



ग्राम सेतु ब्यूरो.
लोकतंत्र हमेशा उन जिद्दी आत्माओं से जीवित रहता है जो अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर देती हैं। कॉमरेड हेतराम बेनीवाल ऐसी ही आत्मा थे। 94 वर्षों की दीर्घ जीवन-यात्रा में उन्होंने कई बार सत्ता के अहंकार को चुनौती दी, राजशाही के विरुद्ध आवाज उठाई, आपातकाल की जेल काटी और किसान-मजदूर के हक के लिए उम्र के आख़िरी पड़ाव तक मैदान में डटे रहे। उनका देहावसान केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि जन आंदोलनों के एक पूरे अध्याय का विराम है।
कॉमरेड हेतराम बेनीवाल का जन्म 16 अक्टूबर 1932 को पंजाब में सीतो गुनो के पास गांव सुखचैन में चौधरी रामप्रताप बेनीवाल के घर हुआ। परिवार बड़ा था। तीन छोटे भाई हनुमान राम, ओमप्रकाश और रामकुमार; दो बहनें रामेश्वरी देवी और भागवंतीदेवी। आगे चलकर उनका अपना परिवार भी भरा-पूरा रहा। दो पुत्र डॉ. आनंद बिश्नोई और सीए सुनील बेनीवाल, एक पुत्री कल्पना तथा पौत्र-पौत्रियों की अगली पीढ़ी। डॉ. आनंद लगभग तीन दशकों से अमेरिका में रहते रहे, पर पिता की जमीन से जुड़ी लड़ाइयों की गूंज परिवार के भीतर हमेशा बनी रही।
1943-44 में उनका परिवार श्रीगंगानगर के पास गांव दूल्हपुरा आ गया। यहीं से जीवन की वह धारा बहनी शुरू हुई, जिसने एक छात्र को आंदोलनकारी और आंदोलनकारी को जननेता बनाया।
श्रीगंगानगर के हिंदी-अंग्रेजी माध्यम के सरकारी स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही उनकी कुशाग्रता और साहस के संकेत दिखने लगे थे। छात्रावास में रहते हुए उन्होंने सत्ता-संरचनाओं पर सवाल करना सीख लिया था। वरिष्ठ पत्रकार अशोक जलंधरा कहते हैं, ‘गंगासिंह की मृत्यु पर सामूहिक केश-मुंडन के दौरान हेतराम बेनीवाल ने मुखर विरोध किया। उस वक्त उनकी उम्र छोटी थी लेकिन ‘बाप सार्दूले का मरा है, मैं क्यों सिर मुंडाऊं’ कहकर उन्होंने राजशाही मानसिकता के विरुद्ध प्रतिरोध का उद्घोष कर दिया था। सार्दूलसिंह के महाराजा बनने पर गंगानगर आगमन के दौरान ‘सार्दूली बाई वापस जाओ’ के नारे लगाते हुए छात्रों का नेतृत्व करना, आने वाले संघर्षों का पूर्वाभास था।’
बेनीवाल के संघर्षों के सहभागी रामेश्वर वर्मा कहते हैं, ‘कॉमरेड बेनीवाल के जीवन में आंदोलन कोई अवसरवादी साधन नहीं, बल्कि नैतिक आवश्यकता थे। बीकानेर के डूंगर कॉलेज में छात्र नेता रहते हुए गेहूं निकासी आंदोलन में उनकी भूमिका ने उन्हें पहली गिरफ्तारी दिलाई। 1962 में फिर गिरफ्तारी हुई। आपातकाल के 18 महीने की कैद उनके लिए लोकतंत्र की कीमत चुकाने जैसा था। सरकारें बदलीं, पर उनका रुख नहीं। फरवरी 2018 में 84 वर्ष की उम्र में अंतिम बार गिरफ्तारी और जेल, यह बताने के लिए काफी है कि उम्र उनके लिए कभी बहाना नहीं बनी।’
किसान नेता प्रो. ओम जांगू कहते हैं, ‘भाखड़ा और राजस्थान नहर परियोजना क्षेत्रों में भूमिहीनों को सस्ती किश्तों में भूमि दिलाने के लिए उन्होंने अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया। 1971 का आंदोलन उनकी पहचान का शिखर था। राज्य सरकार की हाईपावर कमेटी के सदस्य के रूप में उन्होंने एक लाख किसानों को एक-एक मुरब्बा भूमि दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।’
हाल के वर्षों में घड़साना के पानी आंदोलन और प्रथम चरण की नहरों को 5.23 क्यूसेक सीसीए पर यथावत रखने का संघर्ष उनकी विशिष्ट पहचान बना। हनुमानगढ़ और गंगानगर के किसान आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब एक दबंग लेकिन निष्कलंक नेता उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था।
वे संगरिया विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े और जीते भी। सत्ता उनके लिए साध्य नहीं थी; साधन भी नहीं। वे सदैव पीड़ितों, दलितों और गरीबों के हित की बात करते रहे। उनका बोलना बेबाक था, कभी-कभी असहज कर देने वाला, लेकिन हमेशा ईमानदार।
जाने-माने अधिवक्ता नवरंग चौधरी कहते हैं कि गत वर्ष जुलाई में भीषण गर्मी के बावजूद वे गंगासिंह चौक पर किसानों के बीच पहुंचे और हौसला बढ़ाया। यह दृश्य बताता है कि उनके लिए आंदोलन कोई स्मृति नहीं, वर्तमान था। 26 जनवरी को हुई अंतिम मुलाकात में उनका वाक्य, ‘पिछली शताब्दी लोकतंत्र के लिए लड़ते हुए गुजर गई, अब यह बचेगा भी या नहीं’ एक अनुभवी योद्धा की चिंता थी, भविष्य की चेतावनी भी।
दरअसल, कॉमरेड हेतराम बेनीवाल का जीवन हमें सिखाता है कि लोकतंत्र केवल संस्थानों से नहीं, नागरिक साहस से चलता है। वे चले गए, पर उनकी लड़ाइयाँ, उनके सवाल और उनकी निर्भीकता हमारे बीच रहेंगे। इतिहास उन्हें एक ऐसे जननेता के रूप में याद रखेगा, जिसने सुविधा की राजनीति नहीं, संघर्ष की परंपरा चुनी और अंत तक निभाई।







