



ग्राम सेतु ब्यूरो.
कभी-कभी वक्त किसी व्यक्ति को पद नहीं देता, लेकिन जनता उसे वह दर्जा दे देती है जो किसी भी कुर्सी से बड़ा होता है। राजस्थान की राजनीति में विभिन्न दलों के प्रदेशाध्यक्ष रहे सरदार जसपाल सिंह ऐसे ही जननेता थे, जो खुद भले एक भी चुनाव न जीत पाए, लेकिन लोगों के दिलों में स्थायी स्थान बना गए। उन्हें याद करना किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस विचारधारा को याद करना है जिसमें राजनीति सत्ता नहीं, सेवा होती है।
वरिष्ठ पत्रकार अमरपाल सिंह वर्मा कहते हैं, ‘जसपाल सिंह की राजनीति का केंद्र मंच नहीं, मैदान था। वे भाषणों से नहीं, मौजूदगी से पहचाने जाते थे। जनता के बीच रहना, उनके दुःख-दर्द को अपना मानना और संघर्ष के वक्त अग्रिम पंक्ति में खड़े रहनाकृयही उनका राजनीतिक संस्कार था।’ पत्रकार अमरपाल सिंह वर्मा के मुताबिक, तीन दशक पहले का एक दृश्य आज भी हनुमानगढ़ की राजनीतिक स्मृति में दर्ज है। धान मंडी, हनुमानगढ़ टाउन में सभा थी। मंच पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह मौजूद थे, राजनीति के उत्थान-पतन के साक्षी। उसी मंच से उन्होंने कहा था, ‘जब मेरा राजनीतिक जीवन नीचे आया, जब मेरे अपने भी दूर हो गए, तब एक व्यक्ति था जिसने मेरा साथ नहीं छोड़ा और वह है जसपाल सिंह।’ यह महज़ तारीफ नहीं थी; यह चरित्र का प्रमाणपत्र था।
भाई जसपाल सिंह के सहयोगी रहे सितेंद्र बिनोचा कहते हैं, ‘नेताजी की सबसे बड़ी ताकत उनकी उपलब्धता थी। आज जब नेताओं के दरवाज़े अपॉइंटमेंट से खुलते हैं, तब उनका घर और मन हर समय जनता के लिए खुला रहता था। वे फोन नहीं टालते थे, भीड़ से नहीं बचते थे, सवालों से नहीं भागते थे। पानी का मुद्दा हो, किसान का सवाल या स्थानीय विकास की लड़ाई, हर बड़े जन आंदोलन में वे नारे लगाते पीछे खड़े नहीं दिखते थे; वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में बैठे मिलते थे।’
पत्रकार अमरपाल सिंह वर्मा के मुताबिक, धरना स्थल पर जनता बैठी होती, तो जसपाल सिंह ज़मीन पर बैठते थे। जेल भरो आंदोलन होता, तो पुलिस बसों में धकेले जाते हुए भी दिखते थे। उन्होंने कभी सिर्फ ज्ञापन देकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं मानी; वे संघर्ष को जीते थे। सत्ता की सीढ़ियाँ उनके लिए लक्ष्य नहीं थीं, जवाबदेही उनका ध्येय थी।
दरअसल, भाई जसपाल सिंह कभी विधायक नहीं बने, सांसद नहीं बने। लेकिन क्या लोकप्रियता का पैमाना सिर्फ कुर्सी है? क्या जननेता वही है जिसके नाम के आगे पद लिखा हो? जसपाल सिंह ने इस मिथक को तोड़ा। उन्होंने साबित किया कि राजनीति सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का संकल्प है।
अमरपाल सिंह वर्मा के शब्दों में, ‘जसपाल सिंह की सोच विकास को लेकर साफ थी। वे कहते थे, विकास सिर्फ सड़कों और भवनों से नहीं होता; विकास होता है जनभागीदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही से।’ यही वजह है कि उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तब थे। जब वे अस्वस्थ रहने लगे, तब भी जनता का भरोसा उनके परिवार पर बना रहा। उनकी पत्नी को नगर परिषद की सभापति बनाकर जनता ने संदेश दिया कि यह सम्मान किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक विचार का है। फिर भी, हनुमानगढ़ का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करने का उनका सपना अधूरा रह गया, एक कसक, जो आज भी कई दिलों में है।
आज जब राजनीति अवसरवाद के दौर से गुजर रही है, रिश्ते लाभ देखकर तय होते हैं, तब जसपाल सिंह जैसे लोग और बड़े हो जाते हैं। उन्होंने सिद्धांतों के साथ खड़े रहना चुना। सत्ता के आगे घुटने नहीं टेके। साथ निभाया, हालात जैसे भी रहे हों।
कुछ लोग जीवन भर कुर्सी की तलाश में रहते हैं। कुछ लोग बिना कुर्सी के ही इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। जसपाल सिंह दूसरे प्रकार के नेता थे। वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हर उस संघर्ष में मौजूद हैं जहाँ जनता अपने अधिकार के लिए खड़ी होती है। वे हर उस आवाज़ में हैं जो अन्याय के खिलाफ उठती है। वे हर उस युवा के सपने में हैं जो राजनीति को सेवा मानता है, व्यवसाय नहीं।







