



गोपाल झा
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह नहीं कि वहाँ सरकारें बनती और बदलती रहती हैं, बल्कि यह है कि वहाँ एक साधारण नागरिक भी सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछ सकता है। जब यह अधिकार कमजोर पड़ने लगता है, तब लोकतंत्र का शरीर भले खड़ा दिखाई दे, उसकी आत्मा घायल होने लगती है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों एक व्यक्ति बैठा है। उसके पास न सत्ता की ताकत है और न ही भाषणों की चकाचौंध। उसके पास केवल एक आग्रह है, व्यवस्था से जवाब मांगने का आग्रह। वह आग्रह जितना उसके अपने लिए है, उससे कहीं अधिक उन लाखों युवाओं के लिए है, जिनके सपने हर बार किसी न किसी पेपर लीक की खबर के साथ टूटकर बिखर जाते हैं। वह व्यक्ति सोनम वांगचुक हैं। कभी लद्दाख की आवाज़ बनकर खड़े हुए, तो कभी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठे प्रश्नों को लेकर अनशन पर बैठे दिखाई देते हैं। व्यक्ति बदल सकता है, मुद्दे बदल सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र का प्रश्न वही रहता है, क्या सत्ता अपने नागरिकों की आवाज़ सुन रही है?
इतिहास गवाही देता है कि हर दौर में सत्ता ने अपने आलोचकों को संदेह की दृष्टि से देखा है। कभी उन्हें आदर्शवादी कहकर टाल दिया गया, कभी अवसरवादी बताकर खारिज कर दिया गया और कभी उनकी निष्ठा पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिए गए। यह प्रवृत्ति किसी एक सरकार या एक विचारधारा की नहीं, बल्कि सत्ता के स्वभाव यानी मूल चरित्र का हिस्सा रही है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहाँ अंतिम निर्णय सत्ता नहीं, समाज करता है। जनता का विश्वास किसी भी शासन की सबसे बड़ी पूंजी होता है और वही सबसे कठोर न्यायाधीश भी।
जंतर-मंतर की धरती ने अनेक आंदोलनों की आहट सुनी है। यही शहर कभी रामलीला मैदान में जनलोकपाल आंदोलन का साक्षी बना था। तब भी हजारों लोग उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे। आज फिर वही प्रश्न हवा में तैर रहा है, क्या व्यवस्था अपने भीतर झाँकने का साहस करेगी? क्या संवाद का दरवाज़ा खुलेगा? या फिर समय को ही फैसला लिखने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक बेचैन करने वाली तस्वीर मीडिया की है। लोकतंत्र में मीडिया केवल समाचारों का व्यापारी नहीं होता, वह समाज की चेतना का दर्पण भी होता है। उसकी कलम का धर्म सत्ता और जनता के बीच पुल बनाना है, किसी एक किनारे की दीवार बन जाना नहीं। जब दर्पण ही चेहरों की जगह मुखौटे दिखाने लगे, तब समाज अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होने लगता है। शायद यही कारण है कि आज दर्शक स्क्रीन से अधिक सत्य की तलाश में भटकता दिखाई देता है। विश्वास खोना किसी भी संस्था के लिए सबसे बड़ी पराजय होती है।
लोकतंत्र चार स्तंभों पर खड़ा बताया जाता है, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। लेकिन इन चारों की मजबूती का आधार एक पाँचवाँ स्तंभ है, जिसका नाम संविधान की किसी धारा में नहीं लिखा गया, फिर भी वही सबसे बड़ा है। वह है, जागरूक नागरिक। जब नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ देता है, तब संस्थाएँ भी धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियाँ भूलने लगती हैं। और जब नागरिक केवल समर्थन या विरोध की दो ध्रुवीय दुनिया में सिमट जाता है, तब विवेक सबसे पहले दम तोड़ता है।
लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सरकार हर मांग मान ले। लोकतंत्र का अर्थ यह भी नहीं कि हर आंदोलन निर्दाेष या निर्विवाद हो। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है, संवाद। तर्क का सम्मान। असहमति का अधिकार। यदि कोई सरकार आलोचना से डरने लगे और कोई समाज प्रश्न पूछने वालों से घृणा करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की जड़ों में नमी कम होने लगी है।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। आवश्यकता उस व्यवस्था के पक्ष में खड़े होने की है जिसमें एक किसान, एक छात्र, एक सैनिक, एक शिक्षक, एक वैज्ञानिक या एक सामाजिक कार्यकर्ता, सभी बिना भय के अपनी बात कह सकें। राष्ट्र केवल सीमाओं से सुरक्षित नहीं होता, वह नागरिकों के विश्वास से भी सुरक्षित होता है। और विश्वास वहीं जन्म लेता है जहाँ संवाद जीवित रहता है।
समय की अपनी एक विचित्र आदत है। वह शोर को नहीं, सत्य को याद रखता है। वह नारों को नहीं, चरित्र को परखता है। सत्ता के गलियारों में गूँजती आवाज़ें एक दिन थम जाती हैं, लेकिन जनता की स्मृति में दर्ज प्रश्न बहुत देर तक जीवित रहते हैं। इसलिए हर सरकार, हर संस्था और हर नागरिक को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र का सबसे सुंदर दृश्य चुनाव नहीं, बल्कि वह क्षण होता है जब सत्ता प्रश्न सुनती है और जनता उत्तर पर विश्वास कर पाती है।
आखिरकार, लोकतंत्र किसी संसद भवन का नाम नहीं है। वह करोड़ों नागरिकों के विश्वास का दूसरा नाम है। जिस दिन यह विश्वास टूट जाएगा, उस दिन सबसे ऊँची इमारतें भी खोखली प्रतीत होंगी। और जिस दिन यह विश्वास बचा रहेगा, उस दिन एक अकेला नागरिक भी इतिहास की दिशा बदलने की क्षमता रखेगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







