




ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं और शहरी निकायों के चुनाव टलने के मामले में राज्य निर्वाचन आयोग ने पहली बार हाईकोर्ट में स्पष्ट किया कि चुनाव कराने में उसकी ओर से कोई देरी नहीं है। आयोग ने अदालत को बताया कि चुनाव कराने की पूरी तैयारी पूरी हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण तय नहीं किए जाने के कारण चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया जा सकता।
अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय में पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि आयोग मतदाता सूची तैयार कर चुका है, मतदान मशीनों की व्यवस्था भी कर ली गई है और चुनाव कराने से जुड़ी सभी प्रशासनिक तैयारियां पूरी हैं। यदि सरकार आरक्षण की प्रक्रिया पूरी कर दे तो आयोग केवल दो दिन में चुनाव कार्यक्रम जारी कर सकता है।
निर्वाचन आयुक्त ने न्यायालय को बताया कि वार्डों और अध्यक्ष पदों का आरक्षण तय करना पंचायतीराज विभाग और स्वायत्त शासन विभाग की जिम्मेदारी है। इस संबंध में आयोग पहले ही छह बार पत्र लिख चुका है। इनमें तीन पत्र पंचायतीराज विभाग और तीन पत्र स्वायत्त शासन विभाग को भेजे गए, लेकिन अब तक आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
आयोग ने कहा कि बिना आरक्षण तय किए चुनाव घोषित करना संभव नहीं है, क्योंकि तब यह स्पष्ट ही नहीं होगा कि किस वार्ड से किस वर्ग का प्रत्याशी चुनाव लड़ सकेगा। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं को आरक्षण देना संवैधानिक बाध्यता है। हालांकि, न्यायालय पहले ही कह चुका है कि अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के बिना भी चुनाव कराए जा सकते हैं, लेकिन शेष आरक्षण तय करना राज्य सरकार का दायित्व है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी रिपोर्ट 14 अगस्त तक सौंपेगा। इसके बाद 21 अगस्त तक आरक्षण की लॉटरी निकालकर वार्डों और अध्यक्ष पदों का आरक्षण निर्धारित किया जाएगा। आयोग का कहना है कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक चुनाव कार्यक्रम घोषित करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है।
यह मामला पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की अवमानना याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 31 जुलाई तक चुनाव कराने के हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया। पिछली सुनवाई में उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार, राज्य निर्वाचन आयोग और अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई थी। न्यायालय ने सवाल उठाया था कि जब चुनाव 31 जुलाई तक कराने के आदेश हैं तो 14 अगस्त तक रिपोर्ट आने का इंतजार क्यों किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में सरकार को आरक्षण की लॉटरी, चुनाव कार्यक्रम और आयोग की रिपोर्ट की स्पष्ट समय-सीमा बतानी होगी। अदालत ने देरी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा कि यदि राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कराने में असमर्थ है तो न्यायालय किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति पर भी विचार कर सकता है।
अब इस पूरे मामले पर 20 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई अहम मानी जा रही है। निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार आरक्षण प्रक्रिया को लेकर क्या समय-सीमा पेश करती है और चुनाव की दिशा में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।








