



डॉ. एमपी शर्मा
भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर) एक प्रमुख समस्या है। हर वर्ष हजारों महिलाएं इस बीमारी के कारण असमय जीवन खो देती हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में इसका पता तब चलता है, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। देर से पहचान, जानकारी की कमी और सामाजिक संकोच इस रोग को और घातक बना देते हैं। लेकिन इस अंधेरे में उम्मीद की एक मजबूत किरण भी है। सर्वाइकल कैंसर उन गिने-चुने कैंसरों में से है, जिन्हें समय पर टीकाकरण, नियमित जांच और सही जागरूकता से काफी हद तक रोका जा सकता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने एचपीवी वैक्सीन के रूप में महिलाओं को एक प्रभावी सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
एचपीवी यानी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस एक सामान्य वायरस है, जो मुख्य रूप से त्वचा से त्वचा के संपर्क और यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है। वैज्ञानिकों ने इसके 200 से अधिक प्रकारों की पहचान की है। इनमें से कई प्रकार हानिरहित होते हैं और कुछ समय में स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ प्रकार शरीर में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
विशेष रूप से एचपीवी के प्रकार 16 और 18 को सर्वाइकल कैंसर के लगभग सत्तर प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। शोध बताते हैं कि करीब नब्बे प्रतिशत सर्वाइकल कैंसर के मामलों में एचपीवी संक्रमण मौजूद होता है। इसका अर्थ यह है कि यदि एचपीवी संक्रमण को रोका जाए, तो सर्वाइकल कैंसर के अधिकांश मामलों को भी रोका जा सकता है।
एचपीवी संक्रमण केवल सर्वाइकल कैंसर तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं और पुरुषों दोनों में कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। इनमें गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर, योनि और वल्वा का कैंसर, गुदा का कैंसर, गले और मुंह के कुछ प्रकार के कैंसर तथा जननांग मस्से शामिल हैं। इसीलिए एचपीवी को केवल महिलाओं की समस्या मानना एक बड़ी भूल होगी।
एचपीवी वैक्सीन एक ऐसा टीका है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को इस वायरस के खिलाफ पहले से तैयार कर देता है। यह वैक्सीन उन एचपीवी प्रकारों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो सर्वाइकल कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं।
दुनिया के कई देशों में यह टीका राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बन चुका है। जिन देशों में किशोरियों का बड़े स्तर पर टीकाकरण किया गया है, वहां सर्वाइकल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी देखी गई है। यह तथ्य अपने आप में इस वैक्सीन की प्रभावशीलता को सिद्ध करता है।
एचपीवी वैक्सीन यौन जीवन शुरू होने से पहले लगाना सबसे अधिक प्रभावी होता है। नौ से चौदह वर्ष की आयु की किशोरियों के लिए दो खुराक पर्याप्त होती हैं। पहली खुराक के छह महीने बाद दूसरी खुराक दी जाती है। पंद्रह से छब्बीस वर्ष की आयु में टीकाकरण कराने पर तीन खुराक की आवश्यकता होती है। आज कई देशों में लड़कों को भी यह टीका लगाया जा रहा है, क्योंकि वे वायरस के वाहक हो सकते हैं और कुछ प्रकार के कैंसर उनसे भी जुड़े होते हैं। इससे समाज में संक्रमण का प्रसार रोकने में मदद मिलती है।
यह समझना जरूरी है कि एचपीवी वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर के प्रमुख कारणों से तो सुरक्षा देती है, लेकिन यह सौ प्रतिशत सुरक्षा की गारंटी नहीं है। इसी कारण टीकाकरण के साथ-साथ नियमित जांच अत्यंत आवश्यक है। वैक्सीन और जांच, दोनों मिलकर ही प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
तीस वर्ष की आयु के बाद महिलाओं को नियमित रूप से पैप स्मीयर जांच और एचपीवी जांच करवानी चाहिए। इन जांचों से कैंसर बनने से पहले होने वाले बदलावों का पता चल जाता है और समय रहते इलाज संभव हो जाता है।
कम उम्र में विवाह और यौन संबंध से बचाव, सुरक्षित यौन व्यवहार, व्यक्तिगत स्वच्छता, धूम्रपान से दूरी तथा संतुलित आहार और नियमित व्यायाम भी सर्वाइकल कैंसर के खतरे को कम करने में सहायक होते हैं। मजबूत प्रतिरक्षा शक्ति शरीर को संक्रमण से लड़ने में सक्षम बनाती है।
भारत में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं एचपीवी संक्रमण और सर्वाइकल कैंसर के आपसी संबंध से अनजान हैं। सामाजिक संकोच, शर्म और डर के कारण वे समय पर जांच नहीं करातीं, जिसका खामियाजा उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।
समाज में यह स्पष्ट संदेश पहुंचाना बेहद जरूरी है कि सर्वाइकल कैंसर एक रोकने योग्य कैंसर है। एचपीवी वैक्सीन, नियमित जांच और सही समय पर चिकित्सा सलाह से हजारों महिलाओं की जान बचाई जा सकती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने हमें एक ऐसा साधन दिया है, जिससे भविष्य की पीढ़ियों को इस गंभीर बीमारी से काफी हद तक सुरक्षित किया जा सकता है। अब जिम्मेदारी समाज, परिवार और व्यवस्था की है कि जागरूकता बढ़े, किशोरियों का समय पर टीकाकरण हो और महिलाओं को नियमित जांच के लिए प्रेरित किया जाए। यही सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ सबसे मजबूत और स्थायी सुरक्षा है।
-लेखक जाने-माने सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं




