




राजकुमार सोनी.
सिख इतिहास वीरता, आस्था और त्याग की ऐसी कथाओं से भरा है, जिनके सामने समय भी नतमस्तक हो जाता है। इन्हीं अमर गाथाओं में भाई जैता जी, जिन्हें बाद में भाई जीवन सिंह के नाम से जाना गया, का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उनका जीवन साहस और भक्ति का ऐसा संगम है, जो मानव इतिहास में विरल है। उनके शहादत (बलिदान) दिवस पर उनका स्मरण केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा है। सिख इतिहास गवाही देता है कि 1675 ईस्वी में मुगल सत्ता ने दिल्ली के चांदनी चौक में नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी को धर्म और मानवता की रक्षा करते हुए सार्वजनिक रूप से शहीद कर दिया। उस समय भय और आतंक का ऐसा वातावरण था कि कोई भी आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पा रहा था। गुरु जी का कटा हुआ शीश वहीं पड़ा था और मुगल सेना कड़ी निगरानी में थी। ऐसे में भाई जैता जी, जो उस समय दिल्ली में ही उपस्थित थे, ने इतिहास की दिशा बदल देने वाला निर्णय लिया।
अपने दो साथियों के साथ, जान की परवाह किए बिना, भाई जैता जी ने गुरु जी का पावन शीश उठाया, उसे अपने सिर पर बांधा और लगभग 322 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा कर आनंदपुर साहिब की ओर प्रस्थान किया। यह केवल दूरी तय करना नहीं था, बल्कि हर कदम पर मृत्यु को चुनौती देना था। रास्ते में मुगल सिपाहियों की तलाशी, भूख, प्यास और थकान, हर बाधा उनके संकल्प के सामने बौनी साबित हुई।
आनंदपुर साहिब पहुंचकर जब उन्होंने यह पावन शीश दसवीं पातशाही, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी (तब गुरु गोबिंद राय) को भेंट किया, तो गुरु जी भाव-विभोर हो उठे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें और उनके साथियों को ‘मजहबी’ कहकर सम्मानित किया और उच्च स्वर में वह ऐतिहासिक वाक्य कहा, ‘रंगरेटे गुरु के बेटे हैं।’ यह कथन केवल सम्मान नहीं था, बल्कि सामाजिक भेदभाव को तोड़ने वाली क्रांतिकारी उद्घोषणा थी, जिसने सिख पंथ की समतामूलक आत्मा को स्पष्ट किया।
गुरु जी के आदेश से गुरु तेग बहादुर साहिब के शीश का दाह संस्कार आनंदपुर साहिब में चंदन की चिता पर पूरे सम्मान के साथ किया गया, जबकि गुरु जी के धड़ का अंतिम संस्कार दिल्ली में भाई लखी शाह द्वारा किया गया। यह घटनाएँ सिख इतिहास के उन अध्यायों में हैं, जहाँ भक्ति और साहस एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।
कहा जाता है कि बाद में श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई जैता जी को खालसा दीक्षा देकर उनका नाम भाई जीवन सिंह रखा। इसके बाद वे केवल एक श्रद्धालु नहीं रहे, बल्कि खालसा पंथ के समर्पित योद्धा बन गए। आनंदपुर साहिब से लेकर विभिन्न युद्धों तक, भाई जीवन सिंह दसवीं पातशाही के साथ डटे रहे और मुगलों व पहाड़ी सरदारों के विरुद्ध अनेक युद्धों में वीरता से लड़े।
1705 ईस्वी में चमकौर के ऐतिहासिक युद्ध में भाई जीवन सिंह ने अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। उनकी शहादत की स्मृति में आज चमकौर के गुरुद्वारा शहीद बुर्ज साहिब में उनकी समाधि स्थापित है, जो आने वाली पीढ़ियों को साहस, निष्ठा और बलिदान का संदेश देती है।
भाई जैता जी (भाई जीवन सिंह) का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में प्रकट होती है। उनके बलिदान दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन, एक ऐसे सिख को, जिसने शीश उठाकर न केवल गुरु की मर्यादा बचाई, बल्कि मानव इतिहास में अदम्य साहस की अमिट छाप छोड़ दी।
-लेखक गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा श्रीगंगानगर के ट्रस्टी हैं




