूं बात’, गिरधारीदान रत्नू री ‘सबसूं है मोहन सिरमोड़’ डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित री ‘मन रो महात्मा’, किरण राजपुरोहित री ‘वै अमर है भारत में’, महेन्द्रसिंह छायण री ‘अजै सुणीजै अम्बरां’, मोनिका गौड़ री ‘जागता रैया बापू रा सवाल‘, अर शिवराज भारतीय री ‘गांधी बाबा आवो नीं’ आद रचनावां खासा सरावण जोग है। राजस्थानी भासा मानता आंदोलन में भी गांधीवादी दीठ सांपड़दै निगै करी जा सकै जठै मायड़ भासा रा हेताळू अहिंसा अर सत रो मारग झाल्यां फगत धरणा, परदरसण अर सांयती सूं आपरी मांग उठावतां रैया है।

राजस्थानी साहित में गांधीवाद रो अेक दूजो पख भी है। अठै गांधीवाद रा कूड़ा सांग भरणियां री भी खासा खिंचाई होई है। मोहम्मद सदीक साहब रो गीत ‘बाबा थारा बकरयां बिदाम खावै रै, चरगी म्हारा खेत सरे आम खावै रै’ इणी भाव नै अरथावै। ‘भूल करी जननायक भारी’ में जनकवि गणेशीलाल उस्ताद तो अहिंसा सूं ही सवाल करता थकां कैवै-’बिकै क्यूं मिनखपणो बेमोल/बोल अहिंसा बोल/पतळो पड़ग्या सत रा बोल/बोल अहिंसा बोल’। गांधी रै नांव री ओट लियां ओछी राजनीति करणियै नेतावां रा रंग ढंग देख कवि कानदान कल्पित तो आपरी रचना मांय गांधीजी नै भळै भारत मांय नीं आवण री सीख तकात दे मेल्ही है। ‘म्हां की मानो तो गांधीजी/भारत में भूल‘र मत आज्यो’ कल्पित री अेक चावी-ठावी कविता है। डॉ.तारालक्ष्मण गहलोत भी इणी कड़ी मांय ‘गांधी जी सूं’ बंतळ करतां लिखै-‘हे सत्य रै मारग रा मारगू/थारै नांव सूं रोटी सेकणियां/भ्रष्टाचार मांय लिप्त होय’र/आपरा घर भर रया है आज/हे लाठी लंगोटीधारी/ थारा ही अनुयायी/अपरिग्रह न धतो बताय/कर रया है पीढयां रो जतन।
गांधी अर गांधीवाद पर अजेस कांई ठाह कित्ती बातां होवणी बाकी है। पण अेक बात तै है कै अहिंसा रो पाठ पढावणियै गांधी रा विचार बारूद रै ढेर पर खड़ी इण आखी दुनिया नै बचावण सारू हरमेस उभ्या रैवैला। डॉ। गजादान चारण री आं ओळयां साथै राजस्थानी साहित मांय गांधीवाद री बात सूं आज री हथाई नै पूरी करां-
हिमगिरी नै मत ताक हेताळू
हिमगिरी हेलो समझ सुजाण
गांधी नै मत देख गौर सूं
गांधी वाळी राह पिछाण !
बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थान व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं

