



गोपाल झा.
राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के बीच सिंचाई जल को लेकर चला आ रहा विवाद दशकों पुराना है। समझौतों में तय हिस्से के बावजूद राजस्थान को पूरा पानी नहीं मिल पाने का मुद्दा आज भी किसानों और नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर चिंता बना हुआ है। इसी विवाद की वास्तविक स्थिति जानने और तथ्यों की गहराई तक पहुंचने के उद्देश्य से रावी-ब्यास जल ट्रिब्यूनल के सदस्यों की टीम सोमवार को हनुमानगढ़ जिले के दौरे पर पहुंची। टीम ने इंदिरा गांधी नहर परियोजना और नोहरदृसिद्धमुख परियोजना क्षेत्रों का निरीक्षण कर जमीनी हालात का आकलन किया।
रावी-ब्यास जल ट्रिब्यूनल की टीम के हनुमानगढ़ पहुंचने पर जिला प्रशासन की ओर से स्वागत किया गया। इस अवसर पर जिला कलक्टर डॉ. खुशाल यादव, मुख्य अभियंता प्रदीप रुस्तगी सहित जल संसाधन विभाग और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। ट्रिब्यूनल टीम में अध्यक्ष विनीत शरण, सदस्य सुमन श्याम और पी. नवीन राव शामिल रहे। उनके साथ पंजाब और हरियाणा के अधिकारी भी निरीक्षण दल में मौजूद थे।
ट्रिब्यूनल टीम ने सबसे पहले हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी तहसील में स्थित मसीतांवाली हेड का दौरा किया। यहां इंदिरा गांधी नहर परियोजना के तहत पानी की आपूर्ति, वितरण व्यवस्था और सिंचित क्षेत्र की जानकारी ली गई। जल संसाधन विभाग राजस्थान के अधिकारियों ने नहर प्रणाली, जल प्रवाह और किसानों तक पानी पहुंचने की स्थिति के बारे में विस्तार से अवगत कराया। निरीक्षण के दौरान यह भी बताया गया कि किस प्रकार इंदिरा गांधी नहर पश्चिमी राजस्थान के लिए जीवनरेखा साबित हुई है, लेकिन तय हिस्से से कम पानी मिलने के कारण कई बार सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होती है।
इसके बाद ट्रिब्यूनल के सदस्य नोहर तहसील पहुंचे, जहां नोहर-सिद्धमुख परियोजना क्षेत्र का निरीक्षण किया गया। यहां भी जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने परियोजना से जुड़ी तकनीकी और व्यावहारिक जानकारियां साझा कीं। सिंचाई प्रणाली, कमांड एरिया और जल वितरण में आने वाली दिक्कतों पर विस्तार से चर्चा हुई। इस दौरान मुख्य अभियंता एवं अतिरिक्त सचिव जल संसाधन जयपुर अमरजीत मेहरड़ा तथा मुख्य अभियंता जल संसाधन उत्तर हनुमानगढ़ प्रदीप रुस्तगी ने आईजीएनपी से सिंचित होने वाले क्षेत्रों और पानी की वास्तविक जरूरतों की जानकारी दी। मौके पर अतिरिक्त जिला कलक्टर उम्मेदीलाल मीणा सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे।
अंतरराज्यीय जल समझौते के तहत राजस्थान को रावी-ब्यास प्रणाली से 8.6 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) पानी मिलना तय हुआ था। हालांकि इंदिरा गांधी नहर परियोजना का निर्माण समय पर पूरा नहीं होने के कारण राजस्थान शुरुआत में केवल 8 एमएएफ पानी ही ले सका। विशेषज्ञों के अनुसार, जब नहर का निर्माण पूरा हो गया और राजस्थान ने पूरा हिस्सा लेने की तैयारी की, तब पंजाब ने शेष 0.6 एमएएफ पानी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद यह मामला न्यायालय में चला गया, जहां आज भी विचाराधीन है।
इसी तरह नोहर-सिद्धमुख परियोजना के लिए तय 0.17 एमएएफ पानी को लेकर भी विवाद चल रहा है। इस मामले में भी संबंधित पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ न्यायालय में हैं। इसके अलावा बांधों और जल भंडारण से जुड़े कई अन्य मामले भी अदालत में लंबित हैं, जिनका सीधा असर राजस्थान की सिंचाई व्यवस्था पर पड़ रहा है।
राजस्थान को भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड में स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिलने को भी जल विवाद की एक बड़ी वजह माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि बोर्ड में प्रभावी भूमिका न होने से राजस्थान के हितों को पर्याप्त रूप से नहीं उठाया जा पाता, जिसका नुकसान अंततः किसानों को भुगतना पड़ता है।
ट्रिब्यूनल की ओर से इससे पहले पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कई क्षेत्रों में निरीक्षण किया जा चुका है। बीकानेर से जैसलमेर तक परियोजना क्षेत्रों का दौरा कर टीम ने पहले ही वस्तुस्थिति का आकलन किया है। अब हनुमानगढ़ जिले में निरीक्षण के बाद ट्रिब्यूनल के पास जमीनी तथ्यों का एक और अहम अध्याय जुड़ गया है।
सूत्रों का कहना है कि ट्रिब्यूनल का यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि दशकों पुराने विवाद के समाधान की दिशा में एक गंभीर प्रयास माना जा रहा है। खेतों तक पहुंचने वाले पानी की हकीकत, नहरों की क्षमता और समझौतों की व्यावहारिक स्थिति को देखकर ही कोई ठोस फैसला संभव है। अब देखना यह है कि यह निरीक्षण रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया में कितना असर डालती है। किसानों की नजरें इस पर टिकी हैं, क्योंकि उनके लिए पानी सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन है।







