




ग्राम सेतु ब्यूरो.
क्षत्रीय महासभा राजपूत समाज अखंड भारत योग प्रकोष्ठ के तत्वावधान में अहमदाबाद स्थित द न्यू लिटिल फ्लावर हायर सेकेंडरी स्कूल में सेमिनार का आयोजन किया गया। इसमें योगगुरु डॉ. श्रीनाथ झा ने शिक्षक एवं विद्यार्थियों को शिक्षा, मनोविज्ञान और योग के आपसी संबंध पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज की शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि मन, मस्तिष्क और संस्कारकृतीनों का संतुलन आवश्यक है।
डॉ. श्रीनाथ झा ने कहा कि सेमिनार का मुख्य उद्देश्य शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच शैक्षणिक ज्ञान का स्वस्थ आदान-प्रदान करना है। शिक्षक के प्रति नकारात्मक भाव बच्चों की सीखने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। यदि बच्चे के मन में शिक्षक के लिए नफरत या भय हो, तो वह पढ़ने, लिखने और समझने में लगातार कठिनाइयों का सामना करता है। ऐसे में शिक्षक का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह प्रेम, धैर्य और संवाद के माध्यम से बच्चे का विश्वास जीते।
मंद बुद्धि बच्चों के विकास पर बोलते हुए डॉ. झा ने कहा कि हर बच्चा किसी न किसी क्षेत्र में प्रतिभाशाली होता है। जरूरत है उस क्षेत्र की पहचान करने की। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ बच्चे शैक्षणिक विषयों में कमजोर होते हैं, लेकिन कला, खेल या व्यवहारिक कार्यों में उत्कृष्ट हो सकते हैं। सही मार्गदर्शन और सकारात्मक वातावरण से उनकी प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
सेक्स एनर्जी प्रबंधन जैसे संवेदनशील विषय पर बोलते हुए योगगुरु ने कहा कि किशोरावस्था में विद्यार्थियों के भीतर ऊर्जा का उफान स्वाभाविक है। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा न मिले, तो यह मानसिक तनाव और भटकाव का कारण बनती है। योग, ध्यान और अनुशासित दिनचर्या के माध्यम से इस ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में बदला जा सकता है।
परीक्षा के दौरान हाथ रुक जाने की समस्या पर चर्चा करते हुए डॉ. झा ने इसे मनोवैज्ञानिक दबाव का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि डर, आत्मविश्वास की कमी और अपेक्षाओं का बोझ बच्चों को परीक्षा हॉल में जकड़ देता है। नियमित अभ्यास, सकारात्मक सोच और श्वास तकनीक से इस समस्या का समाधान संभव है।
डिस्लेक्सिया विषय पर उन्होंने शिक्षकों से अपील की कि ऐसे बच्चों को कमजोर या लापरवाह न समझा जाए। समय पर पहचान और विशेष शिक्षण पद्धतियों से इन बच्चों को भी मुख्यधारा में लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अज्ञानता नहीं, समझ की कमी सबसे बड़ी बाधा है।
स्व-अध्ययन के तरीके पर बोलते हुए डॉ. झा ने एकलव्य का उदाहरण देते हुए कहा कि आज भी बिना ट्यूशन के पढ़ाई संभव है, बशर्ते विद्यार्थी में अनुशासन, लक्ष्य और सही मार्गदर्शन हो। संगत के प्रभाव पर उन्होंने स्पष्ट किया कि दोस्त और माहौल बच्चे के निर्माण और पतन, दोनों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
ब्रेन एक्सरसाइज के माध्यम से मस्तिष्क को सक्रिय रखने के व्यावहारिक उपाय बताते हुए उन्होंने कहा कि रोजमर्रा के छोटे अभ्यास भी बच्चों की एकाग्रता और स्मरण शक्ति को बढ़ा सकते हैं। विषयवार असंतुलन पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि किसी एक विषय में कमजोरी का कारण अक्सर मानसिक डर या गलत आधार होता है, न कि बुद्धि की कमी।
सेमिनार के समापन पर विद्यालय के अध्यापकों ने कार्यक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। विद्यालय के प्रिंसिपल एवं संचालक प्रवीण सिंह ने कहा कि यदि इस प्रकार के कार्यक्रम देशभर के विद्यालयों में हों, तो लाखों बच्चों और शिक्षकों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है।
कार्यक्रम में क्षत्रीय महासभा राजपूत समाज अखंड भारत के अध्यक्ष ठाकुर जगदीश सिंह राघव, वरिष्ठ उपाध्यक्ष अर्चना सिंह तथा वरिष्ठ महामंत्री एन.पी. सिंह ने भी अपने विचार रखे और आयोजन को सफल बताया।







