




डॉ. अर्चना गोदारा
मनुष्य के इतिहास में चोरी के अनेक रूप दर्ज हैं-धन की चोरी, भूमि की चोरी, अधिकारों की चोरी और विश्वास की चोरी, किंतु वर्तमान समय ने एक ऐसे चोर को जन्म दिया है, जिसकी उपस्थिति दिखाई नहीं देती, जिसकी गिरफ्तारी संभव नहीं और जिसकी लूट का शोर भी सुनाई नहीं देता। यह चोर है-हमारा ध्यान। वह न ताले तोड़ता है, न जेब काटता है, फिर भी हमारी सबसे बहुमूल्य संपत्ति हमसे छीन लेता है। क्योंकि मनुष्य का वास्तविक वैभव उसके पास रखा धन नहीं, बल्कि उसका केंद्रित मन है। जिस क्षण हमारा ध्यान हमसे छिन जाता है, उसी क्षण हमारी सोच, हमारी संवेदनाएँ, हमारे निर्णय और यहाँ तक कि हमारा व्यक्तित्व भी किसी और के प्रभाव में ढलने लगता है। समाजशास्त्र की दृष्टि से देखें तो प्रत्येक युग अपने नागरिकों के ध्यान का निर्माण करता है। कभी परिवार, लोकपरंपराएँ, गुरु, पुस्तकें और प्रकृति मनुष्य के ध्यान के केंद्र थे। आज एल्गोरिद्म, विज्ञापन, रील, नोटिफिकेशन और अंतहीन स्क्रीनें हमारे मानसिक संसार की संरचना कर रही हैं। आधुनिक बाज़ार अब केवल वस्तुएँ नहीं बेचता, वह हमारी एकाग्रता खरीदता है, क्योंकि जिसे मनुष्य का ध्यान मिल जाता है, धीरे-धीरे उसके विचारों, इच्छाओं और उपभोग पर भी वही अधिकार स्थापित कर लेता है। यह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जहाँ मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र समझता है, जबकि उसके निर्णयों की डोर अदृश्य शक्तियों के हाथों में होती है। शायद इसलिए आज जानकारी का विस्फोट है, पर विवेक का नहीं। संपर्कों की भीड़ है, पर आत्मीयता का अभाव है। सुविधाओं का विस्तार है, पर भीतर एक अनाम रिक्तता लगातार बढ़ रही है।
मनोविज्ञान इस परिवर्तन की गहरी व्याख्या करता है। मानव-मस्तिष्क स्वभावतः नवीनता की ओर आकर्षित होता है। हर नई सूचना, हर चमकता संकेत, हर छोटा-सा नोटिफिकेशन मस्तिष्क में क्षणिक उत्तेजना उत्पन्न करता है और यही उत्तेजना धीरे-धीरे आदत का रूप ले लेती है। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अब एक विचार पर देर तक ठहर नहीं पाता। पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़ते-पढ़ते उसका हाथ मोबाइल तक पहुँच जाता है। परिवार के बीच बैठा हुआ भी उसका मन किसी आभासी दुनिया में भटकता रहता है। अकेले होने पर वह अपने भीतर उतरने के बजाय स्क्रीन की रोशनी में शरण खोजता है। यह केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के विखंडन की प्रक्रिया है। जिस मन में निरंतर व्यवधान हो, वहाँ गहराई नहीं जन्म लेती। और जहाँ गहराई नहीं होती, वहाँ न मौलिक विचार जन्म लेते हैं, न रचनात्मकता, न धैर्य और न ही आत्मबोध। यही कारण है कि आज की पीढ़ी के पास अभूतपूर्व जानकारी होते हुए भी निर्णय लेने की क्षमता कमज़ोर होती जा रही है। वह बहुत कुछ जानती है, पर स्वयं को कम जानती है। वह निरंतर जुड़ी हुई दिखाई देती है, किंतु भीतर से पहले से अधिक अकेली है। यह अकेलापन केवल मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं, बल्कि एक उभरती हुई सामाजिक चुनौती है, क्योंकि विखंडित व्यक्ति कभी भी स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं कर सकता।
भारतीय चिंतन और हिंदी साहित्य इस संकट का समाधान भीतर खोजते हैं। कबीर का यह कथन-‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’। यह कथन वर्तमान में पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि सबसे बड़ी विजय किसी और पर नहीं, अपने भटकते हुए मन पर होती है। तुलसीदास ने मन को साधने को जीवन की सबसे कठिन साधना माना और भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि चंचल मन का संयम ही स्थिर बुद्धि का आधार है। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ रचनाकारों ने भी मनुष्य को बार-बार भीतर लौटने की प्रेरणा दी है। प्रेमचंद के पात्र बाहरी संघर्षों के बीच भी नैतिक चेतना को बचाए रखते हैं। महादेवी वर्मा के साहित्य में आत्मा की निस्तब्ध पुकार सुनाई देती है। अज्ञेय का समूचा लेखन आत्मान्वेषण की यात्रा है। इन रचनाकारों ने हमें यह सिखाया कि मनुष्य की सबसे बड़ी पराजय परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने बिखरे हुए ध्यान से होती है। जीवन-दर्शन भी यही कहता है कि मनुष्य वही बनता है, जिस पर वह बार-बार अपना ध्यान टिकाता है। यदि हमारा ध्यान तुलना, ईर्ष्या, प्रदर्शन और उपभोग पर रहेगा तो हमारा व्यक्तित्व भी वैसा ही निर्मित होगा। यदि वही ध्यान ज्ञान, श्रम, करुणा, आत्मचिंतन और सृजन पर केंद्रित होगा तो जीवन की दिशा स्वयं बदल जाएगी। ध्यान वास्तव में बीज है और व्यक्तित्व उसका वृक्ष।
आज आवश्यकता तकनीक से युद्ध करने की नहीं, बल्कि अपने ध्यान को पुनः अपना बनाने की है। प्रश्न यह नहीं कि मोबाइल, इंटरनेट या कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे जीवन में रहें या नहीं,प्रश्न यह है कि उनका स्वामी कौन होगा-हम या वे? जिस दिन मनुष्य यह निर्णय स्वयं लेने लगेगा कि उसके मन में किस विचार को प्रवेश मिलेगा और किसे नहीं, उसी दिन वह अपनी खोई हुई स्वतंत्रता वापस पा लेगा। हमें फिर से पुस्तक के साथ बैठना होगा, परिवार की आँखों में देखकर संवाद करना होगा, प्रकृति की नीरवता को सुनना होगा और दिन का कुछ समय अपने भीतर के मौन को देना होगा। क्योंकि ध्यान केवल देखने की शक्ति नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ देने की क्षमता है। धन खोकर पुनः अर्जित किया जा सकता है, अवसर खोकर फिर पाया जा सकता है, किंतु बिखरा हुआ ध्यान धीरे-धीरे पूरे जीवन की गुणवत्ता को चुरा लेता है। इसलिए इस युग की सबसे बड़ी सजगता अपने धन, पद या प्रतिष्ठा की रक्षा नहीं, बल्कि अपने ध्यान की रक्षा है। मनुष्य का भविष्य उसके भाग्य से कम और उसके ध्यान से अधिक निर्मित होता है। क्योंकि जहाँ ध्यान ठहरता है, वहीं जीवन अपना स्वरूप ग्रहण करता है।







