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बॉलीवुड की चकाचौंध, पीआर की गढ़ी हुई कृत्रिम दुनिया और बनावटी मुस्कानों के बीच अगर कोई कलाकार पूरी तरह ‘कच्चा और खरा’ नजर आता है, तो वह हैं नाना पाटेकर (जिन्हें मराठी और हिंदी सिनेमा में सब प्यार व अदब से ‘दादा’ कहते हैं)। जब भी बॉलीवुड के किसी पुराने कोने में दादा का नाम उछलता है, तो चर्चा उनकी फिल्मों से ज्यादा उनके तेवरों, उनकी सनक और उनके बेपरवाह फकीराना अंदाज़ की होती है।
इंडस्ट्री के सेटों पर एक बात हमेशा से गपशप का हिस्सा रही, नाना पाटेकर को कभी कोई डायरेक्टर ‘डायरेक्ट’ नहीं कर पाया। सेट पर जब नाना होते हैं, तो स्क्रिप्ट सिर्फ पन्नों पर लिखी एक सलाह होती है। उनकी अदाकारी की सबसे बड़ी खासियत रही है उनकी अप्रत्याशित बॉडी लैंग्वेज और आवाज का खेल।
नाना कभी सामान्य एक्टरों की तरह लाइनें नहीं बोलते। वे सीन में पहले फुसफुसाते हैं, सामने वाले को भ्रम में डालते हैं और अगले ही पल उनकी आवाज एक जोरदार चाबुक की तरह गूंजती है। ‘परिंदा’ का अन्ना हो, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप या ‘खामोशी’ का मूक-बधिर पिता, नाना के हाथ के अजीब झटके, उंगलियों का नचना और चेहरे की तनी हुई नसें कोई एक्टिंग स्कूल नहीं सिखा सकता। इनसाइडर्स बताते हैं कि ‘परिंदा’ के कई सीन्स में तो को-स्टार्स सचमुच डर जाते थे क्योंकि उन्हें पता ही नहीं होता था कि नाना अगले सेकंड क्या कर बैठेंगे।
नाना का गुस्सा और उनकी बेबाकी बॉलीवुड की किटी पार्टियों का सबसे पसंदीदा मसाला रहा है। जहां बाकी स्टार्स करण जौहर या बड़े प्रोडक्शन हाउसेज के चक्कर काटते थे, नाना ने हमेशा इन ‘फैंसी क्लबों’ को लात मारी। गलियारों में मशहूर है कि अगर किसी बड़े प्रोड्यूसर या डायरेक्टर ने सेट पर जरा भी बदतमीजी या बनावटीपन दिखाया, तो नाना ने बिना सोचे पैक-अप कर दिया।
उनका मुंहफट रवैया ऐसा रहा कि उन्होंने कभी किसी स्टारडम की परवाह नहीं की। कई बड़े हीरोज उनके साथ स्क्रीन शेयर करने से कतराते थे, क्योंकि सबको पता था कि नाना फ्रेम में आते ही पूरा सीन निगल जाएंगे। न कोई पीआर टीम, न कोई महंगे स्टाइलिस्ट, नाना अब भी जब निकलते, तो साधारण सफेद कुर्ते-पायजामे और कोल्हापुरी चप्पलों में दिखते।
दादा के व्यक्तित्व का सबसे अनोखा पहलू, जो बॉलीवुडिया ग्लैमर के बिल्कुल उलट है, वो है उनकी फकीरी और सादगी। इंडस्ट्री के चुनिंदा दोस्तों के बीच यह बात खूब चलती है कि नाना जितना तीखा पर्दे पर बोलते हैं, उतना ही तीखा और लाजवाब खाना अपने हाथों से पकाते हैं। उनके हाथ का मटन और प्रॉन्स करी खाने के लिए कई दिग्गज लाइन लगाते रहे हैं।
जहां बाकी सितारे करोड़ों की गाड़ियां और स्विस वेकेशन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालते हैं, वहीं नाना महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त गांवों में किसानों की चौपाल पर बैठे मिलते हैं। उनका ‘नाम फाउंडेशन’ कोई पब्लिसिटी स्टंट नहीं था; उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई चुपचाप उन किसानों के परिवारों के आंसुओं को पोंछने में लगा दी।
नाना पाटेकर उस पुराने दौर के आखिरी ऐसे अभिनेता थे, जो शोबिजनेस में रहकर भी कभी ‘बिके’ नहीं। उनका मिजाज गर्म, दिल मोम और अदाकारी आग जैसी है, और इसी वजह से बॉलीवुड चाहे उनसे जितना भी खौफ खाए, उनकी कद्र किए बिना नहीं रह सकता।





