



डॉ. अर्चना गोदारा
आधुनिक समय की कामकाजी महिला केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का प्रयास नहीं कर रही, बल्कि वह अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान की निरंतर लड़ाई भी लड़ रही है। घर और बाहर के बीच संतुलन बनाते हुए उसका जीवन एक ऐसे चक्र में बदल गया है, जहाँ विश्राम से अधिक जिम्मेदारियाँ उसका इंतजार करती हैं। सुबह रसोई की आग से दिन आरंभ करने वाली यह स्त्री दिनभर कार्यालय की चुनौतियों से जूझती है और शाम ढलते ही फिर परिवार की आवश्यकताओं में स्वयं को खपा देती है। आधुनिकता ने उसे शिक्षा और रोजगार तो दिया, परंतु मानसिक स्वतंत्रता और समानता अब भी अधूरी प्रतीत होती है। यह अधूरापन भारतीय समाज की एक तस्वीर बन गया है।
आज की महिला नौकरी केवल धन अर्जित करने के लिए नहीं करती। उसके लिए कार्यक्षेत्र आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और स्वतंत्र पहचान का माध्यम भी है। किंतु समाज की विडंबना यह है कि वह स्त्री की आय को स्वीकार कर लेता है, पर उसकी थकान को नहीं समझता। घर लौटने के बाद भी उससे वही अपेक्षाएँ की जाती हैं जो एक पूर्णकालिक गृहिणी से की जाती हैं। इसके लिए सोशल मीडिया पर एक लाइन भी बहुत फेमस हुई थी कि स्त्री चांद पर जाएं लेकिन जाने से पहले पराठे और चाय जरूर बना कर जाए। भोजन बनाना, बच्चों की पढ़ाई देखना, बुजुर्गों की सेवा करना, घर की व्यवस्था संभालना,यह सब उसके ‘कर्तव्य’ मान लिए जाते हैं। पुरुष यदि कभी रसोई में सहायता कर दे तो उसे संवेदनशील कहा जाता है, जबकि स्त्री का आजीवन श्रम सामान्य मान लिया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्टों में यह स्पष्ट किया गया है कि विश्वभर में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक अवैतनिक घरेलू श्रम करती हैं। भारत के ‘टाइम यूज़ सर्वे’ में भी यह तथ्य सामने आया कि नौकरी करने वाली महिलाएँ भी प्रतिदिन कई घंटे घरेलू कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुषों की भागीदारी अपेक्षाकृत बहुत कम रहती है। यही कारण है कि मानसिक तनाव, अनिद्रा और भावनात्मक थकान जैसी समस्याएँ कामकाजी महिलाओं में तेजी से बढ़ रही हैं। वे बाहर स्वयं को सक्षम सिद्ध करने और भीतर परिवार को संतुलित रखने की दोहरी परीक्षा से निरंतर गुजरती रहती हैं।
भारतीय साहित्य ने स्त्री के इस संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। महादेवी वर्मा ने लिखा था ‘स्त्री न घर का अलंकार बनकर जीना चाहती है और न देवता की मूर्ति बनकर, वह केवल अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वीकृति चाहती है।’ यह पंक्ति आज भी कामकाजी महिलाओं की सबसे बड़ी पीड़ा को सामने लाती है। वहीं मन्नू भंडारी की कहानियों में आधुनिक स्त्री का मानसिक द्वंद्व अत्यंत यथार्थ रूप में दिखाई देता है। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘यही सच है’ में स्त्री केवल संबंधों के बीच उलझी हुई पात्र नहीं, बल्कि अपने निर्णयों और भावनाओं से संघर्ष करती हुई एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में सामने आती है।
समकालीन समाज में भी अनेक उदाहरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं। महामारी के समय ‘वर्क फ्रॉम होम’ के दौरान यह देखा गया कि महिलाओं का कार्यभार पहले से अधिक बढ़ गया। वे एक ही समय में कर्मचारी, माँ, पत्नी और गृहिणी की भूमिकाएँ निभा रही थीं। कई सामाजिक अध्ययनों में यह सामने आया कि इस अवधि में महिलाओं के मानसिक तनाव और अवसाद के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिकता के दावों के बावजूद घरेलू जिम्मेदारियों का असमान बोझ आज भी मुख्यतः स्त्री के हिस्से में ही आता है।
फिर भी स्त्री रुकती नहीं। वह टूटकर भी स्वयं को समेट लेती है और जीवन को आगे बढ़ाती रहती है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। समाज को यह समझना होगा कि महिला का संघर्ष कोई ‘त्याग की महान कथा’ नहीं, बल्कि समान अधिकारों और मानवीय सम्मान की माँग है। वास्तविक प्रगति उसी दिन मानी जाएगी, जब स्त्री की सफलता को उसके अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाएगा, न कि उसके अतिरिक्त ‘बलिदान’ के रूप में।
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं







