



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! काल 30 मार्च है, सगळै बांचणियां नै राजस्थान दिवस री मोकळी बधाई।
- भाईजी, बधाई तो मोकळी देवो, पण म्है तो अबकाळी उगणीस मार्च नै ई राजस्थान दिवस मना लियो !
- दूसर मना ल्यो, के आंट है ! जद होळी दियाळी, मावस-पून्यू, दो-दो होवण लागी, तो राजस्थान दिवस दो क्यूं नीं होवै !
- भाईजी इयां कियां ? का तो पैली गळत हा, का अबै !
- ना तो पैली गळत हा ना अबै….लोकराज रा रंग है…बदळाव नै अंगेजो।
- इस्या बदळाव भोत फोड़ा घालै भाईजी !
- फोड़ा क्यां रा है….दो-दो उच्छब मनावो…आपां तो उदारवादी हां जलम सूं, फेर क्यूं दोरा होवां।
- भाईजी, हांसी ना करो, सावळ बतावो नीं, इस्या बदळाव थारै जचौ है के ?
…..तो सुणो भाईड़ो…, अर बैनां ई कान मांडल्यै। जद आ सिरिस्टी बणी, बगत नांव री चीज ई कोनी ही……चौफेर अंधारो….कांई ठाह कित्ता बरस…कित्ता जुग….। सुरजीदेव रै आयां पछै ई बगत री गणना सरू होई। आ गणना करी कुण….मिनख ई तो ! न्यारै न्यारै मुलकां में न्यारी न्यारी गणना…., कठैई इस्वी, कठैई हिज्री, कठैई शक संवत तो कठैई विक्रम संवत….। आखै जगत में बगत तो सागी है, उण नै मानखै री गिणत सूं कांई मतलब ! सोचो दिखाण, सुरजीदेव, चांद-तारा, अलेखूं नखतर कांई थारै बगत मुजब भुंवै है के ? बां रै सारू तो 19 मार्च अर 30 मार्च में भेद ई कोनी। लोक होवै भलंई राजा, राजी भलंई होल्यो, म्है बदळ दियो….म्है बदळ दियो, पण इत्तो जाणल्यो, कोई बदळाव कदेई थीर नीं होवै। बगत आयां उण नै बदळनो ई पड़ै ! के दिन….के रात….के राजा के परजा…।
जिण नै थे राजस्थान कैवौ हो, उण नै बण्यां तो सौ साल ई नीं होया है अजेस… अे धोरा, अे भाखर, अे डूंगर, अे रूंखड़ा, जिण रो आप धीणाप करो, सईकां सूं उभ्या है। आड़ावळ तो दुनिया रो सैं सूं जूनो भाखर है, उणरी थरपना कद मनास्यो थे ? कांई आड़ावळ बिना राजस्थान बण सकै ? कांई चम्बल अर लूणी 30 मार्च नै जलमी ही, का पछै चौत री अेकम नै ? जिण जळ, जमीं अर आभै पेटै आपां राजस्थान दिवस मनावां हां, बै तो जुगां सूं उभ्या है भई, बां री थरपना रो दिन किस्यो मानां !
कीं और लारै चालां तो आज रो राजस्थान वैदिककाल में ‘ब्रह्मावर्त’ गिणीज्यो अर त्रेता में ‘मरूकांतर’। द्वापर में, यानी महाभारत रै बगत अठै मत्स्य परदेस, मरूदेस अर जांगळ परदेस होवता। मत्स्य परदेस री राजधानी विराटनगर, जकी बैराठ रै रूप में गिणीजै, बठै अजेस ई भीम गुफा, पांडु पहाड़ी, भीम डूंगरी अर दूजा भोत सा सैनाण लाधै है उण जूनै बगत रा। आज रो नागौर कदेई अहिछत्रपुर होवतो तो चित्तौड़ हो शिवि। गंगानगर होवतो यौद्धेय तो बीकाणो हो जांगळू, भरतपुर-धौलपुर हा शूरसेन तो डूंगरपुर-बांसवाड़ा हा वागड़। झालावाड़ अर प्रतापगढ़ हो मालवो तो जैसलमेर हो वल्ल…और ई दूजा घणाई नांव….जिका बगत री सिंझ्या साथै ढळग्या। जेकर दिवस री बात करां तो म्हारा पुरखा तो बरसां पैली आखा तीज नै आपरै देस बीकाणै री थरपना रो उच्छब मनावता रैया, आज भी म्है मनावां हां, ओ उच्छब छोड्यो कोनी !
तत री बात आ है कै, देस री आजादी रै बगत राजपुताणो न्यारी-न्यारी रियासतां अर ठिकाणां में बंट्योड़ो हो। इण में 19 रियासतां अर 3 छोटा ठिकाणा हा। आं सगळां नै सात कड़ियां में भोत दोरो पोइज्यो, जणा जाय’र कठैई 1 नवम्बर 1956 नै राजस्थान बण्यो। आं कड़ियां में चौथी कड़ी सैं सूं महताऊ गिणीजै, जद 30 मार्च 1949 नै राजपुताणै री चार सैं सूं मोटी रियासतां जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर अर बीकानेर भेळी होगी। उण दिन राजपुताणै रो नांव धराइज्यो, ‘वृहद् राजस्थान’ ! उणी दिन सूं राजस्थान दिवस री थरपना मानीजै, तिथ री बात करां तो उण दिन ही चौत री चानणी अेकम। आपां लारलै पिचहत्तर बरसां सूं 30 मार्च नै ई राजस्थान दिवस रो उच्छब मनावता रैया हां, अबै ई मनावां, के आंट है !
साची बूझो तो 30 मार्च अर चौत री चानणी अेकम दोनां में कोई भेद ई कोनी, फगत मनां रो फेर है अर राज री मरजी। पैली आपणै पुरखां इस्वी संवत मुजब राजस्थान दिवस थरप दियो अर अब राज उण नै विक्रम संवत् रै हिसाब सूं मनावण री बात करै। पुरखां री थरपेड़ी बात नै आगै बधावणो चाइजै ना कै उण नै घड़ी घड़ी फोरणो। पुरखां ई कीं स्याणप रै साथै थरप्यो होसी ओ राजस्थान दिवस। आस्था अर विसवास सूं जुड़ी बातां में छेड़छाड़ ठीक नीं होवै, आ जूनी कथ है।
अेक बात और कैवूं, आपणो देस संविधान सूं चालै। संविधान अंग्रेजी में है जिण रै पैलड़ै पानै माथै 26 नवम्बर 1949 लिख्योड़ो है। इण पोथी रै हिंदी अनुसिरजण रै पैलै पानै माथै विक्रम संवत 2006, मिंगसर री चानणी सात्यूं लिखिज्यो है। दोनूं आपरी जिग्यां सही है, पण जद-जद बात आवै, भारत रो संविधान किण दिन अंगेज्यो, देस अर दुनिया अेक ई बात जाणै 26 नवम्बर, 1949 ! न्यारी न्यारी भासा अर बोलियां आळै इण देस में जे आपां ‘विक्रम संवत 2006, मिंगसर री चानणी सात्यूं’ बतावां तो ओ भोळपणो है, फगत जिद है, जिण में कोई सार नीं दीसै।
सोचणै री बात आ है कै कांई ठाह कित्ती अबखायां, कित्ता कित्ता भख होयो होसी, कुण कुण, कित्ती कित्ती खेचळ खाई होसी, जणा जाय’र आजाद होयो आपणो देस, अर बण्यो आपणो राजस्थान। जे कीं बदळनै री बात है तो भोत सा बदळाव है जिका मानखै रै बिगसाव सूं जुड़्या है, सैं सूं पैली बान्नै बदळनो चाइजै। भासा जिकी जड़ां सूं जुड़ी है, उण री मानता सारू बरसां सूं खेचळ चालै, उण नै थरपो नीं दिखाण !
पण राज तो आपरै हिसाब सूं चालै, अर राज रो आदेस है, तो आपां ई विक्रम संवत् मुजब चालस्यां ! राज नै आपां ई चुण्यो है, थरप्यो है। जेकर राज बदळ जिसी अर कोई दूजो आदेस काडसी तो आपां उण नै मान लेस्यां, राज नै रूसायां कद पार पड़ै भई। पण मन में अेक बात सदांई होवणी चाइजै-
कहो गर्व सूं ई सरीर रै मांय सांस जद ताणी है
म्हे राजस्थानी हां, म्हारी भासा राजस्थानी है….. !
बातां जद गेड़ चढै ठमै ई कोनी, पण बगत रो कैवणो है कै बाकी बातां आगली हथाई में। राजस्थान दिवस री अेकर फेरूं बधाई। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं







