




डॉ. सुचेता जैन
सुबह के पौने आठ बजे हैं। स्कूल की वर्दी पर इस्त्री की कड़क सिलवटें हैं, हाथ में एक छोटा-सा काग़ज़ी झंडा है जिसकी डंडी थोड़ी टेढ़ी हो गई है क्योंकि रातभर मुट्ठी में दबी रही। मैदान में लाउडस्पीकर पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ बज रहा है, एक शिक्षक झंडा फहराने से पहले बार-बार रस्सी जाँच रहा है, और भीड़ में खड़े हर बच्चे की आँखें एक अजीब से गर्व से भरी हैं जिसका मतलब उसे अभी पूरी तरह समझ भी नहीं आता। फिर झंडा फहरता है, राष्ट्रगान गूँजता है, और आखिर में लड्डू का वो एक टुकड़ा मिलता है जो हर साल इस दिन को मीठा बना देता है। यह वो तस्वीर है जो हम सबकी यादों में कहीं न कहीं बसी है और यह तस्वीर आज भी वैसी ही दोहराई जाएगी। पर मैं जब भी यह मंज़र देखती हूँ, दिल में एक सवाल उठता है जो हर साल थोड़ा और गहरा होता जाता है, इन बच्चों के हाथ में जो झंडा है, क्या उनकी मुट्ठी में असली आज़ादी भी उतनी ही मज़बूती से बंद है?
क्योंकि आज़ादी सिर्फ़ वो दिन नहीं है जब अंग्रेज़ इस देश से गए थे। आज़ादी एक जीती-जागती चीज़ है, जो हर पीढ़ी के साथ अपना रूप बदलती है, और हर पीढ़ी को अपने ढंग से यह साबित करना पड़ता है कि वह उसे सिर्फ़ पहन नहीं रही, जी रही है। 1947 में आज़ादी का मतलब था, अपनी ज़मीन पर अपना राज। ज़ंजीरें तब दिखती थीं, बंदूकों की शक्ल में, जेलों की सलाखों की शक्ल में, कोड़ों की शक्ल में। आज की ज़ंजीरें दिखती नहीं। वो एक स्क्रीन के भीतर छुपी हैं, नोटिफिकेशन की शक्ल में हर कुछ मिनट में हमारी जेब में कंपकंपाती हैं। हम एक ऐसी पीढ़ी हैं जो सुबह आँख खोलते ही स्वतंत्र भारत की हवा में साँस लेती है, पर सोने से पहले जिसका दिमाग़ किसी एल्गोरिद्म के हवाले हो चुका होता है, जो तय करता है हम क्या सोचें, क्या ख़रीदें, किससे नफ़रत करें, किसे पसंद करें। यह ग़ुलामी बंदूक की नोक पर नहीं आई, यह बड़ी नज़ाकत से, बड़े आराम से, स्क्रीन-टाइम की शक्ल में हम तक पहुँची है कृ और सबसे तकलीफ़देह बात यह है कि हमने इसे अपनी मर्ज़ी से गले लगाया है।
ग्लोबलाइज़ेशन हमें दुनिया के क़रीब लाया, पर बदले में उसने हमसे बहुत कुछ माँग भी लिया। हम अंग्रेज़ी में सपने देखने लगे हैं, विदेशी ब्रांड में गर्व ढूँढने लगे हैं, और अपनी ही मिट्टी की कहानियाँ, अपनी दादी-नानी की भाषा, अपने गाँव की बोली भूलते जा रहे हैं। डिजिटलाइज़ेशन को हम तरक़्क़ी कहते हैं, और है भी, यही तकनीक है जो आज के युवा को जोड़ती है, उसकी आवाज़ को दुनिया तक पहुँचाती है, जिसने कई बार अन्याय के खिलाफ उसे लामबंद भी किया है। पर उसी मंच ने हमारा ध्यान बाँट दिया है, हमें उथले, आधे-अधूरे जवाबों का आदी बना दिया है। यही वो नई, नाज़ुक निर्भरता है जिसका कोई अंग्रेज़ों जैसा साफ़ चेहरा नहीं, इसलिए इसे पहचानना भी उतना ही मुश्किल है जितना इससे लड़ना।
आज पंद्रह अगस्त की सुबह जब हम झंडे को सलामी देंगे, तो एक पल के लिए भगत सिंह की उस तस्वीर को भी याद कीजिए, तेईस साल का एक लड़का, जिसकी आँखों में फांसी के तख़्ते पर भी डर नहीं था। चंद्रशेखर आज़ाद पच्चीस के थे, खुदीराम बोस अठारह के। यह इतिहास की किताब का सूखा क़िस्सा नहीं है, यह उसी उम्र की कहानी है जो आज कॉलेज के तीसरे साल में बैठी है, जो आज प्लेसमेंट की तैयारी कर रही है, विदेश जाने का सपना देख रही है। फ़र्क़ उम्र का नहीं, इस बात का है कि उस पीढ़ी के पास एक साफ़ दुश्मन था, जिसे वर्दी से, झंडे के रंग से पहचाना जा सकता था। आज के युवा का दुश्मन धुंधला है, बँटा हुआ है, कभी बेरोज़गारी की शक्ल में, कभी उस झूठी सूचना की शक्ल में जो हर रोज़ फ़ोन में घुसकर हमें बाँटती है, कभी उस पर्यावरण के विनाश की शक्ल में जिसे हम नज़रअंदाज़ करना सीख चुके हैं। जब दुश्मन दिखता नहीं, तब लड़ाई पहचानना भी उतना ही मुश्किल हो जाता है।
अगर आज भगत सिंह होते, तो शायद बम नहीं फेंकते, शायद एक ऐसा मंच खड़ा करते जो गाँव की भाषा में शिक्षा पहुँचाता, शायद उस जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लगातार आवाज़ उठाते जो हमारे बच्चों से उनका कल छीन रहा है, शायद अपने ही मोहल्ले में जाकर पूछते, यहाँ पानी क्यों नहीं है, यहाँ स्कूल क्यों टूटा पड़ा है। आज की क्रांति सिर्फ़ एक दिन की उमड़ती भीड़ की नहीं, बल्कि उस उमड़ाव को अगले दिन भी, अगले महीने भी ज़िंदा रखने की क्रांति है। यह क्रांति है, अपनी भाषा में बात करने की हिम्मत रखना, जब पूरी दुनिया अंग्रेज़ी में बात करने को ही तरक्क़ी मानती है। यह क्रांति है, अपने गाँव, अपने शहर की समस्या को अपनाना, जब हर कोई कहीं और भाग जाना चाहता है। यह क्रांति है, एक पेड़ लगाना, एक बच्चे को पढ़ाना, एक झूठी ख़बर को फैलने से पहले रोकना, और सबसे ज़रूरी कृ उस लड़ाई को तब भी लड़ते रहना जब भीड़ छँट चुकी हो, कैमरा बंद हो चुका हो।
एक युवा फाउंडेशन के संस्थापक के तौर पर मैंने बार-बार महसूस किया है, असली आज़ादी सिर्फ़ राजनीतिक नहीं होती, वह मानसिक, आर्थिक और पर्यावरणीय भी होती है। जब तक हमारा युवा जलवायु संकट को नहीं समझेगा, जब तक वह अपनी मिट्टी, अपने पानी, अपने जंगल की परवाह नहीं करेगा, तब तक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। स्थायी भविष्य यानी सस्टेनेबल फ्यूचर ही आज की असली स्वतंत्रता संग्राम है। यह लड़ाई किसी विदेशी सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी ही आदतों, अपने ही आराम, और अपनी ही उस चुप्पी के ख़िलाफ़ है जो हमें सुविधा के नाम पर परोसी गई है।
तो इस पंद्रह अगस्त, जब झंडा फहरे, जब राष्ट्रगान गूँजे, जब हाथ में वही काग़ज़ी तिरंगा हो, एक पल रुककर ख़ुद से पूछिए, मैं आज़ाद हूँ या सिर्फ़ आज़ादी का उपभोग कर रहा हूँ? जवाब अगर तकलीफ़ दे, तो समझ लीजिए, वही आपकी असली शुरुआत है। भगत सिंह ने अपनी जान दी थी ताकि हम सोच सकें, बोल सकें, चुन सकें। अब वक़्त है कि हम यह साबित करें कि हमने वह आज़ादी सिर्फ़ पहनी नहीं, जी भी है कृ हर रोज़, हर पल, हर छोटे फ़ैसले में, न सिर्फ़ पंद्रह अगस्त की एक सुबह में। जय हिंद।
-लेखिका ट्रांसफॉर्मेटिव थर्सडे व माहिती लॉ एकेडमी की संस्थापक हैं







