



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात मोहन री, मोहन रै आलोक री, मोहन आलोक री…। कुण है ओ मोहन अर कांई है बां रो आलोक ? हथाई सरू करां, उण सूं पैली भरत व्यास रो अेक चावो दूहो बांचो।
धिन-धिन अे धोरां री धरती राजस्थानी मावड़ी
वीर धीर विद्वान बणाया खुवा खीचड़ो राबड़ी
राजस्थानी साहित में इस्यै ई अेक थाम्बै मनीषी मोहन आलोक रो नांव आवै, जिकां आपणी कलम रै पाण राजस्थानी रो जस दूर-दूर तंई पूगायो। दो दिन पैली 3 जुलाई नै बांरो जलमदिन हो, इणी मिस आज ‘हेत री हथाई’ में आपां बांन्नै याद करां, बांरी ओळूं नै सरधा रा पुसब चाढां।
आधुनिक राजस्थानी रै किणी पख री बात होवै, चरचा होवै तो बा मोहन आलोक रै बिना पूरी नीं हो सकै। बां आपरी अजब-गजब बुणगट सूं, भासा री ठसक नै नवा मुकाम दिया। बै राजस्थानी साहित में नवप्रयोगवादी कवि रै रूप में पिछाणीजै। बां री अेक छोटी सी कविता री बानगी देखल्यो-
कविता कोई भाठो नंई है/कै आप मारो/अर आगलो/हाथ पाधरा कर देवै/पोतियो उतारै/अर आपरै/पगां में धर देवै….। कविता रो असर/तन ऊपर नीं/मन ऊपर होवै/मन री जर खायोड़ी तलवार नै/आ पाणी दे दे धार देवै/बीं नै धो-पूंछ’र/नवा संस्कार देवै !
मोहन आलोक 3 जुलाई 1942 नै चूरू जिलै रै किसनपुरै गांव में जलम्या। काळ अर घरू अबखायां बिच्चाळै पोखिज्यै मोहन रो बाळपणो घणो दोरो हो, पण बां आपरी अंतस चेतना नै जगायां राखी। फगत सोळा साल री उमर में बां आपरी पैली कविता मांडी। रोटी टुकड़ै री तलास में मोहन आलोक काळ रो इलाको छोड’र गंगानगर आय’र रैवण लाग्या। भागजोग सूं बान्नै नगर परिषद, गंगानगर में नौकरड़ी मिलगी, जिण सूं घर में कीं सोराई बापरगी। जवानी रै दिनां में ई बां आपरै भायलां साथै मिल’र अेक नवो प्रयोग कर्याे। बै बतावता, बां दिनां छापाखाना भोत थोड़ा’क हा, चार भायलां साथै मिल’र बां रबड़ री मोहरां सूं अेक पोथी बणाई। हर कविता सारू आखर-आखर जोड़’र मोहर बणावता, फेर बांरा ठप्पा कागद पर लगाता, घणी खेचळ खायां पछै पोथी त्यार होई, नांव राख्यो ‘संभावित हम’। कदास किताबां री दुनिया में इण ढाळै छपणआळा आ पैली पोथी ही।
मोहन आलोक राजस्थानी कवि रा थाम्बा मानीजैै। 1983 में बां री पैली पोथी ‘ग-गीत’ नै साहित अकादमी पुरस्कार तो मिल्यो ई, इणी पोथी पर राजस्थान साहित्य अकादमी रो ‘पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार’ मिल्यो। बां रै मुजब मान सनमान तो घणाई मिल्या, पण सैं सूं मोटो माण पाठकां दियो जिकां नै बां री बीसूं रचनावां कंठस्थ है। आं रचनावां में घणा चावा है बां रा डांखळा। अेक बानगी देखो-
ग्यानियां रै ग्यान ऊपर गेर’र भाखलो
गोडां हेठै दाब’र सुणाद्यो अेक डांखळो
फेर बी जे कूक कूक
बोलै कोई ऊक चूक
मूंडै मांय दाबद्यो पिलाण रो पांखळो
लगै हाथ अेक ओर बांचल्यो, आपणै कांई टक्का लागै-
फूल जिसी कंवळी अर पतळी हा पांख ज्यूं
फूळै आळी फूलकी रो सासरो हो चाकसू
सासरै पुगाता जणा आता नीं हा छोड’र
कागद जेड़ै डील नै लिफाफै मांय मोड़’र
मांड’र ठिकाणो उपर भेज देता डाक सूं
यूरोप रै इण चावै लिमरिक छंद नै बै ‘डांखळा’ रो रूप देय’र राजस्थानी में लेय’र आया। अे डांखळा ‘इतवारी पत्रिका’ में लगोलग छप्या अर भोत सराइज्या। पंजाबी रै लोककवि सुरजीत पातर रै कैवण सूं मोहन आलोक पंजाबी भासा में ई अे छंद रच्चा। नांव धरायो ‘डक्के’ ! ल्यो बांचो-
अखां दा डाक्टर सिगा खेतासिंग ‘खाली’
अखां जाच करण दी तरकीब सी निराली
मरीज जदों आंदा सी
खेतां चे ले जांदा सी
पूछदा सी दस, सामणे तूत है जा टाली
इस्या ई प्रयोग बां अंग्रेजी विधा रै छंद ‘सॉनेट’ साथै कर या। राजस्थानी में बां री ‘सौ सानेट’ नांव सूं पोथी छपी जिकी भोत सराइजी। पोथी री भूमिका में राजस्थानी रा चावाकवि कथाकार सांवर दैया लिखै-
‘इण पोथी में सॉनेट जिस्या सॉनेट हैं। आ पोथी नवै समै सारू नवा छंद अर नवी पीढी सारू नवा बंध लेय’ आई है।
फेर तो अेक सॉनेट बांचणो ई पड़सी आपनै-
पांच-सात लोगां मन मुजब नचा राखी है
आखी दुनिया नै निज री आंगळयां उपर
एक फगत बांरी मनस्या चालै है भू पर
अरबां-अरबां लोग आज इंरा साखी है
भूख, बिमारी, मारामारी, जुद्ध विनासक
जितणा हुया आज तांई सह आंरी मरजी
सूं ई हुया, हुवै है, सिंघासण रा गरजी
अे राकस है निज इच्छा रा मात्र उपासक
बुद्धिवर विद्वान बापड़ा कूक-कूक’र
हुया बावळा स्नेह-सास्तर लिख्या घणाई
मोथा पण बांरै उपर निज कान कणांई
नंई धर्या, बांरै भावां नै टूक-टूक कर
बगा दिया जुद्धां री बळती आग मांयनै
अनै नास लिख दियो मिनख रै भाग मांयनै।
बां रो अेक चावो कविता संग्रै है ‘चित्त मारो दुख नै’ ! इस संग्रै री कवितावां उदास अर आस सूं टूट्योड़ै आदमी नै फेरूं उभो होवण री ताकत देवै। आलोक कैवता, आज री घड़ी ‘‘नॉनसेंस’ बंतळ री है, आपां ‘सीख’ देवणी चावां, पण कोई लेवणियो नीं। अबै तो बात लोक री भासा में ई कैवण रो बगत है, जणाई बै लिख्यो है-
‘दुख नै बिछा नीचौ/ओढ’र सो दुख नै/ राम भरोसै है तो बैठ्यो रो दुख नै/ईं धरती पर तूं जद जलम्यो जायो है/चूण चुगण रो हक साथै ई ल्यायो है/अे लंगवाड़ा बाड़ा कर-कर/बैठ्या है/तूं बैठ्यो है/ज्यूं गाडी में आयो है/जरू जीव रै चेप, पांगळो हो दुख नै/गंठड़ी बांध’र गोडां रै ल्हको दुख नै…!
2003 में बां रो अेक ओर कविता संग्रै छप्यो, ‘चिड़ी री बोली लिखो’। इण संग्रै में बांरी सबद साधना रो नवो रूप लाधै। अेक सूं बेसी अेक कविता जियाजूण नै आध्यामिकता कान्नी ले जावै। संग्रै री अेक कविता बांचो दिखाण-
चिड़ी री बोली लिखौ/रंग फूल रो/निःशब्द/कलम नै आंख में/पकड़ो/करो/आकाश कागद
निजर नै तीर सी/गाडौ/र’ बींधौ/बादळां रै लार रा/बादळ/बादळां रै पार रा/बादळ
चिड़ी री बोली लिखौ/रंग फूल रो/निःशब्द !
2011 में छपी पोथी ‘बानगी’ भी मोहन आलोक रै लेखन रो गजब नमूनो है। पोथी रो समरपण पानो ई बां री अंतस पीड नै सामीं राख देवै जठै बां लिख्यो है-
‘उन लोगों के लिए, जो अपनी आँखों के सामने देश को लुटता देखकर एक शब्द भी नहीं बोलते !’
बातां रो अंत कठै ! पण जे मोहन आलोक रै रचाव ‘बकरी’ बालकथा री बात नीं होवै तो आज री हथाई अधूरी रैय जासी। कैवण नै तो ओ बालगीत है पण मोहन आलोक इण गीत रै मिस आपणी समची सामाजिक अर लोकराज री व्यवस्था री पोल खोल’र राख दी है। सोसक अर सोसित समाज में अंत पंत कांई होवै, इण गीत में सांगोपांग चितराम है-
…गादड़ा भी आज कोई
हुया नीं अनोखा
अर बकरी रै साथ हुया
सदियाँ सूं धोखा
म्हारो तो है इतणो ई
रचना रो सुख
बकरी रो दुख होजै
आप रो बी दुख
आप रै भी दुखै जिकी
बीं रै है करक री
गादड़ै रै सीर मांय
खेत बायो बकरी
लगे हाथ मोहन आलोक री पोथी ‘अभनै रा किस्सा’ री बात करल्यां। ओ अभनो हर गांम में लाधै, इणी अभनै री बातां नै मोहन आलोक व्यंग्य री धार-धार दे दे पाठकां तंई पुगायो। अेक अनुसिरजक रै रूप में भी मोहन आलोक खूब काम कर यो। उमर खैयाम री रूबाइयां अर गौतम बुद्ध रो धम्मपद आज मोहन आलोक रै पाण ई राजस्थानी में बांचण नै लाधै। अेक रूबाई देखो-
दिन अर रात दोय दरवाजा /इण जगती री सरा, सदानां
बारी बारी खुलणो मुंदणो /आं दरवाज़ां रो गुण माना
तड़क भड़क सूं आया इण में/कितणा ही भूपति पर भूपति
रैया घड़ी दो घड़ी अनै स्सै,/होग्या, निज रै राह रवाना।
धम्मपद री बानगी भी देख लेवां-
सगळा धरम मन्न उत्पन्न है,/कह, अर करै मलिन मनकार।
तो दुख लारै चाल पड़ै, ज्यूं /पहिया बळधां पग्गा लार ।।
सगळा धरम मन्न उत्पन्न है,/कह, अर करै सुच्छ मनकार।
तो सुख लारै चाल पड़ै, ज्यूं /छियां चालै माणस लार ।।
अेक और महताऊ पोथी है, गुरु श्री गोविंद सिंह जी री फारसी भाषा में लिख्योडी ‘जफरनामा’ जिण में बै औरंगजेब नै कागद लिख’र आध्यात्मिक ढंग सूं चेतायो। इण पोथी रो हिंदी अनुवाद मोहन आलोक री कलम सूं होयो है। कदास ओ ई कारण है कै राजस्थानी रै इण चावै कवि नै नेशनल बुक ट्रस्ट री संपादित पोथी ‘वन हंड्रेड इंडियन पोयट्स’ में सामल करीज्यो है।
साची बूझो तो मोहन आलोक कदेई आपनै किणी विधा में नीं बांध्यो, बां तो फगत संवेदना सूं जुड़ाव राख्यो। जणाई कहाणी होवै चायै कविता, व्यंग्य होवै चायै छंद, बां री संवेदना आप मतैई सबदां में ढळै अर प्रगटीज जावै। आ ई बात बान्नै आपरै बगत रै दूजै लिखारां सूं अळघो मुकाम दिरावै।
मोहन आलोक रै रचाव बाबत पूरी-पूरी रात हथाई हो सकै। पण समै अर सबद री आपरी सींव होवै, साख होवै। मोहन आलोक री पुन्याई नै सरधा पुसब अर धोक देवण रो सैं सूं चोखो ढंग है आपां बां रै रचाव नै बांचां, लोगां तंई बां री बात पुगावां। बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं







