




रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! दिन फुर या तो सरी…। राजस्थानी सारू राज तो नीं चेत्यो पण ‘सुप्रीम कोर्ट’ चेता दियो राज नै। 12 मई नै आपरै फैसलै में कोर्ट कैयो ‘मायड़ भासा में भणाई अेक संवैधानिक अधिकार है, म्है उण नै छीजतो नीं देख सकां। राजस्थान री सरकार इस्कूलां अर कॉलेजां में राजस्थानी री भणाई सरू करै, इण बाबत आपरी नीति बणावै अर 30 सितम्बर 2026 तंई सुप्रीम कोर्ट सामीं रिपोर्ट हाजर करै।’
आ होई नीं बात ! राजस्थानियां सारू ई सूं मोटो हरख और कांई, कै अबै आपणै टाबरां नै आपरी भासा में भणनै रो मौको विधिवत ढंग सूं मिलैला, आपणी संस्कृति अर संस्कार नै वै सांगोपांग ढंग सूं ओळख सकैला। इण मंगळ मौकै पर भासा सारू लड़नियै हर जूंझार नै घणा-घणा रंग।
अबै आपणो के फरज है ? आज हथाई में इण री बात करां। पैली बात तो आ समझां, जठै भासा रो माण है बठै बिगसाव है। दक्खिण नै देख लो, बंगाल, गुजरात अर पंजाब नै देख लो, सै आपरी भासा में बात करै, बोलतां थकां गुमेज करै। आपां नै संको आवै। अरे भोळा स्याणो, आपरी भासा में बोलणो गंवारपणो नीं, गुमेज री बात है। राजस्थानी बोलते जाबक ई नीं संकणो ! आप नै आवै जिसी बोलो, …..बस बोलो।
‘आ के बात होई ! बोलां तो हां ई भाईजी…।’
बोलो कोनी लाडी, किरड़ियै दांई पलटीमार हो थे ! सरकारू दफ्तर, थाणा, तैसील, कचेड़ी में जावता ई थारी भासा बदळ जावै। जेकर थान्नै कोई कलेक्टर, एसडीएम सूं बात करणी होवै तो थे फट सूं हिंदी, का अंग्रेजी में उतर जावो। ईं संके नै उतारो। घर सूं, राजस्थान सूं बारै जावां, बठै तो फेर ई जचौ कै आपां नै बंतळ सारू किणी दूजी भासा में बात करणी पड़ै, आगलो आपणी भासा जाणै ई कोनी, पण आपरी गळी में, आपरै राज्य में कठै दरकार है दूजी भासा बोलण री…। चेतै राखो, वोटां रा धणी थां सूं राजस्थानी में ई हाथाजोड़ी करी ही, पगां पोतिया राजस्थानी में ही रेड़ीज्या हा। आ अलायदी बात, कै विधानसभा पूगतां ई बै हिंदी अर अंग्रेजी रा हिमायती बण्या बैठ्या है। जठै कठैई मौको मिलै वां रा ई कान खांचो, पूछो वां सूं, राजस्थान री विधानसभा, राजस्थान रै सचिवालय में राजस्थानी बोलणो गुनाह है के ?
अरे गैलो ! आपरै लोगां बिच्चालै आपां दूजी भासा में ग्यान बांटां तो आपणै सूं डोफो कुण….। आपरै टाबरां सूं अंग्रेजी में गिटपिट करणै सूं थे मोटा नीं बजो, इंग्लैंड में तो मंगता ई अंग्रेजी बोलै, इण में क्यां री बड़ाई ! जे थे राजस्थान रा रैवासी हो तो आपरै टाबरां नै बतावो, थारी मा कियां बोलै, दादी कियां बोलती, थारो दादो गाळ कियां काडतो, हेला कियां मारतो। छोटा-छोटा सबद, आपणा ओखाणा, कैबतां अर बात बताणी सरू करो। जे ठाह नीं है तो पछै हथाई री जाजम पर पधारो, सीखो लाडी। जे थान्नै थारी पिछाण जीवते राखणी है, ओळखाण बचायां राखणी है, आपरी भासा सीखो अर सिखावो।
अेक और बात, भासावां मोकळी सीखो, हक है थारो, हूंस है थारी। आज घड़ी अंग्रेजी बिना काम ई नीं चालै, देस री राजभासा हिंदी भी जरूरी है। पण पैली आपरी मा बोली नै सावळ ओळख ल्यो। बिना किणी इस्कूल, बिना फदीड़ खायां जिकी भासा आप मा रै खोळै में बैठ’र सीखी, हांचळां चूंघती बेळा सुणी, वा ई तो थारी मायड़ भासा है, उण रो माण करणो ई सांचौ मानखै री पिछाण है। आखी दुनिया रा चावा-ठावा लोग आपरी मायड़ भासा री वकालत करता रैया है। साच तो ओ भी है कै मायड़ भासा रो माण करणिया ई दूजी भासावां सीखण में खासा आगै है। इण रो सबळो उदाहरण है दक्खिण रा लोग, जिकां री अंग्रेजी में पकड़ अंग्रेजां नै कड़खै बिठावै।
पण मेह बरस्यां सै राजी नीं होवै ! कीं टूमां इसी भी है जिकां नै लागै भासा रै नांव माथै मारवाड़ी बोली थोपी जा रैयी है। वै भासा रा विद्वान नीं है, वान्नै ठाह ई कोनी, कै दुनिया री हर भासा में बोलियां होवै, भासा माळा है तो बोली उण रा मिणिया। माळा में हर मिणियै रो मोल होवै। कई झालर राजस्थानी री लिपि नीं होवण री बातां करै, वान्नै ठाह ई कोनी कै राजभासा हिंदी री कोई लिपि कोनी, आठवीं अनुसूची में सामल दूजी छव भासावां री आपरी कोई लिपि कोनी। फेर राजस्थानी कन्नै तो मुड़िया ही, जिण नै वाणियावटी कैवता, बगत रै फेर में आपां उण नै गमाय दी। अबै देवनागरी में लिखिजै है आपणी भासा। जद हिंदी, मराठी, बोडो, सिंधी जिसी भासावां देवनागरी में लिखीज अर बांचीज रैयी है तो पछै राजस्थानी सारू उलटी बात क्यूं ?
हिंदी रा कई हिमायती कैवै, राजस्थानी रै बधेपै सूं हिंदी कमजोर होवैली, वान्नै हिंदी रा ख्यातनांव आलोचक डॉ.नामवर सिंघ री बात चेतै राखणी चाहिजै-
श्जिन राजस्थानियों ने हिंदी को उत्पन्न किया, वे हिंदी के विरोधी कैसे हो सकते हैं !’
बातां कित्ती भी हो सकै, पण हथाई में अेक सीख आ भी ल्यो, इस्यै गैलसप्पै विद्वानां सूं उळझणो नीं। वै जाणै ई कोनी कै लोकराज में सुप्रीम कोर्ट री बात रा कांई मायना होवै, कोई राज सुप्रीम कोर्ट री बात नै नट नीं सकै ! पण चेतै राखो, इसी घोना सारू स्याणा लोग कैवै, श्मोथो मिनख भी एक मिंट में इस्या सवाल बूझ सकै जिकां रा जवाब सौ विद्वान रळ’र एक बरस में नीं दे सकै।श्
आज री हथाई रो सार ओ है कै घर में, परिवार में, गळी बास में राजस्थानी बरतणो सरू करो, आपरै लोगां बिच्चाळै बिना किणी संकै रै बोलो, घर रै टाबरां सूं मा बोली में बात करो, राजस्थानी साहित बांचो अर बंचावो, सैं सूं मोटी बात आ, हीण भावना नै तजो, धड़ल्लै सूं बोलो-
कहो गर्व सूं ईं सरीर रै मांय सांस जद ताणी है
म्है राजस्थानी हां, म्हारी भासा राजस्थानी है !
बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं








