



डॉ. एमपी शर्मा
श्रीगंगानगर में हाल ही में हुई हृदयविदारक घटना ने एक बार फिर हमें आईना दिखाया है। यह कोई साधारण खबर नहीं, बल्कि सभ्य समाज के चेहरे पर पड़ा वह तमाचा है, जिसे हम हर बार देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। अफसोस की बात यह है कि यह पहली घटना नहीं है। कुछ वर्ष पहले हनुमानगढ़ में भी एक मासूम किशोरी के साथ ऐसी ही बर्बरता हुई थी। तब भी सड़कों पर आक्रोश था, नारे थे, बुलडोज़र चले, गिरफ्तारी हुई और फिर? कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो गया। आज फिर वही कहानी, वही सवाल और वही खोखली प्रतिक्रियाएँ।
हर बार घटना के बाद प्रशासन की पहली तस्वीर होती है, होटल सील, संपत्ति ध्वस्त, कुछ चेहरे सलाखों के पीछे। यह कार्रवाई जरूरी है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन क्या केवल इससे अपराध रुक जाएंगे? अगर ऐसा होता, तो आज यह घटना दोबारा सामने नहीं आती। सच यह है कि हम लक्षण का इलाज कर रहे हैं, बीमारी का नहीं।
ऐसी घटनाओं के लिए केवल एक व्यक्ति, एक होटल या एक संस्थान को दोषी ठहराकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। यह कई स्तरों पर हुई विफलताओं का नतीजा है, परिवार की, समाज की और प्रशासन की। जब हर स्तर पर चूक होती है, तब अपराध पनपता है।
बच्चों को केवल अच्छी किताबें और महंगे स्कूल देना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें संस्कार, सुरक्षित व्यवहार, डिजिटल समझ और आत्मरक्षा की शिक्षा भी चाहिए। माता-पिता का बच्चों की गतिविधियों, मित्रों और दिनचर्या पर ध्यान देना अविश्वास नहीं, बल्कि सुरक्षा है। आज का खतरा केवल सड़क पर नहीं, मोबाइल की स्क्रीन के भीतर भी छिपा है।
आज समाज पहले से ज्यादा उदासीन हो गया है। संदिग्ध गतिविधियाँ दिखती हैं, लेकिन लोग चुप रहते हैं। छोटे कस्बों में यदि सुनसान इलाकों में होटल, लॉज या ठहरने के स्थान संदेहास्पद गतिविधियों के केंद्र बन रहे हों, तो सवाल उठाना नागरिक का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है, इन होटलों में क्या चल रहा है, यह सबको दिखता है, फिर प्रशासन की आँखें क्यों बंद रहती हैं?
कानून का उद्देश्य केवल अपराध के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि अपराध को रोकना भ्ी है। छोटे शहरों में यदि बिना ठोस व्यापारिक आधार के बड़ी संख्या में होटल और लॉज चल रहे हों, तो उनके पंजीकरण, अतिथि रिकॉर्ड, सीसीटीवी और नियमों की नियमित जांच अनिवार्य होनी चाहिए। लगातार शिकायतों के बावजूद यदि कार्रवाई नहीं होती, तो यह लापरवाही नहीं, गंभीर चूक है।
हर बार विरोध प्रदर्शन, गिरफ्तारी और तोड़फोड़ से आक्रोश तो शांत हो जाता है, लेकिन अपराध की जड़ें वहीं की वहीं रहती हैं। समाज को दंड के साथ-साथ मजबूत रोकथाम तंत्र भी खड़ा करना होगा।
समाधान क्या हैं? यह अपने आपमें बड़ा सवाल है। इसके लिए जरूरी है, प्रशासन समय-समय पर सभी होटल, लॉज और गेस्ट हाउस का नियमित सत्यापन और औचक निरीक्षण करे। प्रत्येक अतिथि की वैधानिक पहचान और डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य हो। कार्यशील सीसीटीवी और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की बाध्यता। संवेदनशील इलाकों में नियमित पुलिस गश्त। स्कूल और कॉलेजों में लैंगिक संवेदनशीलता, नैतिक शिक्षा और आत्मरक्षा प्रशिक्षण। महिलाओं और बच्चों के लिए त्वरित व सुरक्षित शिकायत व्यवस्था। दोषियों को शीघ्र न्याय और कठोर दंड व संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देना सामाजिक दायित्व बने।
कानून अपराधी को दंड दे सकता है, लेकिन अपराध की मानसिकता को केवल परिवार, शिक्षा और समाज ही बदल सकते हैं। केवल बेटियों को सतर्क रहने की सीख देना काफी नहीं; बेटों को सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का संस्कार देना उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।
हर घटना के बाद कुछ दिन आक्रोश रहता है, फिर सब शांत हो जाता है और कुछ समय बाद नई घटना फिर हमें झकझोर देती है। अगर सच में बदलाव चाहिए, तो भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर स्थायी व्यवस्था बनानी होगी। यह केवल पुलिस का विषय नहीं, न केवल सरकार का और न ही सिर्फ परिवार का। यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। जिस दिन परिवार जागरूक होगा, समाज सजग होगा, प्रशासन सक्रिय होगा और न्याय त्वरित होगा, उसी दिन ऐसी घटनाओं पर वास्तविक रोक लगेगी।
आइए, केवल गुस्सा न दिखाएँ। ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें, जहाँ हर बेटी, हर बच्चा और हर नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। यही सभ्यता की असली पहचान है।
-लेखक सुविख्यात सर्जन और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन राजस्थान के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हैं






