




गोपाल झा
व्हाट्सएप ग्रुप में दिखा एक छोटा-सा वीडियो अपने भीतर कई बड़े सवाल समेटे हुए था। कुछ क्षणों की उस रिकॉर्डिंग में न कोई भूमिका थी, न पृष्ठभूमि। बस भीड़, हिंसा और एक युवक की चीखें। दृश्य ऐसा, जिसे देखकर आंखें ठहर जाती हैं और मन असहज हो उठता है। युवक पर लाठियों और लात-मुक्कों से हमला हो रहा था। आसपास लोग थे, पर साहस कम और भय अधिक। कुछ चेहरे डर से जमे हुए, कुछ तमाशबीन। कुछ देर बाद ही सही, लेकिन कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाई और युवक को हमलावरों से छुड़ाया। वीडियो वहीं समाप्त हो गया, पर सवाल शुरू हो गए।
बाद में पता चला कि यह घटना हनुमानगढ़ जिले के भादरा क्षेत्र के पास गांव मलसीसर की है। युवक रजत शर्मा बस से यात्रा कर रहा था। किराए को लेकर मामूली कहासुनी हुई, एक रुपये के लेन-देन का विवाद। बस में मौजूद एक अन्य व्यक्ति से भी उसकी बहस हो गई। बात वहीं समाप्त हो सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नाराजगी ने हिंसा का रूप ले लिया। फोन किए गए, लोग इकट्ठा हुए और बस स्टैंड पर युवक पर हमला कर दिया गया। यह क्रम बताता है कि गुस्सा कितना संगठित और योजनाबद्ध हो सकता है, यदि उसे रोकने वाला कोई विवेक बीच में न आए।
पुलिस अधीक्षक नरेंद्र सिंह मीना की ओर से तत्परता दिखाई गई। पुलिस अधिकारियों को आरोपितों को पकड़ने के निर्देश दिए गए और मामला दर्ज हुआ। यह व्यवस्था की जिम्मेदारी का निर्वाह है। किंतु किसी भी घटना का मूल्यांकन केवल तत्काल कार्रवाई से नहीं होता, बल्कि उसके दीर्घकालिक प्रभाव से होता है। न्याय की प्रक्रिया निष्पक्ष और दृढ़ होगी या नहीं, यही समाज की असली चिंता है।
यह घटना साधारण इसलिए नहीं है क्योंकि यह एक रुपये के विवाद से कहीं आगे जाती है। यह उस मानसिकता को उजागर करती है, जिसमें असहमति का उत्तर संवाद नहीं, बल्कि हिंसा बन गया है। छोटी-छोटी बातों पर आपा खो देना, और शक्ति प्रदर्शन को समाधान मान लेना, सभ्य समाज के लिए गंभीर चुनौती है। प्रश्न यह नहीं कि विवाद क्यों हुआ, बल्कि यह है कि उसे हिंसा तक पहुंचने से रोका क्यों नहीं गया।
इस पूरे प्रसंग में परिवार, समाज और कानून, तीनों की भूमिका पर विचार आवश्यक है। परिवार, जहां से संस्कारों की शुरुआत होती है, यदि वहां सहनशीलता और संयम का स्थान क्रोध ले ले, तो उसका असर सार्वजनिक जीवन में दिखता है। समाज, जो कभी अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता था, आज कई बार मूकदर्शक बन जाता है। भीड़ का यह मौन ही कई बार हिंसा को बढ़ावा देता है। और कानून, जो अंतिम आश्रय है, यदि कमजोर या प्रभावशाली लोगों के आगे झुकता हुआ दिखे, तो आम नागरिक का विश्वास डगमगाने लगता है।
आज यह धारणा गहराती जा रही है कि ताकत और रसूख के सामने नियम बौने पड़ जाते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो कानून केवल पुस्तकों में रह जाएगा और न्याय एक कल्पना बनकर। इस प्रकरण में भी यही आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं प्रभाव के कारण दोषियों को राहत न मिल जाए। यदि ऐसा हुआ, तो पीड़ित के मन में ही नहीं, समाज के मन में भी कानून की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
यह घटना हमें आत्ममंथन के लिए विवश करती है। क्या हम इतने असहिष्णु हो गए हैं कि संवाद की जगह दंड देने लगे हैं? क्या हमारी सामाजिक चेतना इतनी कमजोर हो गई है कि अन्याय को देखकर भी हम हस्तक्षेप से कतराते हैं? तटस्थ दृष्टि से देखा जाए तो यह मामला किसी एक व्यक्ति या गांव का नहीं, बल्कि उस दिशा का संकेत है, जिधर समाज बढ़ रहा है।
आवश्यक है कि इस घटना को केवल खबर बनाकर न छोड़ दिया जाए। कानून को अपना काम ईमानदारी से करना होगा, समाज को अपनी जिम्मेदारी पहचाननी होगी और परिवारों को फिर से संयम और संवाद के मूल्यों की ओर लौटना होगा। तभी ऐसे वीडियो केवल चेतावनी बनेंगे, भविष्य की पुनरावृत्ति नहीं।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







