


डॉ. प्रियंका चाहर.
12 अक्टूबर 2024, एक शांतिपूर्ण विरोध की शुरुआत। स्थानीय लोगों और किसानों ने हनुमानग़ढ़ जिले के टिब्बी में लग रही एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ आवाज उठाई। बिना शोर, बिना हिंसा, बस अपने अस्तित्व और भविष्य की रक्षा के लिए। पर 18 नवंबर 2025 की सुबह इस संघर्ष ने एक कड़वी करवट ली। सुबह 5 बजे प्रशासन ने किसानों के घरों के दरवाज़े तोड़कर, दीवारें फांदकर गिरफ्तारियां कीं। यह वही तरीका है जो अपराधियों पर भी शायद ही कभी अपनाया जाता हो। सोए हुए लोगों को ऐसे उठाना जैसे वे कोई गिरोह चला रहे हों, न सिर्फ अमानवीय है, यह उन सभी नागरिकों के लिए चेतावनी है जो लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने की हिम्मत करते हैं।

इसी वजह से इलाके में गुस्सा स्वाभाविक है। क्योंकि सवाल कई हैं, और इनके जवाब सिर्फ हवा में नहीं झूल सकते। क्या अपने ही देश में अपनी सरकार से सवाल पूछना गुनाह हो गया? क्या आम नागरिकों को घरों से ऐसे घसीटना ही अब व्यवस्था की ‘नई नीति’ बन गई है? क्यों पिछले कुछ वर्षों से किसानों को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है? अपने जल, जमीन और पर्यावरण की रक्षा करना अपराध कब से बन गया? और सबसे अहम, दुनिया जहां एथेनॉल प्लांट्स के नुकसान देखकर उसे रोकने की तैयारी कर रही है, वहीं हमारी सरकार इसे क्यों बढ़ावा दे रही है?

इसका जवाब तकनीकी भी है और राजनीतिक भी। एथेनॉल, अनाज अल्कोहल, गन्ने और मक्के से बनता है। एक टन गन्ने से 90 लीटर एथेनॉल और 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 3000 लीटर पानी खपत। कल्पना कीजिए, 3000 लीटर। पानी संकट वाले इलाकों में यह किसी सज़ा जैसा है। ऊपर से डिस्टिलेशन से निकलता हुआ बेहद प्रदूषित पानी, जिसे जमीन में डाल दिया जाता है, भूमिगत जल को जहरीला बनाता है। संगरिया-टीबी जैसे संवेदनशील, पहले से कैंसर-प्रभावित क्षेत्र में यह सीधा खतरा है। यही वजह है कि लोग विरोध कर रहे हैं, किसी राजनीतिक निर्देश पर नहीं, बल्कि अपनी सांसों और अपनी मिट्टी को बचाने के लिए। जो रिपोर्टें सामने आई हैं वे स्थिति को और डरावना बनाती हैं। यूरोपियन केमिकल एजेंसी ने अपनी 10 अक्टूबर की रिपोर्ट में कहा कि एथेनॉल प्लांट से निकलने वाली गैसों में कैंसरकारक तत्व पाए जाते हैं।

पर्यावरण अखंड परियोजना की 2024 रिपोर्ट बताती है, हेक्सेन, नाइट्रेट, एक्रोलेन, एसीटेल्डहाइड, ये गैसें न सिर्फ हवा जहरीली करती हैं, बल्कि कैंसर, न्यूरोलॉजिकल समस्याएं, आंखों में जलन, जन्मजात विकृतियां और पर्यावरणीय असंतुलन फैलाती हैं। ग्रीनहाउस गैसों में योगदान अलग। ऐसे में संगरिया और टिब्बी क्षेत्र में प्लांट लगाना आग में घी डालने जैसा है, जहां लोग पहले ही कैंसर की भारी मार झेल रहे हैं। सवाल उठता है, सरकार इसे बढ़ावा क्यों दे रही है? फॉर्मूला बड़ा सरल है, व्यापारिक हित। देश के दो बड़े एथेनॉल प्लांट केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बेटों, निखिल और सारंग गडकरी के नाम पर चल रहे हैं। भारत प्लस एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड अजय सिंह देख रहे हैं। जब राजनीति और पूंजी हाथ मिला लें, तब आम जनता की सुरक्षा अक्सर पीछे छूट जाती है। संगरिया-टिब्बी इसका ताजा उदाहरण बनता दिख रहा है।

पंजाब सरकार ने तो एनजीटी के सामने साफ स्वीकार किया कि एथेनॉल फैक्ट्री हवा, पानी और मिट्टी बर्बाद कर रही है, और फिरोजपुर के जीरा में प्लांट को “रोग इंडस्ट्री” कहकर स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। तीन साल का संघर्ष और जनता की जीत।
अगर सरकार सच में इस क्षेत्र का विकास चाहती है, तो विकल्पों की कमी नहीं। लंबे समय से लंबित राइस मिल की मांग पूरी की जा सकती है। हनुमानगढ़ की बंद पड़ी स्पिनिंग मिल को दोबारा शुरू किया जा सकता है। ऐसे उद्योग लगाए जा सकते हैं जो रोजगार भी दें और वातावरण को नुकसान भी न पहुँचाएँ। लोग विकास के विरोधी नहीं हैं। विरोध सिर्फ उस विकास का है जो जीवन, मिट्टी, पानी, हवा और आने वाली पीढ़ियों को दांव पर लगा दे। कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि संघर्ष अभी जारी है। जब तक सांसें सुरक्षित नहीं, तब तक आवाजें उठती रहेंगी।
-लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं


