





डॉ. भूपेंद्र नारंग
आजकल घुटनों का दर्द केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं रह गया है। बढ़ती उम्र, मोटापा, बदलती जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग घुटनों के दर्द से परेशान हैं। कई बार जैसे ही किसी व्यक्ति की जांच में घुटने का घिसाव सामने आता है, वह यह सोचकर घबरा जाता है कि अब घुटना बदलवाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। जबकि वास्तविकता इससे काफी अलग है।
घुटने के जोड़ में हड्डियों के सिरों पर एक चिकनी परत होती है, जिसे उपास्थि कहा जाता है। यह परत घुटने को बिना रुकावट और दर्द के चलने में मदद करती है। उम्र बढ़ने, चोट लगने, गठिया या अन्य कारणों से यह परत धीरे-धीरे घिसने लगती है। जब घिसाव बढ़ जाता है तो हड्डियों के बीच की दूरी कम हो जाती है और दर्द, सूजन तथा जकड़न जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।
घुटने की बीमारी के प्रमुख लक्षणों में दर्द, चलने या सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी, सूजन, घुटने का ठीक से न मुड़ना, जोड़ से आवाज आना और पैरों का टेढ़ा होना शामिल है। बीमारी बढ़ने पर मरीज को आराम करते समय या रात में भी दर्द महसूस हो सकता है।
हालांकि यह समझना बहुत जरूरी है कि हर घुटने के दर्द में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती। शुरुआती और मध्यम अवस्था में कई मरीज बिना ऑपरेशन के भी अच्छी जिंदगी जी सकते हैं। वजन नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम करना, आसपास की मांसपेशियों को मजबूत बनाना और चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार लेना काफी लाभदायक साबित हो सकता है। तैराकी, साइकिल चलाना और पैदल चलना जैसे कम दबाव वाले व्यायाम घुटनों के लिए अच्छे माने जाते हैं।
कई लोग केवल जांच रिपोर्ट देखकर घुटना बदलवाने का निर्णय लेने लगते हैं, जबकि यह सही तरीका नहीं है। किसी भी मरीज में निर्णय उसके दर्द की तीव्रता, चलने-फिरने की क्षमता और दैनिक जीवन पर पड़ रहे प्रभाव को देखकर किया जाना चाहिए। यदि व्यक्ति सामान्य कामकाज कर पा रहा है और दर्द नियंत्रित है, तो केवल घिसाव दिखाई देने के आधार पर घुटना प्रत्यारोपण करवाना जरूरी नहीं होता।
घुटना प्रत्यारोपण पर तब विचार किया जाता है जब दर्द लगातार बना रहे, चलना-फिरना कठिन हो जाए, रात में भी दर्द सताने लगे, घुटने में लगातार सूजन और जकड़न बनी रहे तथा अन्य उपचारों से पर्याप्त राहत न मिल रही हो। यदि बीमारी के कारण व्यक्ति की जीवन गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है, तब यह शल्य चिकित्सा एक प्रभावी विकल्प बन सकती है।
एक आम धारणा यह भी है कि घुटना बदलवाने की कोई निश्चित उम्र होती है। वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकांश मरीज 50 से 80 वर्ष की आयु के बीच इस शल्य चिकित्सा से गुजरते हैं, लेकिन निर्णय उम्र के आधार पर नहीं बल्कि बीमारी की गंभीरता और मरीज की जरूरतों के अनुसार लिया जाता है।
घुटने की समस्या को लंबे समय तक नियंत्रित रखने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। शरीर का वजन संतुलित रखें, नियमित व्यायाम करें, लंबे समय तक घुटने मोड़कर बैठने से बचें और समय-समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेते रहें। शुरुआती अवस्था में सही देखभाल कई मरीजों में शल्य चिकित्सा की जरूरत को वर्षों तक टाल सकती है।
यदि घुटना प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ती है तो अनुभवी हड्डी एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ का चयन करना बेहद महत्वपूर्ण है। साथ ही ऐसे अस्पताल का चुनाव करना चाहिए जहां प्रशिक्षित बेहोशी विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपी सुविधा और संक्रमण नियंत्रण की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध हो।
अंत में यह समझना जरूरी है कि घुटना प्रत्यारोपण का उद्देश्य केवल घुटना बदलना नहीं, बल्कि मरीज को दर्द से राहत देना, उसकी चलने-फिरने की क्षमता वापस लाना और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाना है। इसलिए सही समय पर सही निर्णय लेना ही सबसे महत्वपूर्ण है। न तो बिना जरूरत जल्दबाजी करनी चाहिए और न ही आवश्यकता होने पर अनावश्यक देरी। यही समझदारी घुटनों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने की कुंजी है।
-लेखक वरिष्ठ हड्डी व जोड़ रोग विशेषज्ञ व एसएलजी हॉस्पीटल, राजकीय जिला अस्पताल के पास हनुमानगढ़ टाउन के संचालक हैं






