





डॉ. मनोज शर्मा
कमर दर्द यानी निचली पीठ का दर्द आज बेहद आम समस्या बन चुका है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत मुद्रा में बैठना, शारीरिक गतिविधि की कमी, बढ़ता वजन और उम्र के साथ शरीर में होने वाले बदलाव इसके प्रमुख कारण हैं। हालांकि अधिकांश लोगों में कमर दर्द किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता और उचित देखभाल से इसमें आराम मिल जाता है, लेकिन लगातार बने रहने वाला या असामान्य दर्द कभी-कभी रीढ़ की हड्डी, नसों अथवा शरीर के किसी अन्य अंग से जुड़ी बीमारी का संकेत भी हो सकता है। इसलिए इसे हमेशा सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
कमर दर्द का सबसे सामान्य कारण मांसपेशियों और स्नायुबंधन में खिंचाव है। भारी वजन उठाने, अचानक झुकने, गलत तरीके से व्यायाम करने या लंबे समय तक गलत मुद्रा में रहने से यह समस्या हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद गद्दीनुमा चक्रों में पानी और लचीलापन कम होने लगता है। इससे उनकी ऊंचाई कम हो सकती है और रीढ़ के जोड़ों में घिसाव की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जिसे स्पॉन्डिलोसिस या अस्थिसंधिशोथ कहा जाता है।
कभी-कभी रीढ़ के बीच का चक्र अपनी सामान्य स्थिति से बाहर निकलकर नस पर दबाव डाल देता है। इसे डिस्क हर्निएशन या सामान्य भाषा में स्लिप डिस्क कहा जाता है। इसमें कमर से पैर तक दर्द, झुनझुनी, सुन्नपन या कमजोरी हो सकती है। इसी प्रकार रीढ़ की नलिका संकरी होने पर कुछ दूरी चलने या खड़े रहने के बाद पैरों में दर्द अथवा भारीपन महसूस हो सकता है और बैठने या आगे झुकने पर राहत मिलती है।
बुजुर्गों में हड्डियों की कमजोरी के कारण मामूली चोट से भी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो सकता है। इसके अलावा कभी-कभी गुर्दे की बीमारी, संक्रमण, कैंसर अथवा पेट और श्रोणि क्षेत्र की कुछ बीमारियां भी कमर दर्द का कारण बन सकती हैं।
कमर दर्द किसी भी उम्र में हो सकता है। युवाओं में गलत मुद्रा, लंबे समय तक बैठना, खेल-कूद की चोट, मांसपेशियों का खिंचाव और भारी वजन उठाना प्रमुख कारण हो सकते हैं। चालीस से पचास वर्ष की उम्र के बाद रीढ़ में क्षय संबंधी बदलाव अधिक दिखाई देने लगते हैं। साठ वर्ष के बाद रीढ़ की नलिका का संकरापन, हड्डियों की कमजोरी, फ्रैक्चर और जोड़ों के घिसाव का खतरा बढ़ जाता है। फिर भी केवल उम्र बढ़ना कमर दर्द का अनिवार्य कारण नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि, उचित वजन और स्वस्थ जीवनशैली से कई समस्याओं का जोखिम कम किया जा सकता है।
कमर दर्द का निदान सबसे पहले चिकित्सकीय इतिहास और शारीरिक परीक्षण से किया जाता है। दर्द कब शुरू हुआ, किस स्थान पर है, पैर तक फैल रहा है या नहीं तथा सुन्नपन अथवा कमजोरी तो नहीं है, इन बातों की जानकारी महत्वपूर्ण होती है। आवश्यकता पड़ने पर एक्स-रे, एमआरआई, सीटी जांच, रक्त जांच या हड्डियों की घनत्व जांच कराई जा सकती है। सामान्य कमर दर्द में हर मरीज को एमआरआई कराने की आवश्यकता नहीं होती।
यदि कमर दर्द के साथ पैर में बढ़ती कमजोरी, पेशाब या मल पर नियंत्रण कम होना, जांघों के बीच अथवा जननांग क्षेत्र में सुन्नपन, तेज बुखार, बिना कारण वजन कम होना, कैंसर का पूर्व इतिहास, गंभीर चोट के बाद दर्द या रात में लगातार बढ़ता दर्द हो तो तुरंत चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।
अधिकांश सामान्य कमर दर्द में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं पड़ती। चिकित्सक की सलाह से दर्द कम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं। कुछ स्थितियों में नसों से संबंधित दर्द की दवाएं, मांसपेशियों को ढीला करने वाली दवाएं या विशेष प्रकार के इंजेक्शन भी उपयोगी हो सकते हैं। दर्द की दवाएं लंबे समय तक स्वयं लेना नुकसानदेह हो सकता है, विशेषकर बुजुर्गों तथा गुर्दे, पेट या हृदय संबंधी बीमारी वाले लोगों के लिए।
कमर दर्द के उपचार में भौतिक चिकित्सा और व्यायाम की महत्वपूर्ण भूमिका है। कमर और पेट की मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम, खिंचाव वाले व्यायाम, सही मुद्रा, नियमित पैदल चलना और वजन नियंत्रण लाभकारी हैं। सामान्य कमर दर्द में लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना उचित नहीं माना जाता। जितना संभव हो, सामान्य गतिविधियां धीरे-धीरे जारी रखना बेहतर है।
शल्य चिकित्सा केवल विशेष परिस्थितियों में आवश्यक हो सकती है, जैसे नस पर गंभीर दबाव, बढ़ती तंत्रिका संबंधी कमजोरी, गंभीर रीढ़ नलिका संकरापन या ऐसा डिस्क उभार जिसमें उचित गैर-शल्य उपचार के बावजूद गंभीर समस्या बनी रहे। केवल जांच में डिस्क उभार या रीढ़ में घिसाव दिखाई देना अपने आप में ऑपरेशन का कारण नहीं है।
कमर को स्वस्थ रखने का सरल मंत्र है, चलते रहें, वजन नियंत्रित रखें, सही मुद्रा अपनाएं, नियमित व्यायाम करें और लंबे समय तक लगातार न बैठें। कमर दर्द को उम्र की मजबूरी मानकर सहने के बजाय सही समय पर सही चिकित्सकीय सलाह लेना ही समझदारी है। इससे अनावश्यक दर्द, दवाओं और कई मामलों में बेवजह की शल्य चिकित्सा से भी बचा जा सकता है।
-लेखक सुविख्यात वरिष्ठ हड्डी एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ तथा आदित्य ट्रॉमा सेंटर, भारत माता चौक, हनुमानगढ़ टाउन के संचालक हैं।






