





डॉ. प्रियंका चाहर.
बेमौसम बारिश, तेज आंधी और ओलावृष्टि ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। सबसे अधिक परेशान और हताश हमारे किसान हैं, क्योंकि बेमौसम की बारिश ने उनकी पकी हुई फसलों को बर्बाद कर दिया है। महीनों की मेहनत और उम्मीदें कुछ ही घंटों में मिट्टी में मिल गईं। ऐसी स्थिति में हमेशा की तरह लोग भगवान और प्रकृति को कोसने लगते हैं। परंतु क्या यह पूरी तरह से सही है? क्या केवल प्रकृति ही इसके लिए जिम्मेदार है? या फिर हमारी अपनी पृथ्वी और प्रकृति के प्रति लापरवाही भी इसके पीछे एक बड़ा कारण है?
वास्तव में, पिछले कुछ वर्षों में मौसम के मिजाज में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी अत्यधिक गर्मी, कभी अचानक तेज बारिश, तो कभी भयंकर आंधी, ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। इस असंतुलन के पीछे सबसे बड़ा कारण मानव की अनियंत्रित गतिविधियाँ हैं। हमने विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की, जंगलों को नष्ट किया और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया। परिणामस्वरूप, पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया और इसका असर मौसम पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
आज शहरों का विस्तार तेजी से हो रहा है। नए भवन, सड़कें और उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं, परंतु इसके लिए पेड़ों और हरियाली को खत्म किया जा रहा है। पेड़ वर्षा चक्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब पेड़ों की संख्या कम होती है, तो वर्षा का समय और मात्रा भी असंतुलित हो जाती है। यही कारण है कि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि जैसी घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
इसके अलावा, वायु और जल प्रदूषण भी मौसम में बदलाव का एक प्रमुख कारण है। कारखानों और वाहनों से निकलने वाला धुआँ वातावरण को प्रदूषित कर रहा है, जिससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसे जलवायु परिवर्तन कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की प्रकृति अनिश्चित हो गई है, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
ऐसी परिस्थितियों में केवल प्रकृति या भगवान को दोष देना उचित नहीं है। हमें अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। यदि हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करेंगे, तो उसका परिणाम हमें ही भुगतना पड़ेगा। हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए, जल और ऊर्जा का संरक्षण करना चाहिए तथा प्रदूषण को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। साथ ही, किसानों को भी आधुनिक तकनीकों और मौसम की सटीक जानकारी से जोड़ना आवश्यक है, ताकि वे समय रहते अपनी फसलों की सुरक्षा कर सकें।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जो प्राकृतिक आपदाएँ हम देख रहे हैं, उनमें कहीं न कहीं हमारी अपनी लापरवाही भी शामिल है। इसलिए केवल प्रकृति को दोष देने के बजाय हमें आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। यदि हम आज से ही प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उनका पालन करें, तो भविष्य में ऐसी त्रासदियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्रकृति हमारी शत्रु नहीं, बल्कि हमारी जीवनदायिनी है, उसे बचाना ही हमारे भविष्य को बचाना है। आज आवश्यकता है कि हम अपने मानव होने के भाव को समझते हुए अपने पर्यावरण को संरक्षित करने का प्रयास करें ना कि विकास के नाम पर विनाश की कहानी लिखें।





