







गोपाल झा
एकात्म मानववाद। भाजपा के पितृपुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बेहद लोकप्रिय सिद्धांत। ऐसा सिद्धांत, जिसमें मनुष्य सबसे ऊपर है। उसका शरीर। उसका मन। उसकी बुद्धि। उसकी आत्मा। सब कुछ सर्वाेपरि। भाजपा कार्यकर्ता पंडितजी की जयंती मना रहे हैं। मंच सजे। भाषण हुए। संकल्प लिए गए। पंडितजी को याद किया गया। याद करना अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि पंडितजी को समझा भी गया है क्या?
आज भाजपा देश के बड़े हिस्से में सत्ता में है। केंद्र में सरकार है। कई राज्यों में सरकार है। यानी एकात्म मानववाद को जमीन पर उतारने की क्षमता भी है। संसाधन भी हैं। सत्ता भी है। कमी है तो शायद सोच की। पंडितजी कहा करते थे, ‘अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव’ मूल समस्या है। कितनी बड़ी बात थी। अर्थ का अभाव आदमी को तोड़ देता है। और अर्थ का प्रभाव व्यवस्था को। आज दोनों दिखाई देते हैं।
एक तरफ धन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ गरीब की जेब खाली है। सत्ता और पूंजी की नजदीकियों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। बड़े कारोबारी समूहों को लेकर विपक्ष और आलोचक सरकार पर पक्षपात के आरोप लगाते रहे हैं। सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है। लेकिन सवाल अपनी जगह है। क्या यही एकात्म मानववाद है?
पंडितजी मनुष्य को चार हिस्सों में देखते थे। शरीर। मन। बुद्धि। आत्मा। शरीर भूखा हो तो मन कैसे प्रसन्न रहेगा? मन व्यथित हो तो बुद्धि कैसे स्वतंत्र रहेगी? और जब शरीर, मन और बुद्धि तीनों पीड़ा में हों तो आत्मा भला कैसे प्रसन्न रह सकती है? यही तो एकात्म मानववाद की बुनियादी चिंता थी।
मनुष्य को टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता। उसकी भूख को अलग करके उसके आत्मसम्मान की बात नहीं की जा सकती। उसकी मजदूरी रोककर उसके कल्याण की बात नहीं की जा सकती।
विडंबना देखिए। पंडितजी गरीब और अंतिम व्यक्ति की चिंता करते थे। उनके अनुयायी सत्ता के गलियारों में उनकी तस्वीर लगाते हैं। पंडितजी अर्थ के प्रभाव से सावधान करते थे। आज राजनीति में पूंजी के बढ़ते प्रभाव पर सवाल उठते हैं।
पंडितजी मनुष्य को केंद्र में रखते थे। आज कई बार व्यवस्था में मनुष्य से पहले आंकड़े दिखाई देते हैं। परियोजनाएं दिखाई देती हैं। निवेश दिखाई देता है। उद्योग दिखाई देते हैं। मजदूर दिखाई नहीं देता। किसान नजर नहीं आता।
यह सिर्फ भाजपा की कहानी नहीं है। भारतीय राजनीति में महापुरुषों के विचार अक्सर सत्ता की सीढ़ियां बन जाते हैं। महात्मा गांधी का नाम कांग्रेस ने लंबे समय तक अपने राजनीतिक संस्कार का आधार बनाए रखा। डॉ. आंबेडकर का नाम बहुजन राजनीति की ताकत बना। राममनोहर लोहिया समाजवादी राजनीति के प्रतीक बने।
नाम बचे रहे। विचार पीछे छूटते गए। क्या पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ भी यही हो रहा है? यह सवाल भाजपा से अधिक उन लोगों से है, जो पंडितजी को अपना वैचारिक मार्गदर्शक मानते हैं। सिर्फ तस्वीर लगाने से विचार जीवित नहीं रहते। सिर्फ भाषण देने से सिद्धांत जमीन पर नहीं उतरते।
सिद्धांत तब जीवित होता है, जब भूखे आदमी को रोटी मिलती है। मजदूर को उसकी मजदूरी मिलती है। कमजोर को न्याय मिलता है। और सत्ता के सामने खड़ा गरीब अकेला नहीं छोड़ा जाता।
पंडितजी चले गए। सिद्धांत छोड़ गए। अब सवाल उनके अनुयायियों का है। वे पंडितजी को सिर्फ याद करेंगे? या उनके विचारों को जिएंगे भी? क्योंकि एकात्म मानववाद केवल भाषण का विषय नहीं है। यह भूखे पेट की आवाज है। तो क्या, सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरान इस आवाज को सुनने का साहस दिखाएंगे ?
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






