


धीरेंद्र कुमार झा ‘धीरू’
मिथिलाक धरती सदिखन विद्या, साधना आ अध्यात्मक अनन्य केन्द्र रहल अछि। एहि धरतीसँ असंख्य महापुरुष जन्म लेला जे सम्पूर्ण भारतवर्षक ज्ञानधारा केँ दिशा दैत रहलाह। एहेनहि एकटा तेजस्वी आचार्य छलाह पंडित मंडन मिश्र, जे मीमांसा आ वेदांत दुनू दर्शनक संग-संग भारतीय संस्कृति आ दर्शनशास्त्रक गौरवशाली परम्पराक प्रतीक छथि। हुनक जीवन यात्रा, शास्त्रार्थ आ मौलिक ग्रंथ केवल विद्या-वैभवक चिन्ह नहि बल्कि मिथिला सभ्यताक गर्व सेहो अछि। कुमारिल भट्टक बाद हिनके मतकेँ प्रमाणित मानल जाइत छन्हि। अद्वैत वेदांत दर्शनमे सेहो हिनक मतक आदर छन्हि। मीमांसा आओर वेदांत दुनु दर्शन पर ई मीमांसानुक्रमाणिका, भावनाविवेक तथा विधिविवेक आदि मौलिक ग्रंथ लिखलन्हि स कुमारिल भट्टक ‘तत्व वर्तिका’ पर सेहो हिनक भाष्य टीका छन्हि।

सर गंगानाथ झा आओर म. म. कुप्पुस्वामी शास्त्रीक अनुसार मंडन मिश्रक समयावधि 615-607 ई० मानल जाइत अछि। ओ बिहार राज्यक सहरसा जिलान्तर्गत ‘महिषी’ (माहिष्मती) गामक छलाह। ई गाम सहरसा स्टेशनसँ करीब 18 किलोमीटर दूर धेमूरा नदीक तट पर स्थित अछि। एहि गाममे प्रसिद्ध भगवती उग्रताराक मंदिर अछि जे हुनक डीह पर मानल जाइत अछि। उग्रतारा स्थान मिथिलाक एकटा प्रसिद्ध शक्तिपीठ अछि। भगवती महिषमर्दिनीक पीठ होयबाक कारणेँ एहि गामकेँ महिषी कहल जाइत अछि। महिषमर्दिनी भगवतीकेँ हुनक कुलदेवी कहल जाइत छन्हि। मिथिला महाराजा शिव सिंहक पत्नी पद्मावती द्वारा 14-15 शताब्दीमे उग्रतारा मंदिरक निर्माण भेल छल।

कहल जाइत छैक जे जखन शंकराचार्य मंडन मिश्रक पुछारि करैत महिषी गाम पहुँचलन्हि आओर गामक पनिहारिनसँ हुनक घरक पता पुछलन्हि तखन पनिहारिन उतारामे दू टा श्लोक सुनौलकन्हि-
‘स्वतः प्रमाण परतरू प्रमाण शुकांगना यत्र विचारयन्ति।
शिश्योपशिष्यौरूपशु यमानमवेदि तन्मण्डनमिश्र धाम।।
जगदध्रुवं स्यात्रगद ध्रुव वा कोरात्मा यत्र गिरोगिरन्ती।
द्वारस्थ नीडांगसासन्निरूद्ध जानीहि तन्मण्डन मिश्र धाम।।”

मंडन मिश्र आओर आदिशंकराचार्यक मध्य शास्त्रार्थ भेल छ्लैक। आ ई शर्त राखल गेलैक जे शास्त्रार्थमे जे हारताह ओ विपक्षीक शिष्य तथा सन्यासी बनि जेताह। मंडन मिश्र शास्त्रार्थमे आदिशंकराचार्य सँ हारि गेलाह परंच हुनक पत्नी भारती, मंडन मिश्र केँ शंकराचार्यक शिष्य आ सन्यासी नहि बनय देमय चाहैत छलखिन्ह। भारती शंकराचार्य केँ शास्त्रार्थ करबाक चुनौती देलन्हि आओर कहलन्हि जे अहाँ आधा जीतलहुँ अछि। हमर पति अहाँक शिष्य तथा सन्यासी तखनहि बनताह जखन अहाँ शास्त्रार्थमे हुनक अर्द्धांगिनीकेँ अर्थात हमरा हरायब। शंकराचार्य एहि लेल तैयार भ’ गेलाह। विद्वतसभा पुनः बैसाओल गेल।

शंकराचार्य आओर भारतीक बीच शास्त्रार्थ प्रारम्भ भेल। भारती जखन शंकराचार्य जी केँ कामशास्त्र पर प्रश्न पूछि निरूत्तरित क’ देलनि तखन शंकराचार्य हारि मानि अनुरोध केलन्हि जे हुनका एक मासक समय भेटन्हि। विद्वत सभा शास्त्रार्थकेँ एक मासक लेल स्थगित क’ देलनि। शंकराचार्य शास्त्रार्थ-स्थल छोड़ि जखन दुःखी मन सँ अपन शिष्यलोकनिक संग एकटा जंगल दय जा रहल छलाह त’ देखलन्हि जे एकटा युवा राजकुमार मरल पड़ल छल जकर मृत्यु तत्क्षण भेल छलैक।

शंकराचार्य ओकर शव लग जाक’ बैसि गेलाह आओर अपन प्रबल योगमाया सँ अपन प्राणकेँ अपन देहसँ निकालि क’ अपन मृत देहकेँ शिष्यक सुरक्षामे सौंपि देलन्हि आओर स्वयं परकाया प्रवेशक’ यौगिक-क्रिया द्वारा मृत राजकुमारक देहमे प्रवेश क’ गेलाह तथा जंगलसँ राजमहल वापिस आबि गेलाह। राजमहल में शंकराचार्य एक मास धरि राजकुमारक देहमे रहि रानीक संग सहवासमे रहलन्हि आओर कामशास्त्रक समस्त कलामे निपुण भ’ वापिस आबि भारती संग शास्त्रार्थ हेतु पहुँचलाह।

शास्त्रार्थ हेतु मण्डप सजाओल गेल, भारती आओर शंकराचार्य मध्य विद्वानक समक्ष शास्त्रार्थ प्रारम्भ भेल। एहि बेर कामशास्त्र पर भारती द्वारा पूछल गेल समस्त गूढ़ प्रश्नक शंकराचार्य बहुत दक्षता और चातुर्यक संग सटीक उत्तर देलन्हि आओर अंतमे भारती निरूत्तरित भ’ पराजित भ’ गेलीह।

हुनक पत्नी भारतीकेँ साक्षात सरस्वतीक अवतार मानल जाइत छन्हि। एहि सँ तत्कालीन मिथिलाक विद्या-वैभवक अंदाज लगाओल जा सकैछ। एतुका साधारण महिला सेहो संस्कृत भाषामे पारंगत छलीह।
शंकराचार्यक अद्वैत वेदांत यदि सन्यासीक लेल मानल जाइत अछि त’ मंडन मिश्रक गृहस्थ आ कर्मयोगीक लेल। वाचस्पति-प्रथम मंडन मिश्रक मत के मानैत छलाह। जाहि कारणेँ शंकराचार्यक शिष्य व अनुगामी लोकनि वाचस्पतिकेँ “वाचस्पतिरू मंडन पृष्ठ सेवी” कहि आलोचना करैत छलन्हि। पंडित मंडन मिश्र केँ ब्रह्माजीक अवतार सेहो मानल जाइत छन्हि, हुनक जन्म सनातन धर्मक प्रचार-प्रसार लेल भेल छलन्हि।
-लेखक मैथिली साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर छथि





