



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात ‘हेली’ री, हेली रै हेलां री। जियाजूण रै रागरंग अर अबखायां बिच्चाळै हेली सूं बंतळ करणी जरूरी है भई। किस्तूरी सोधतै मिरगलै ज्यूं आपां आखी जूण भाजता फिरां पण कदे नीं बिचारां, कै इण भाजणै रो कांई बंटसी ! संतां री बाणी है-
हेली म्हारी बा’रै भटकै कांई/थारै सब सुख है घट मांही
हेली म्हारी घट में ज्ञान बिचारो/थारै कुण है बोलणहारो
लोक री बात है कै संगत सूं सायर तिरै। आदमी री संगत ई उणनै बणावै का बिगाड़ै। इण सारू कहीज्यो है-
संगत करणी संत री, क्या नुगरां सूं काम
नुगरा ले जावै नरक में, संत मिलावै राम
पण भाजानाठी रै मांय आपां ओ भूल ई जावां कै पाछो राम सूं मिलणो ई है। चेतै करो दिखाण, यक्ष जद धरमराज सूं बूझ्यो, जीवण रो सैं सूूं मोटो इचरज कांई है तो युधिस्टर कांई पड़ूत्तर दियो-‘आदमी रोज दूजां नै मरतो देखै पण ओ भूल जावै कै उण नै भी अेक दिन मरणो है !’
जीणो जित्तो सांच है उण सूं बेस्सी सांच है मरणो। बारीबंटै सबनै मरणो पड़सी। पण आपां नै चेतो ई कोनी, सुपनां रा घिरमिटिया मांडता, आखै दिन हाऊजफ्फा करता आपां भूले ई बैठ्या हां कै अेक दिन ओ संसार तजणो पड़सी। बस….इणी बात नै चेतावण सारू आपां ‘हेली’ अर ‘हेलां’ री बात करां।
कांई है ‘हेली’ है अर कांई होवै उण रा ‘हेला’ ? इण नै सावळ समझण सारू आपां भगति आंदोलन रै उण दौर में चालां जठै दो न्यारा न्यारा विचार ईश भगति नै अरथावता। निरगुण अर सगुण धारा रा उपासक, संत अर ध्यानी ग्यानी आपरी बाणी में जियाजूण रो मरम बतावता । सगुण धारा परमात्मा रै साकार रूप री उपासक ही तो निरगुण धारा निराकार में भगवान रो बासो बतावती। हेली गीत निरगुण धारा री उपज ही, जिकी जगचावी बणी। इणी परम्परा में आत्मा नै सम्बोधित करता गीत अर सबद रचिज्या, जिका हेली गीत कहीजै। आ गीतां में सबद रो मरम, आत्मा अर परमात्मा रो सगपण, जियाजूण रो तत भोत सांतरै ढंग सूं अरथाइज्यो है। संतां आपरी सबद बाणी में कैयो है-
सबद हमारा मर गया सबदां छोडिया राज
जिण नर सबद विवेकिया उण रा सधिया काज
लागी लागी सब कहै, लागी नहीं रे लगार
लागी दास कबीर के, हुयग्या बेड़ा पार
‘हेली’ आत्मा नै कहीज्यो है। अेक अरथ में ‘हेली’ आपरी साथण, सहेली का सखी रो भाव ई देवै जिण रै मिस लोकगीतां में सीख दिरीजी है। आत्मा रूपी इण हेली नै कोयलड़ी अर पंछीड़ो कैय’र ई बतळाइज्यो है। जगचावा गीत ‘काया नै सिणगार कोयलिया/पर मंडळी मत जाइजो रे/पर मंडळी रा नंई रे भरोसा अधबिच में रूळ जावो रे….’, का पछै ‘पंछीड़ा लाल पाछी, पढग्यो रे उलटी पाटी…।’ इण बात री साख भरै। हेली री पुकार हेलां सूं होवै। आत्मा सदांई परमात्मा सूं नेह लगावण सारू चेतावती रैवै, ओ ई आं गीतां रो मरम है, जठै दुनियावी बातां फगत अेक भरम है।
अेक जगचावै हेली लोकगीत में दुनियादारी नै औगुणगारी बताइज्यो है। इण गीत नै आपां सुणां तो ठाह लागै हेली रै मिस जियाजूण रै मरम नै अरथावती कित्ती सांतरी बात कहीजी है, बांचो दिखाण-
हेली म्हारी निर्भय रहीजे अे
दुनियादारी औगुणगारी/वान्नै भेद मत दीजे अे
हेली म्हारी निर्भय रहीजे अे…
सतसंगत में बैठ सुहागण राज कमाइजे अे
तन में गरीबी मन में फकीरी
थोड़ी दया राखीजे अे
ज्ञान झरोखै बैठ सुहागण सीतळ रहीजे अे
हेली म्हारी निर्भय रहीजै अे…
अेक दूजै हेली गीत में संतां री सीख अंगेजण जोग है-
संगत करो नीं निरमल संत री, म्हारी हेली
आवागमन मिट जाय रे, जलम मरण छूट जाय रे….
चंदन उग्यो रे हरियै बाग में म्हारी हेली
खुशी भयी बनराय रे
आप सुगंध औरां नै करै म्हारी हेली
रही रे सुगंधी छाय रे…
पंजाबी भासा में ई हेली रा घणाई गीत लाधै। बठै हेली नै ‘जुगनी’ कहीज्यो है बुल्लेशाह, शेख फरीद अर दूजै सूफी संतां जुगनी नै लेय’र भोत सी बाणी गाई है। पंजाब में जुगनी गीतां री अेक सबळी लोक परम्परा है। जुगनी सबद जुगनू सूं नीर्स यो है जिको चानणै रो प्रतीक है। भाई खानसिंघ नाभा रै जगचावै पंजाबी सबदकोस री बात करां तो उण में जुगनी रो अेक अरथ लुगायां रै गळै रो तिमणियो ई जुगनी कहीजै, ओ तिमणियो मियां री तस्बीह रो दूजो रूप है। जुगनी रै कीं पंजाबी गीतां री बानगी देखो दिखाण-
- ओ वीर मेरेआळी जुगनी कैंदी अे/अे नांम सांई दा लैंदी अे…
- जुगनी डिग पई विच रोई/ओ ता रो रो कमळी होई/ओदी वात नीं लैंदा कोई/ते कलमें बिना ना मिलदी ढोई/…मेरे पीर दी जुगनी जी
- अल्ला बिस्मिल्ला तेरी जुगनी/हाय सोणया वे तेरी जुगनी/हाय तारया वे तेरी जुगनी…
- मेरी जुगनी गई गवाची, वे रब्बा मैं की करां…
आपणै लोक में ई हेली रा भोत सा गीत है, सबद है, बाणी है, अेक पूरी परम्परा है। राजस्थानी रा अे हेली गीत आपणी हेमाणी है, आज घड़ी नवा हेली गीत रचीजै ई कोनी तो पछै आं री तो संभाळ करां। आज री हथाई में कीं चावा हेली गीत आपनै बताय दूं आप सोध’र बांच्या दिखाण- - म्हे तो पूरबिया पूरब देस रा म्हारी हेली अे/म्हारी बोली लखै ना कोय म्हारी हेली अे…
- हेली रे, हालो रे चालो उण देस में रे…
- हेली म्हारी परण्योड़ी होती तो पीव नै पूजती रे…
- कांई तो बादळियां री छांवली म्हारी हेली, कांई नुगरां री प्रीत…
- अब तो सारा दुख भूलगी म्हारी हेली अे, राम रतन धन पाय…
- चाल सखी सत्संग में चालां अे…
- अब कियां होवै जग में जीवणो अे हेली/लाग्या सबदां रा बाण..लाग्या बिरहा रा बाण…
ताऊ शेखावाटी रो अेक जगचावो गीत और सुणल्यो दिखाण-
‘हेली हेलो पड़्यां हवेलण छूट्यां सरसी अे….’
अठै हेली आत्मा है, हेलो मौत रो बुलावो है अर हवेलण काया नै कहीज्यो है। इण गीत में ताऊ भोत सखरै ढंग सूं सीख दी है। इण सूं पैली कै हेला पड़ै हवेलण नै चेतणो चाइजै। आज री हथाई रो सार ओ है कै मिनखाजूण में असल धन है हेली। हेली री सुणो, ज्यूं काया नै निरमल राखो उणी ढाळै हेली री कदर करो। आं गीतां पर आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं





