





रूंख भायला.
राजी राखै रामजी! आज बात खीचड़ै री, इमलाणै री…। भई आखा तीज है आज ! आज नीं तो कद, आपां नीं तो कुण !! आपणै बडेरां नै लखदाद, कै बां बार-तिंवार रै मौकै जीमण री भोत सांतरी रीत पळाई, भेळा बैठणो-भेळा जीमणो…आ ई तो पिछाण है मुरधर रै मानवी री। आखा तीज री बधाई साथै भरत व्यास रो अेक दूहो आपरी निजर-
पुन्न बडेरां रा आछा, बरकत है बांरी रीतां में
त्यूंहार बणाया इस्या-इस्या, गाया जावै जिका गीता में
आखा तीज भोत सुभ दिन गिणीजै। आपणै वेद-पुराणां री मानता है कै इण तिथ सूं ई सतजुग अर त्रेताजुग सरू होया। इणी सारू आखा तीज नै ‘जुगादि तिथ’ कहीजै। भगवान परसूराम जी रो जलम ई आखातीज रो है। लोक में भी इण तिथ री घणी मानता है, ब्याव सगाई होवै भलंई कोई सुभ काम, आखा तीज अबूझ सावो है। आपणै तो बीकाणै री थरपना ई आखा तीज नै होई। लोक में कहीजै-
आखा रोहण बायरी, राखी सरवन न होय
पोही मूळ न होय, तो मही डूलती जोय
लोक रै इण दूहै मुजब जे आखा तीज पर रोहिणी नखतर नीं आवै, रखपुन्यु पर श्रवण नखतर नीं होवै, पौ माह री पुन्यू नै मूळ नखतर नीं पड़ै तो धरती पर विपदा रो भार आवै ई आवै। बात कित्ती’क सांची है, ओ तो ठाह नीं पण नखतरां रै कूड़ सांच नै अजेस मिनख सावळ अरथा नीं सक्यो है। बां रै भूंवणै अर विज्ञान रै नेम कायदां बिच्चाळै कीं और ई तत है, जिको पकड़ में नीं आयो है….। पण थे तो मोद मनावोे, अबकाळै आखा तीज नै रोहिणी नखतर है भई।
‘भाईजी, जबरी बात बताई है, पण बात तो जीमण सूं सरू होई, खीचड़ी अर इमलाणै री…. अबै बिन्नै ई कीं आगै बधावो, मूंडै में कीं ल्याळ तो बणै…।’
खावणखंडां नै ल्याळ री दरकार ई कोनी ! अर सुण भई, खीचड़ी नंई…बात खीचड़ै री है। खीचडी़ में कोई भेद कोनी…दाळ-चावळ भिजोल्यो, सिजाल्यो… बस त्यार…।
अर खीचड़ो…!
खीचड़ो सोरै सांस कद बणै ! मोटा धान मोठ-बाजर बपराणा पड़ै। खाली बपराणै सूं ई पार नीं पड़ै, खीचड़ो बणावण सारू घर री लुगायां नै खपणो पड़ै। पैली कूटो, फेर छड़ो, फेर पूरो सिजावो। खीचड़ो कूटणो, छड़नो अर सिजावणो घणो दोरो, हाथ अर कड़तू सै चस-चस करण लाग जावै। थे कैयस्यो, मिक्सी होवै नीं भाईजी, क्यूं दोरो होवणो..। बात तो थारी ठीक है, पण जे असल स्वादिया लेवणा है तो खीचड़ो तो कूटणै अर छड़नै सूं ई बणसी, नीं पछै पेट भराई करबो करो, कुण रोकै है !
करमांबाई रो चावो लोकगीत चेतो करो दिखाण-
‘थाळी भरकै ल्याई खीचड़ो उपर घी री बाटकी
जीमो म्हारो श्याम धणी जिमावै बेटी जाट की…’
मुरधर रो ओ सागी कूटेड़ो खीचड़ो ठाकुरजी जिम्यो जद ई तो भगत अर भगवान री लाज रैयी !
मुरधर री रीत है, आखा तीज रै मौकै ओ खीचड़ो सात धान रळा’र बणाइजै, फेर लगाइजै ठाकुरजी नै भोग। घी बिना क्यां रो खीचड़ो…दोनूं रळै जणा ई असल स्वाद आवै। खीचड़ै में घर रो घी होवै तो कैवणो ई कांई ! आखा तीज रै दिन लुगायां घरधणी अर हाळी बेटां नै थाळी में खीचड़ो पुरसै, ऊपर सूं घालै धपाऊ घी। जीमण सरू करणै सूं पैली घरधणी अर हाळी बेटा खीचड़ै रै बिच्चाळै घाल्योड़ै घी में आपरो मूंडो देखै, जोगमाया नै हाथ जोड़ै, ठाकुरजी सूं चौफेर सुख सायंती री कामना करै, फेर जीमण सरू करै। जीमण साथै बड़ियां रो साग, गुड़ इमली घाल’र बणायोड़ो इमलाणो, तळेड़ा पापड़, गुवारफळी और ई कांई ठाह कांई कांई…। एक और बात, खीचड़ै रो आनंद आप चमची सूं नीं लेय सको, उण नै तो घी साथै आंगळयां सूं मथणो पड़ै जणा असल स्वाद बैठै !
पण ओ खीचड़ो खा’र बैठ्यां नीं सरै, काम करणो पड़ै, नीं पछै पेट आंवसीजै, लेबो करो डकारां, चाटबो करो पाचक चूरण, खाटै री गोळ्यां, बाजणिया कैप्सूळ ! खीचड़ो तो हाळी रो जीमण है, मैणतकस मिनखै री खुराक है, जिम्यां पछै खेत में जाय’र सूड काडो भलंई कुत्तर करो, कीं नै कीं तो डील नै दोरो करणो ई पड़सी।
खैर, बात नै आगै बधावां। आपणै मुरधर में आखा तीज री अेक और पिछाण है, बाळपणै रा ब्याव। कैबत है, इण अबूझ सावै गैला गूंगा ई परणीज जावै। अबै थे स्याणा कैवो भाऊं गूंगा, आपणा बडेरा तो टाबरां रा ब्याव बाळपणै में ई करता रैया है। अठै तंई, कै थाळी में बिठाय’र टाबरां नै फेरा दिरावता रैया है, लोकदेव तेजोजी ई बाळपणै में परणीजग्या, और ई कांई ठाह कुण कुण…। म्हारी मा बतावै, उण रो ब्याव ई ते’रा-चउदा री उमर में होग्यो हो। बाळपणै रा ब्याव भोत फोड़ा घालै, के आदमी….के लुगाई…दोनूं नासमझ….ना मन सूं अर ना ई तन सूं….। बाळपणै रै ब्याव री इण समाजू कुरीति नै मेटण सारू सरकार कानून ई बणायो है, आज घड़ी जे ब्याव रै बगत छोरै री उमर 21 अर छोरी री 18 साल सूं कम होवै तो बो ब्याव अेक अपराध है। चेतो राख्या, इण कानून में मायतां नै दो बरसां री सजा अर लाख रिपियां रो डंड ई लगाइजै…। पण फेर ई भोळा-स्याणा लोगड़ा किस्या मानै…ओल्लै छान्नै मांडबो करै ब्याव…। आखा तीज नै तो पुलिस ई इस्या ब्याव सूंघती फिरै, कीं कारवाई तो करां पछै ! हां, इस्यै ब्यावां में जीमणीयां रै कोई डंड कोनी !
आज री हथाई रो सार ओ है, आखा तीज नै खीचड़ो जीम्यो है तो भाज-भाज काम करो लाडी। खेत होवै भलंई घर….दुकान होवै भलंई नौकरी…डील नै कीं दोरो करणो पड़सी…। हां बाजणियै कैप्सूळ सूं धाको धिकाणो है तो बात अलायदी है। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बस्सो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं




