



एमएल शर्मा
अब पेट्रोल में मिठास घोलने की कीमत चीनी से वसूल रहा है बाजार? जी हां, वैज्ञानिक तरक्की की बानगी देखिए। मीठे का मुख्य कारक गन्ना अब चीनी के बजाय एथेनॉल की भट्टी में जा रहा है। इसका असर आम आदमी की रसोई के बजट पर दिखाई देने लगा है। चाय की प्याली भी अब पहले जैसी सस्ती नहीं रही।
देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की नीति को हुक्मरान बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं। लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिसका हिसाब आम आदमी अपनी रसोई में चुका रहा है। गन्ने का बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने से चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
हे सरकार! पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की जिद में यह भी देख लीजिए कि कहीं आम आदमी की चाय से चीनी ही गायब न हो जाए। वाह भई! पेट्रोल की टंकी में एथेनॉल बढ़ाने की कोशिश और चाय की प्याली में चीनी घटने का खतराकृयह भला कैसी तरक्की?
गन्ना किसान के लिए एथेनॉल निश्चित रूप से बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे चीनी मिलों को भी अतिरिक्त आय मिलती है। एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से किसानों को गन्ने का बेहतर बाजार मिल सकता है और देश का पेट्रोलियम आयात भी कम हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि इस पूरी नीति का बोझ आखिर कौन उठाएगा?
जब गन्ने का एक बड़ा हिस्सा चीनी के बजाय एथेनॉल उत्पादन में चला जाता है तो चीनी के उत्पादन के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर असर पड़ना लाजिमी है। इसका सीधा असर बाजार पर पड़ता है। चीनी और गुड़ के दाम बढ़ते हैं और अंततः इसका भार आम उपभोक्ता की जेब पर आता है।
सरकार पेट्रोल की टंकी में एथेनॉल का प्रतिशत बढ़ा रही है और बाजार आम आदमी को चाय की प्याली में चीनी का प्रतिशत घटाने की सलाह दे रहा है। बेशक, एथेनॉल नीति आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इसका वास्तविक फायदा किसे मिल रहा है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
एथेनॉल से देश का पेट्रोलियम आयात कम हो सकता है। किसानों को गन्ने का बेहतर बाजार मिल सकता है और चीनी मिलों को अतिरिक्त राजस्व हासिल हो सकता है। लेकिन सरकार को यह भी देखना होगा कि ऊर्जा नीति का बोझ खाद्य पदार्थों की कीमतों पर कितना भारी पड़ रहा है।
सियासतदानों का दायित्व है कि ऐसी नीतियां बनाई जाएं, जिनसे भूमिपुत्र यानी किसान खुश रहे और उपभोक्ता बेवजह परेशान न हो। सरकारी नुमाइंदे लगातार यह दावा कर रहे हैं कि एथेनॉल से गन्ना उत्पादक किसानों की आय बढ़ रही है। निसंदेह, किसान की आमदनी बढ़ाना और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन किसी भी नीति की सफलता तभी मानी जाएगी, जब उसका लाभ किसान तक पहुंचे और उसका नुकसान आम उपभोक्ता की थाली पर न पड़े।
चलो, एकबारगी मान भी लिया जाए कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है। लेकिन चीनी का महंगा होना आम रसोई के लिए खतरे की घंटी है। ऐसे में एथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन बनाना समय की जरूरत है।
मौजूदा दौर में गन्ने का रुख एथेनॉल की तरफ बढ़ने से चीनी की कीमतों पर ‘मीठा बोझ’ बढ़ रहा है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। यही बढ़ता बोझ ‘विकसित भारत’ के सपने के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
चीनी सिर्फ मिठास का जरिया नहीं, बल्कि देश की दैनिक जरूरत का महत्वपूर्ण उत्पाद है। अब इसी मिठास पर महंगाई का साया पड़ गया है। गन्ने से चीनी और एथेनॉल दोनों का उत्पादन संभव है, लेकिन जब एथेनॉल उत्पादन को प्राथमिकता दी जाती है तो चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर असर पड़ता है।
चीनी के उत्पादन में मामूली कमी भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है। ऐसे माहौल में जमाखोरी, मुनाफाखोरी और कालाबाजारी पर अंकुश लगाना भी चुनौती बन जाता है।
जानकारों की मानें तो चीनी के दाम केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करते। गन्ने की बुवाई का क्षेत्रफल, मौसम, चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता, निर्यात-आयात नीति, सरकारी भंडार और एथेनॉल की मांग जैसे कई कारक मिलकर बाजार में चीनी की कीमत तय करते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल लगातार बढ़ता है तो घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी? उत्पादन और उपलब्धता के बीच संतुलन बिगड़ा तो बढ़ती कीमतों के कारण आम रसोई पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।
यही वजह है कि एथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन बनाना अब सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। देश को ऊर्जा के लिए एथेनॉल चाहिए, किसानों को बेहतर बाजार चाहिए और आम आदमी को सस्ती चीनी। यदि गन्ने का बड़ा हिस्सा एक ही दिशा में चला गया तो उसका सीधा बोझ अंततः उपभोक्ता की रसोई पर पड़ेगा।
इसलिए एथेनॉल और चीनी के बीच ऐसा ‘संतुलित सेतु’ बनाना जरूरी है, जिसमें किसान, उद्योग और उपभोक्ताकृतीनों के हित सुरक्षित रहें। नीति ऐसी हो कि किसान की आमदनी बढ़े, उद्योग मजबूत हो और आम आदमी की चाय की मिठास भी बरकरार रहे। सबको सन्मति दे भगवान!







