





गोपाल झा
पंचायती राज चुनावों का बिगुल बजते ही हनुमानगढ़ जिले में जिला परिषद की सत्ता हासिल करने के लिए सियासी बिसात बिछने लगी है। 19 अक्टूबर से जिला परिषद डायरेक्टर पद के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इस बार का चुनाव कई मायनों में खास है। जिला बनने के बाद पहली बार जिला परिषद के वार्डों यानी जोनों की संख्या 29 से बढ़ाकर 37 की गई है। वहीं, जिला प्रमुख का पद सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित होने से भाजपा और कांग्रेस की रणनीति का केंद्र महिला दावेदार बन गई हैं। अब मुकाबला केवल डायरेक्टरों की सीटें जीतने का नहीं, बल्कि ऐसी महिला प्रत्याशी को मैदान में उतारने का है, जो चुनाव जीतने के साथ जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने की क्षमता भी रखती हो।
जिला परिषद चुनाव में पहली बार 37 जोनों में राजनीतिक दलों को अपनी ताकत आजमानी होगी। जोनों की बढ़ी संख्या ने टिकट वितरण का गणित भी बदल दिया है। दोनों प्रमुख दलों को उम्मीदवारों के चयन में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, जातीय समीकरण, संगठन के प्रति निष्ठा और जीतने की क्षमता के बीच संतुलन साधना होगा।
जिला प्रमुख का पद सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित होने से मुकाबले का एक अतिरिक्त पहलू सामने आया है। अब पार्टियां केवल यह नहीं देख रहीं कि किस क्षेत्र में कौन उम्मीदवार जीत सकता है, बल्कि यह भी परख रही हैं कि संभावित जिला प्रमुख के रूप में कौन-सा चेहरा पार्टी के भीतर और ग्रामीण राजनीति में स्वीकार्य होगा।
यही कारण है कि डायरेक्टर पद के टिकटों पर होने वाला फैसला जिला प्रमुख के संभावित चेहरे से जुड़ गया है। यदि किसी दल की प्रमुख दावेदार डायरेक्टर का चुनाव हार जाती है, तो जिला परिषद में बहुमत हासिल करने के बावजूद नेतृत्व को लेकर उसकी रणनीति प्रभावित हो सकती है।
भाजपा खेमे में जिला प्रमुख पद की दौड़ में दो नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। पहला नाम पूर्व उप जिला प्रमुख गुलाब सींवर का है। जिला परिषद और संगठन में काम करने का उनका अनुभव उनके पक्ष में माना जा रहा है। पंचायती राज की कार्यप्रणाली से परिचित होने के कारण वे इस दौड़ में एक अनुभवी विकल्प के रूप में देखी जा रही हैं।
दूसरा नाम नोहर पंचायत समिति की पूर्व प्रधान उर्मिला बिजारणियां का है। लंबे समय तक जयपुर में रहने के बाद उन्होंने चुनावी गतिविधियां तेज होते ही नोहर में सक्रियता बढ़ाई है। पार्टी कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी को चुनावी तैयारी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, अभी किसी नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगी है। दोनों चेहरों में से किसे आगे बढ़ाया जाएगा, यह पार्टी के आंतरिक समीकरणों, स्थानीय नेताओं की सहमति और चुनाव जीतने की संभावनाओं पर निर्भर करेगा।
जिले में भाजपा का राजनीतिक समीकरण इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि भादरा के विधायक संजीव बेनीवाल जिले में पार्टी के एकमात्र विधायक हैं। ऐसे में टिकट वितरण और चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। नोहर के पूर्व विधायक अभिषेक मटोरिया को भी मजबूत उम्मीदवार तैयार करने की जिम्मेदारी मिलने की चर्चा है। वहीं, पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रताप की पसंद को भी पार्टी के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। अमित चौधरी की भूमिका के साथ इन नेताओं के बीच तालमेल और प्रभाव का संतुलन टिकट चयन को प्रभावित कर सकता है। भाजपा के सामने चुनौती केवल मजबूत उम्मीदवार उतारने की नहीं, बल्कि संभावित असंतोष को नियंत्रित रखने की भी है। यदि टिकट वितरण में किसी प्रभावशाली खेमे की अनदेखी होती है, तो उसका असर चुनावी मैदान में दिखाई दे सकता है।
कांग्रेस के लिए जिला प्रमुख पद की दावेदारी भाजपा की तुलना में अधिक पेचीदा दिखाई दे रही है। यहां अनुभवी महिला नेताओं के साथ राजनीतिक परिवारों की दावेदारी भी चर्चा में है। सबसे चर्चित नाम शबनम गोदारा का है। पिछले विधानसभा चुनाव में वे संगरिया से टिकट की प्रबल दावेदार थीं, लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने अभिमन्यु पूनिया को उम्मीदवार बनाया। पूनिया ने चुनाव में रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की। इसके बाद शबनम को कोई बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं मिली। ऐसे में जिला परिषद चुनाव उनके लिए राजनीतिक भूमिका को फिर मजबूत करने का अवसर बन सकता है।
शबनम गोदारा के पक्ष में उनका राजनीतिक अनुभव है। वे उप जिला प्रमुख रह चुकी हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत सरपंच पद से की थी। ग्रामीण राजनीति और पंचायती राज संस्थाओं का अनुभव उन्हें संभावित दावेदारों में महत्वपूर्ण बनाता है।
दूसरा प्रमुख नाम हनुमानगढ़ पंचायत समिति की पूर्व प्रधान इंद्रा जाखड़ का है। वे और उनके पति दयाराम जाखड़ दोनों प्रधान रह चुके हैं। इस कारण क्षेत्र में उनका राजनीतिक और ग्रामीण नेटवर्क मजबूत माना जाता है। इसके अलावा कांग्रेस जिलाध्यक्ष मनीष मक्कासर की पत्नी सोनिया गोदारा का नाम भी चर्चा में है। वहीं, पूर्व प्रधान जयदेव भिडासरा अपनी पुत्रवधू के लिए पार्टी सिंबल की मांग कर रहे हैं। पूर्व मंत्री हरीश चौधरी के करीबी माने जाने वाले धर्मपाल गोदारा की पत्नी निर्मला गोदारा भी संभावित दावेदारों में शामिल हैं।
भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण के दौरान जीत की संभावना और संगठनात्मक संतुलन को एक साथ साधने की है। भाजपा अनुभवी चेहरों और प्रभावशाली नेताओं के बीच तालमेल बनाने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस को कई दावेदारों और राजनीतिक परिवारों की अपेक्षाओं के बीच रास्ता निकालना होगा।
दोनों दल नामों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। भाजपा की ओर से 20 अक्टूबर तक सूची तय करने की बात कही जा रही है, जबकि कांग्रेस भी जल्द प्रत्याशियों की घोषणा का दावा कर रही है। हालांकि, बगावत की आशंका के चलते अंतिम सूची आखिरी समय पर जारी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
आखिरकार, 37 जोनों में होने वाला यह चुनाव केवल जिला परिषद के सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया नहीं होगा। इसके नतीजे जिले के ग्रामीण राजनीतिक नेतृत्व की दिशा भी तय करेंगे। सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित जिला प्रमुख पद पर कौन काबिज होगा, इसका फैसला नामांकन से पहले चल रही रणनीतिक कवायद, टिकट वितरण, चुनावी जीत और उसके बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरणों से होकर गुजरेगा। फिलहाल, दोनों दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है, किस महिला चेहरे पर दांव लगाया जाए, जो चुनाव भी जिताए और जिला परिषद की सत्ता तक भी पहुंचाए?





