



ग्राम सेतु डेस्क
कागद फाउंडेशन और मरुधरा साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में हनुमानगढ़ जंक्शन स्थित कागद पुस्तकालय शब्दों, संवेदनाओं और सरोकारों से गूंज उठा। पर्यावरण संरक्षण और परिवार विखण्डन जैसे गंभीर विषयों पर आयोजित काव्य गोष्ठी में कविता महज़ रस नहीं रही, वह सवाल बनी, चेतावनी बनी और उम्मीद भी। बरगद से लेकर आंगन के फूल तक, बुढ़ापे की लाठी से लेकर अकेलेपन के शहर तक, कवियों ने मंच से जीवन का पूरा वृत्त खींच दिया। श्रोताओं की आंखें कभी नम हुईं, कभी तालियों से हॉल भर उठा। अध्यक्षता कर रहे वीरेन्द्र छापोला के संतुलित स्वर, अतिथियों की सधी टिप्पणियां और रचनाओं की विविधता ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। जहां साहित्य ने परंपरा की जमीन पर खड़े होकर आज की उलझनों से दो-टूक संवाद किया। वरिष्ठ साहित्यकार दीनदयाल शर्मा एवं शिक्षाविद् डॉ. संतोष राजपुरोहित बतौर अतिथि मौजूद रहे।
वरिष्ठ कवि नरेश मेहन ने ‘बरगद’ और ‘पगडंडियां’ रचनाओं से गोष्ठी की शुरुआत की। उन्होंने ‘शहर’ कविता तथा ‘परिवार’ शीर्षक रचना के माध्यम से भरे परिवार में भी अकेलेपन का चित्रण किया। कवि मनोज पुरोहित ‘अनन्त’ ने ‘आओ आज बात करते हैं’, राजस्थानी कृति ‘तपती लाई में रख्ख ही है हड़मान जी’ और ‘बिखरना ही था’ का पाठ किया।
मोहनलाल वर्मा ने ‘बुढ़ापे की लाठी’ व ‘बाबुल की उंगली पकड़’ कविता प्रस्तुत कर पारिवारिक संबंधों को उकेरा। कवि विनोद यादव ने ‘आंगन के फूल’ के जरिए बच्चों की सेहत और पर्यावरण को लेकर चिंता जताई तथा लघुकथाएं सुनाई। अदरीस ‘रसहीन’ ने बेरोजगारों के दर्द और समाज के दोहरे मापदंडों पर रचनाएं प्रस्तुत की। शायर डॉ. प्रेम भरनेरी ने ‘तुमको देखा है आइना करके’ और ‘इक झूठा सा इनकार, कभी इकरार से बेहतर होता है’् गजलें सुनाई।
वीरेन्द्र छापोला ने राजस्थानी भाषा संबंधी सर्वाेच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए ‘माने कानी’ व ‘जंगल जीवन हारेगा’ रचनाएं प्रस्तुत कीं। दीनदयाल शर्मा ने ‘भीत’ और ‘शहर’ रचनाओं के माध्यम से परिवार और पर्यावरण विषयक चुनौतियों को सामने रखा। विशिष्ट अतिथि डॉ. संतोष राजपुरोहित ने साहित्य को आंतरिक व्यक्तित्व निखारने के लिए जरूरी बताया।







