



डॉ. जितेंद्र अग्रवाल
राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में बढ़ती गर्मी, शरीर से अधिक पसीना निकलना और पर्याप्त पानी नहीं पीना पथरी की समस्या को तेजी से बढ़ा रहा है। यह बीमारी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवा और महिलाएं भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। समय पर जांच, सही उपचार और जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव अपनाकर न केवल पथरी का सफल इलाज संभव है, बल्कि दोबारा बनने के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पथरी मूत्र प्रणाली की सबसे सामान्य बीमारियों में से एक है। हमारे मूत्र में अनेक प्रकार के खनिज और लवण घुले रहते हैं। जब शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है और इन खनिजों की सांद्रता बढ़ जाती है, तो छोटे-छोटे क्रिस्टल बनने लगते हैं। समय के साथ यही क्रिस्टल मिलकर पथरी का रूप ले लेते हैं। यह पथरी गुर्दे, गुर्दे से मूत्राशय तक जाने वाली नली अथवा मूत्राशय में बन सकती है।
भारत उन देशों में शामिल है जहां पथरी के मरीजों की संख्या अधिक है। अनुमान है कि जीवनकाल में लगभग 10 से 15 प्रतिशत लोगों को कभी न कभी इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है। उत्तर-पश्चिम भारत, विशेषकर राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और गुजरात को पथरी प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। यहां अधिक गर्मी, डिहाइड्रेशन और कम पानी पीने की आदत इस बीमारी के प्रमुख कारण हैं।
कम पानी पीना, अधिक नमक का सेवन, अत्यधिक मांसाहार, बार-बार मूत्र संक्रमण, परिवार में पथरी का इतिहास, मोटापा, मधुमेह, हार्माेन संबंधी कुछ बीमारियां तथा लंबे समय तक बैठे रहना पथरी बनने की संभावना बढ़ा देते हैं।
पथरी के लक्षण उसके आकार और स्थान पर निर्भर करते हैं। सामान्यतः कमर या पीठ के एक तरफ अचानक तेज दर्द, दर्द का पेट के निचले हिस्से या जननांगों तक फैलना, पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना, पेशाब में खून दिखाई देना, मतली, उल्टी और संक्रमण होने पर बुखार व ठंड लगना इसके प्रमुख संकेत हैं। गंभीर स्थिति में पेशाब रुक भी सकता है। हालांकि कई बार छोटी पथरी बिना किसी लक्षण के रहती है और जांच के दौरान संयोग से पता चलती है।
यदि दर्द असहनीय हो, पेशाब बंद हो जाए, तेज बुखार आए, पेशाब में अधिक खून दिखाई दे या केवल एक ही गुर्दा कार्य कर रहा हो, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। ऐसी स्थिति में उपचार में देरी गुर्दे को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।
पथरी की पुष्टि के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी, विशेष प्रकार की संगणकीय जांच, कुछ मामलों में एक्स-रे, मूत्र और रक्त की जांच की जाती है। यदि पथरी निकल जाए तो उसकी रासायनिक जांच से भविष्य में दोबारा बनने की संभावना का भी आकलन किया जा सकता है।
पथरी के आकार, स्थान और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। लगभग पांच से छह मिलीमीटर तक की छोटी पथरी कई बार पर्याप्त पानी, दर्द नियंत्रित करने वाली दवाओं और पथरी बाहर निकालने में सहायक औषधियों से स्वयं निकल जाती है।
यदि पथरी बड़ी हो या बार-बार दर्द, संक्रमण अथवा रुकावट पैदा कर रही हो, तो आज अधिकांश मामलों में बिना बड़े चीरे के उपचार संभव हैं। शरीर के बाहर से आघात तरंगों द्वारा पथरी तोड़ना, दूरबीन और लेजर की सहायता से पथरी निकालना तथा पीठ पर छोटा छेद कर बड़ी पथरी निकालने जैसी आधुनिक तकनीकों से मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाते हैं। केवल बहुत कम मामलों में खुली अथवा दूरबीन आधारित शल्यक्रिया की आवश्यकता पड़ती है।
एक बार पथरी होने के बाद उसके दोबारा बनने की संभावना बनी रहती है, इसलिए बचाव सबसे महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में पानी या अन्य तरल पदार्थ लेना, भोजन में नमक कम करना, ताजे फल और सब्जियों का सेवन बढ़ाना, वजन नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम करना, पेशाब को लंबे समय तक न रोकना और संक्रमण होने पर पूरा उपचार कराना जरूरी है। जिन लोगों में बार-बार पथरी बनती है, उन्हें विशेषज्ञ की सलाह से चयापचय संबंधी जांच भी करानी चाहिए।
हर व्यक्ति के लिए तीन या चार लीटर पानी पीने का नियम समान नहीं है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि 24 घंटे में लगभग दो से ढाई लीटर मूत्र बने। इसके लिए अधिकांश स्वस्थ वयस्कों को प्रतिदिन लगभग ढाई से साढ़े तीन लीटर तरल पदार्थ की आवश्यकता होती है। राजस्थान जैसे गर्म क्षेत्रों में खेतों में काम करने वाले, अधिक पसीना बहाने वाले या नियमित व्यायाम करने वाले लोगों को इससे भी अधिक पानी की जरूरत पड़ सकती है। यदि पेशाब का रंग हल्का पीला या लगभग साफ रहे और हर दो से तीन घंटे में पेशाब आए, तो इसे पर्याप्त जल सेवन का संकेत माना जा सकता है।
पथरी का दर्द भले ही अचानक और अत्यंत तीव्र हो, लेकिन समय पर जांच, आधुनिक उपचार और संतुलित जीवनशैली अपनाकर इससे पूरी तरह राहत पाई जा सकती है। पर्याप्त पानी पीना ही स्वस्थ गुर्दों की सबसे सरल और प्रभावी सुरक्षा है।
-लेखक जाने-माने यूरोलॉजिस्ट हैं








