



ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजस्थान में प्रस्तावित लोकसभा परिसीमन को लेकर सामने आई भाजपा से जुड़े एक अध्ययन समूह की रिपोर्ट ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। रिपोर्ट में प्रदेश की लोकसभा सीटों की संख्या 25 से बढ़ाकर 37 करने का सुझाव दिया गया है। इस प्रस्तावित पुनर्गठन में सीमावर्ती हनुमानगढ़ जिले को भी विशेष महत्व दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि वर्तमान में चूरू लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा रही नोहर विधानसभा को प्रस्तावित हनुमानगढ़ लोकसभा क्षेत्र में शामिल किया जाए। यदि भविष्य में परिसीमन आयोग इस प्रकार का निर्णय करता है, तो जिले की राजनीतिक दिशा और चुनावी समीकरण दोनों बदल सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, हनुमानगढ़ को एक स्वतंत्र और अधिक सशक्त संसदीय क्षेत्र के रूप में विकसित करने की अवधारणा प्रस्तुत की गई है। वर्तमान व्यवस्था में जिले की विधानसभा सीटें अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों में बंटी हुई हैं, जिससे स्थानीय मुद्दों का प्रतिनिधित्व प्रभावित होने की शिकायत समय-समय पर उठती रही है। नोहर के प्रस्तावित रूप से हनुमानगढ़ लोकसभा क्षेत्र में शामिल होने से जिले की भौगोलिक और सामाजिक एकरूपता को मजबूती मिलने की संभावना जताई गई है। अध्ययन समूह ने केवल हनुमानगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में व्यापक बदलाव सुझाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा की कुल 37 सीटों में सात सीटें अनुसूचित जाति तथा पांच सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करने का सुझाव दिया गया है। वर्तमान में प्रदेश में चार सीटें अनुसूचित जाति और तीन सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
हनुमानगढ़ के दृष्टिकोण से यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सीमावर्ती जिले की जनसंख्या, कृषि, सिंचाई, सीमा सुरक्षा और नहरी क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को भविष्य में एकीकृत संसदीय प्रतिनिधित्व मिल सकता है। स्थानीय राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि नोहर हनुमानगढ़ संसदीय क्षेत्र में शामिल होता है तो जिले की विकास संबंधी प्राथमिकताओं को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर मिलेगा।
रिपोर्ट का सबसे चर्चित प्रस्ताव नागौर संसदीय क्षेत्र को लेकर है। इसमें नागौर और डीडवाना-कुचामन को मिलाकर नई संसदीय सीट बनाते हुए उसे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित करने का सुझाव दिया गया है। यदि ऐसा होता है तो राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल को नया संसदीय क्षेत्र तलाशना पड़ सकता है। इसी प्रकार बारां-झालावाड़ संसदीय क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करने का सुझाव भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
रिपोर्ट में वर्तमान बीकानेर संसदीय क्षेत्र को अनुसूचित जाति के आरक्षण से बाहर लाकर सामान्य वर्ग के लिए खोलने तथा दौसा संसदीय क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति के आरक्षण से मुक्त करने का भी सुझाव दिया गया है। इन बदलावों से कई वरिष्ठ नेताओं के राजनीतिक समीकरण बदलने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि यह केवल एक अध्ययन समूह की अनुशंसा है। अंतिम निर्णय भारत के परिसीमन आयोग की सिफारिशों, संवैधानिक प्रक्रिया और संसद की स्वीकृति के बाद ही लागू हो सकेगा। इससे पहले भी प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की एक अध्ययन रिपोर्ट में राजस्थान में 38 लोकसभा सीटों का अनुमान व्यक्त किया गया था, जिसमें कई बड़े नेताओं के संसदीय क्षेत्रों में बदलाव का सुझाव नहीं दिया गया था। इसके विपरीत वर्तमान अध्ययन समूह ने राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के आधार पर व्यापक पुनर्गठन का प्रस्ताव रखा है। फिलहाल हनुमानगढ़ सहित पूरे राजस्थान की निगाहें भविष्य में होने वाली परिसीमन प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि प्रस्तावित सुझावों का कोई स्वरूप लागू होता है, तो प्रदेश के साथ-साथ हनुमानगढ़ की राजनीति में भी नए समीकरण, नई चुनौतियां और नए अवसर सामने आ सकते हैं।






