



डॉ. एमपी शर्मा
सनातन संस्कृति में अक्षय तृतीया को ऐसा पर्व माना गया है, जिसकी शुभता कभी क्षीण नहीं होती। यह वही पावन तिथि है, जब आरंभ किया गया प्रत्येक सत्कर्म अक्षय फल देता है। इसी दिव्य दिन भगवान परशुराम का अवतरण हुअ, कृधर्म की पुनर्स्थापना, अन्याय के प्रतिकार और सामाजिक संतुलन के लिए। इसलिए अक्षय तृतीया केवल शुभ मुहूर्त नहीं, बल्कि धर्म-स्मरण का उत्सव भी है।
भगवान परशुराम, भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद उनमें क्षत्रिय जैसा पराक्रम, शौर्य और युद्ध कौशल था। यही कारण है कि उन्हें ‘ब्राह्मणत्व और क्षात्रत्व का अद्वितीय संगम’ कहा गया। यह संगम हमें सिखाता है कि जन्म से नहीं, कर्म और चरित्र से व्यक्ति की पहचान होती है।
पुराणों में वर्णित है कि भगवान परशुराम ने अत्याचारी और अधर्मी क्षत्रियों का 21 बार संहार किया। इस तथ्य को सतही दृष्टि से देखना भूल होगी। उनका संघर्ष किसी जाति या वर्ग के विरुद्ध नहीं था, बल्कि अधर्म, अन्याय और सत्ता के अहंकार के खिलाफ था। जब शक्ति विवेक खो देती है, तब धर्म का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। परशुराम का अभियान इसी संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रयास था ताकि समाज में न्याय और मर्यादा कायम रह सके। आज के संदर्भ में यह संदेश और भी प्रासंगिक है। सत्ता, धन या बल जब अहंकार में बदल जाए, तब उसका नियंत्रण आवश्यक हो जाता है। परशुराम का जीवन बताता है कि शक्ति का उद्देश्य संरक्षण है, दमन नहीं; न्याय है, प्रतिशोध नहीं।
भगवान परशुराम केवल महायोद्धा ही नहीं, बल्कि अद्वितीय गुरु भी थे। उन्होंने अनेक महान योद्धाओं को शस्त्र-विद्या, नीति और अनुशासन की शिक्षा दी। उनके शिष्यों में भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे नाम प्रमुख हैं। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि परशुराम युद्ध से पहले ज्ञान को महत्व देते थे। उनके लिए गुरु का स्थान सर्वाेच्च था और शिष्य का दायित्व अनुशासन।
परशुराम जी का जीवन अत्यंत संयमित और तपस्वी रहा। उन्होंने भौतिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाकर धर्म और समाज की सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। वे ‘चिरंजीवी’ माने जाते हैं अर्थात आज भी धर्म की रक्षा के लिए धरती पर विद्यमान। यह मान्यता प्रतीकात्मक रूप से यह बताती है कि जब तक धर्म जीवित है, परशुराम का विचार जीवित है।
उनके जीवन से हमें कई कालजयी शिक्षाएँ मिलती हैं, धर्म की रक्षा सर्वाेपरि है। शक्ति का प्रयोग सदैव न्याय के लिए होना चाहिए। ज्ञान और बल का संतुलन ही आदर्श जीवन का आधार है। अहंकार का अंत निश्चित है। गुरु और अनुशासन के बिना विद्या अधूरी है।
अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम का स्मरण हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सत्य, धर्म, अनुशासन और संतुलन को अपनाएँ। वे केवल अतीत के योद्धा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक हैं।
आज आवश्यकता है कि हम परशुराम जी के वास्तविक संदेश को समझें न कि केवल कर्मकांड तक सीमित रहें। समाज में न्याय, समरसता और नैतिकता की स्थापना जरूरी है। परंपरा को निभाना अच्छा है, पर उसके अर्थ को जीना उससे भी बेहतर। यही सनातन की असली ताकत है।
-लेखक सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं




