




डॉ. एमपी शर्मा
पुत्री का पिता होना मेरे लिए सौभाग्य का प्रतीक है। मैं इस बात को पूरे मन से मानता हूं। बेटी को कैसे मजबूत बनाना है, यह भी मैं भली-भांति जानता हूं। हाल ही में एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। वहां भी ‘बेटी बचाओ’ का नारा सुनाई दिया। मन में एक सवाल उठा, क्या केवल नारे लगाने से बेटियां सुरक्षित और मजबूत हो जाएंगी? शायद नहीं। इसके लिए समाज की सोच में बदलाव जरूरी है।
हम वर्षों से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की बात करते आए हैं। अभियान चलते हैं, कार्यक्रम होते हैं, भाषण दिए जाते हैं और पोस्टर लगाए जाते हैं। लेकिन बेटियों की वास्तविक सुरक्षा केवल इन अभियानों से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए परिवार से लेकर समाज तक हमें अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव लाना होगा। सबसे पहले यह समझना होगा कि बेटी किसी पर बोझ नहीं, परिवार की शक्ति और समाज की जिम्मेदारी है।
बेटियों को मजबूत बनाने की शुरुआत घर से होती है। उन्हें बचपन से ही अपने निर्णय लेने, अपनी बात कहने और गलत को गलत कहने का साहस देना होगा। उन्हें केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं कि बाहर की दुनिया से बचकर रहना है। उन्हें यह भी सिखाना होगा कि किसी गलत व्यवहार का विरोध कैसे करना है, सहायता कहां से लेनी है और आवश्यकता पड़ने पर अपने लिए आवाज कैसे उठानी है।
लेकिन केवल बेटियों को मजबूत बनाना ही पर्याप्त नहीं है। अच्छे समाज का निर्माण तभी होगा, जब हम अपने बेटों को संस्कारी बनाएं। उन्हें यह समझाना होगा कि हर लड़की और हर महिला सम्मान की अधिकारी है। अगर हमारा बेटा किसी लड़की में अपनी मां, बहन या परिवार की स्त्री की छवि देखना सीख जाए, तो समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण बहुत बदल सकता है। संस्कार का अर्थ केवल बड़ों के पैर छूना नहीं है; संस्कार का वास्तविक अर्थ दूसरे के सम्मान और अधिकार को समझना है।
बेटियों की सुरक्षा के लिए उन्हें संभावित खतरों की जानकारी देना भी जरूरी है। कई बार परिवार इस डर से बच्चों से कुछ विषयों पर बात नहीं करता कि कहीं वे असहज न हो जाएं। लेकिन चुप्पी सुरक्षा नहीं देती। बेटियों को अच्छे और बुरे स्पर्श का अंतर समझाना चाहिए। उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि किसी भी असहज या गलत व्यवहार को छिपाना नहीं है। माता-पिता से खुलकर बात करने का भरोसा उनमें पैदा करना होगा।
आज भी हम बेटियों से उनके शरीर और स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर बात करने में झिझकते हैं। मासिक धर्म, स्तन स्वास्थ्य, स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर (बच्चेदानी का मुँह) और किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलावों जैसे विषयों पर बातचीत को सामान्य बनाना जरूरी है। इन विषयों पर जानकारी न होना शर्म की बात नहीं, लेकिन जानकारी होने के बावजूद बात न करना जरूर चिंता का विषय है। मां-बेटी और पिता-बेटी के बीच संवाद जितना सहज होगा, बेटी उतनी ही जागरूक और आत्मविश्वासी बनेगी।
बेटी को बचाने की बात करने से पहले हमें यह सोचना होगा कि उसे किस तरह का समाज देना चाहते हैं। ऐसा समाज, जहां लड़की को हर कदम पर डरकर चलना पड़े, या ऐसा समाज जहां वह अपनी प्रतिभा, सपनों और इच्छाओं के साथ स्वतंत्र होकर आगे बढ़ सके?
बेटियों को बचाने के लिए केवल उनकी सुरक्षा की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से मजबूत बनाना होगा। खेल, शिक्षा, तकनीक, आत्मरक्षा, वित्तीय समझ और निर्णय लेने की क्षमताकृइन सभी क्षेत्रों में बेटियों को आगे बढ़ाना होगा। जिस बेटी को अपने पैरों पर खड़ा होना आता है, वह परिस्थितियों का सामना अधिक मजबूती से कर सकती है।
और अंत में सबसे बड़ा सवाल हम पुरुषों से है, क्या हम बेटियों को सुरक्षित समाज देने के लिए अपनी सोच बदलने को तैयार हैं? बेटी को बचाने का असली अभियान किसी मंच से नहीं, घर से शुरू होगा। बेटियों को सुरक्षा देने के साथ बेटों को संस्कार देना होगा। बेटियों को चुप रहने की शिक्षा देने के बजाय बोलने का साहस देना होगा। क्योंकि बेटी तभी वास्तव में सुरक्षित होगी, जब समाज उसे बचाने की वस्तु नहीं, बराबरी का इंसान समझेगा। यही सोच बदलाव की पहली सीढ़ी है।





