




डॉ. मोनिका जांगिड़, फिजियोथेरेपिस्ट
आज के आधुनिक दौर में महिलाएं समाज और परिवार की रीढ़ हैं। घर की जिम्मेदारियों से लेकर कॉरपोरेट जगत तक, हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। लेकिन इन बहुआयामी जिम्मेदारियों को निभाने के दौरान वे अक्सर अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं। एक फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में मैं रोज ऐसी कई महिलाओं से मिलती हूं, जो केवल इसलिए पुराने दर्द या शारीरिक समस्याओं से जूझ रही हैं, क्योंकि उन्होंने समय रहते अपने शरीर की आवाज नहीं सुनी।
महिला स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारियों से मुक्त रहना नहीं है, बल्कि शारीरिक, मानसिक और मांसपेशीय-हड्डीय संरचना के स्तर पर मजबूत और स्वस्थ रहना भी है। महिलाओं का शरीर जीवन के अलग-अलग चरणों में कई महत्वपूर्ण हार्माेनल बदलावों से गुजरता है। किशोरावस्था, गर्भावस्था, प्रसव और उसके बाद रजोनिवृत्ति तक शरीर में होने वाले ये बदलाव स्वास्थ्य को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं।
गर्भावस्था और प्रसव के बाद पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। इसके कारण कमर दर्द, पेल्विक क्षेत्र में असहजता और यूरिन लीकेज जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। सही व्यायाम और फिजियोथेरेपी इन समस्याओं से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ, विशेषकर रजोनिवृत्ति के आसपास, एस्ट्रोजन हार्माेन का स्तर कम होने लगता है। इससे हड्डियों का घनत्व घट सकता है और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ सकता है। इस अवस्था में नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और आवश्यकता के अनुसार फिजियोथेरेपी शरीर को मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
आज की गतिहीन जीवनशैली और लंबे समय तक डेस्क पर बैठकर काम करने के कारण महिलाओं में गर्दन, कंधे और कमर के निचले हिस्से में दर्द आम समस्या बनता जा रहा है। गलत पोस्चर यानी उठने-बैठने का गलत तरीका रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
लंबे समय तक झुककर बैठने या एक ही स्थिति में काम करने से मांसपेशियों में असंतुलन और जकड़न पैदा हो सकती है। एक फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में मेरी पहली सलाह हमेशा एर्गाेनॉमिक्स यानी काम करने के सही तरीके और पोस्चर को सुधारने की होती है।
बैठते समय पीठ को यथासंभव सीधा रखें, पैरों को जमीन पर सपाट रखें और लंबे समय तक लगातार न बैठें। लगभग हर 45 मिनट में छोटा ब्रेक लेकर कुछ देर चलना और हल्की स्ट्रेचिंग करना लाभकारी हो सकता है।
केवल वजन कम करना ही फिटनेस का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। संपूर्ण फिटनेस के लिए महिलाओं को अपने दैनिक जीवन में स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, कोर एवं पेल्विक फ्लोर स्टेबिलिटी और फ्लेक्सिबिलिटी एवं स्ट्रेचिंग को शामिल करना चाहिए।
महिलाओं में अक्सर यह भ्रम रहता है कि वजन उठाने से उनका शरीर पुरुषों जैसा दिखने लगेगा। यह धारणा सही नहीं है। उचित तरीके से की गई स्ट्रेंथ या रेजिस्टेंस ट्रेनिंग मांसपेशियों को मजबूत करती है, जोड़ों को बेहतर सपोर्ट देती है और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है।
कीगल एक्सरसाइज और प्लैंक जैसे कोर मजबूत करने वाले व्यायाम पेल्विक फ्लोर एवं शरीर के मध्य भाग की मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। ये व्यायाम प्रसव के बाद रिकवरी में भी उपयोगी हो सकते हैं। योग और नियमित स्ट्रेचिंग से मांसपेशियों की जकड़न कम करने तथा शरीर की गतिशीलता बनाए रखने में मदद मिलती है।
फिटनेस तब तक अधूरी है, जब तक शरीर को पर्याप्त और संतुलित पोषण नहीं मिलता। महिलाओं को अपने आहार में कैल्शियम, विटामिन डी, आयरन और पर्याप्त प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों को शामिल करना चाहिए।
इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध शारीरिक स्वास्थ्य से है। लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और मांसपेशियों में तनाव तथा दर्द को बढ़ा सकता है। इसलिए गहरी सांस लेने के अभ्यास, ध्यान और पर्याप्त नींद को भी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए।
एक स्वस्थ महिला ही स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज के निर्माण में बेहतर योगदान दे सकती है। इसलिए शरीर में होने वाले किसी भी दर्द को मामूली समझकर लगातार नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दर्द शरीर का एक संकेत है, जो बताता है कि शरीर में कहीं न कहीं समस्या हो सकती है।
हर महिला को प्रतिदिन कम से कम 30 से 45 मिनट अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूर निकालने चाहिए। यदि किसी महिला को लंबे समय से दर्द, कमजोरी या शरीर की गतिविधियों में परेशानी है, तो योग्य फिजियोथेरेपिस्ट से परामर्श लेकर अपनी आवश्यकता के अनुसार व्यायाम योजना बनानी चाहिए। याद रखें, खुद की सेहत पर ध्यान देना स्वार्थ नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की आवश्यकता है।







