


शंकर सोनी.
हम 1947 में आज़ाद हुए थे। कम से कम किताबें तो यही कहती हैं। झंडा बदला, गान बदला, शासक बदले, लेकिन शासन की रीढ़ वही रही, डंडे वाली। अंग्रेज गए, लेकिन उनकी बनाई अफसरशाही की आत्मा यहीं रह गई। फर्क बस इतना है कि अब हुक्म अंग्रेजी में नहीं, हिंदी में लिखे जाते हैं। ब्रिटिश राज ने अफसरशाही इसलिए बनाई थी कि भारतीय जनमानस को नियंत्रित रखा जा सके। जनता सवाल न करे, आदेश माने। अफसर गवर्नर जनरल के प्रति जवाबदेह थे, जनता के प्रति नहीं। हैरानी यह है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी यही मानसिकता जीवित है। लोकतंत्र की टोपी पहनकर औपनिवेशिक सोच का जूता पहना हुआ है।
सबसे बड़ा मज़ाक है अभियोजन स्वीकृति का कानून। मतलब साफ है, अगर कोई अफसर घूस खाता है, फाइल दबाता है, नियम तोड़ता है, तो उस पर मुकदमा भी सरकार की मर्जी से ही चलेगा। यानी चोर से पूछकर ताला लगाना। इससे बड़ी विडंबना लोकतंत्र में और क्या होगी?
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19(ए) इस तंत्र का कवच नहीं, कवच के ऊपर कवच है। कोई जागरूक नागरिक अगर हिम्मत करके सिस्टम से टकरा जाए, तो उसे सालों तक अनुमति की भीख मांगनी पड़ती है। कई बार तो फाइल कब्र में ही चली जाती है। अफसर रिटायर हो जाता है, शिकायत बूढ़ी हो जाती है और न्याय मर जाता है।
यह ताकत अब सिर्फ़ सचिवालयों तक सीमित नहीं है। पटवारी, सिपाही, क्लर्क, कनिष्ठ अभियंता, हर स्तर पर छोटे-छोटे साम्राज्य खड़े हैं। एक दस्तखत, एक मुहर, एक फाइल और नागरिक महीनों घूमता रहता है। काम नहीं होता, चक्कर जरूर लगते हैं। यही वह प्रयोगशाला है जहाँ भ्रष्टाचार तैयार होता है।
हम अक्सर कहते हैं कि सिस्टम खराब है। सच यह है कि सिस्टम खराब नहीं, सिस्टम को खराब होने दिया गया है। अफसरशाही का केंद्रीकरण इतना बढ़ गया है कि निचला कर्मचारी भी खुद को सत्ता समझने लगा है। जनता अब मालिक नहीं, याचक बन गई है।
और जनप्रतिनिधि? स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक अपराधियों की मौजूदगी किसी से छिपी नहीं। बेईमान नेता और बेलगाम अफसर, यह गठजोड़ लोकतंत्र की कब्र खोदने के लिए काफी है। एक कानून बनाता है, दूसरा उसे तोड़ता है। और जनता बीच में पिसती है।
न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है, लेकिन सच यह भी है कि वह पूरी तरह दूध की धुली नहीं रही। अपवाद होंगे, ईमानदार जज होंगे, लेकिन व्यवस्था के स्तर पर भरोसा कमजोर हुआ है। जब हर स्तंभ में दरार दिखने लगे, तो इमारत गिरने में देर नहीं लगती।
हम हर साल गणतंत्र दिवस पर परेड देखते हैं, झंडा फहराते हैं, भाषण सुनते हैं। कैमरे चमकते हैं, देशभक्ति बहती है। लेकिन अगले ही दिन वही अफसर, वही फाइल, वही घुमाव, वही बेबसी। आज़ादी अगर सिर्फ़ समारोहों में दिखे और ज़िंदगी में नहीं, तो उसे आज़ादी कहना आत्म-धोखा है। हकीकत यह है कि हमारी आज़ादी संविधान में कैद है। काग़ज़ों पर अधिकार हैं, ज़मीन पर अफसर। लोकतंत्र किताबों में है, सत्ता कुर्सियों पर। जनता लाइन में है, सिस्टम एयरकंडीशन में।
जब तक जनप्रतिनिधियों और अफसरशाही को सच में जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह देश काग़ज़ी लोकतंत्र बना रहेगा। पारदर्शिता, समयबद्ध काम और सख़्त जवाबदेही, ये भाषण की चीज़ नहीं, व्यवस्था की ज़रूरत हैं। अभियोजन स्वीकृति जैसे कानूनों की आड़ में अफसरों को अभयदान देना बंद करना होगा। वरना होता यही रहेगा, ईमानदार डरता रहेगा, बेईमान अकड़ता रहेगा। सच कड़वा है, लेकिन साफ है। हमने अंग्रेजों से सत्ता छीनी थी, व्यवस्था नहीं। अब वक्त है कि हम व्यवस्था भी वापस लें। वरना आने वाली पीढ़ियाँ भी यही कहेंगी, देश आज़ाद है, नागरिक नहीं।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता हैं



