





राजप्रीत कौर
समाज में एकता की बातें बहुत होती हैं, लेकिन एकता का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या एकता केवल अपने परिवार, अपनी जाति या अपने समूह के लोगों के साथ खड़े होने का नाम है? या फिर इसका अर्थ है कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, वहाँ हम उसकी पहचान देखे बिना न्याय और इंसानियत के पक्ष में खड़े हों?
मान लीजिए, किसी गाँव में एक गरीब परिवार की समस्या को इसलिए अनदेखा किया जा रहा है क्योंकि उसके पास प्रभावशाली लोगों तक पहुँच नहीं है। यदि गाँव के लोग उस परिवार की समस्या को अपनी जिम्मेदारी समझकर समाधान के लिए आगे आते हैं, तो यह एकता है।
यदि किसी महिला को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया जाता और समाज के लोग उसके अधिकारों का समर्थन करते हैं, तो यह एकता है। यदि किसी व्यक्ति के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है और दूसरे लोग चुप रहने के बजाय निष्पक्षता से उसका विरोध करते हैं, तो यह भी एकता है।
एकता का अर्थ यह नहीं कि हम हर बात पर सहमत हों। इसका अर्थ है कि विचार अलग होने के बावजूद हम एक-दूसरे के सम्मान और अधिकारों को स्वीकार करें।
एकता केवल अपने लोगों के साथ खड़े होने में नहीं, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए सबके साथ खड़े होने में है।
पंचायत चुनाव केवल सरपंच या वार्ड पंच चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं। ये हमारे गाँव के भविष्य और हमारी सामाजिक सोच से भी जुड़े हैं। गाँव में सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और रोजगार जैसे अनेक मुद्दे होते हैं। इसलिए प्रतिनिधि चुनते समय हमें उसके काम, विचारों, योजनाओं और जनता के प्रति जवाबदेही को महत्त्व देना चाहिए।
लेकिन जब चुनाव में जातिगत समीकरण, व्यक्तिगत दुश्मनी, धनबल, दबाव या प्रलोभन हावी हो जाते हैं, तो विकास से जुड़े वास्तविक सवाल पीछे छूट सकते हैं।
यदि कोई मतदाता पैसों या शराब के प्रलोभन में अपना वोट देता है, तो वह अपने निर्णय को निजी लाभ तक सीमित कर सकता है। मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के प्रति जिम्मेदारी भी है। हमें उम्मीदवार चुनते समय यह सोचना चाहिए कि वह गाँव की समस्याओं को समझता है या नहीं और उनके समाधान के लिए क्या कर सकता है।
यह समस्या केवल पंचायत चुनावों तक सीमित नहीं है। जब हम अपने सामाजिक जीवन में भी किसी व्यक्ति की योग्यता से अधिक उसकी जाति, धन या प्रभाव को महत्त्व देते हैं, तो वही सोच दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। इसलिए बदलाव केवल चुनाव के समय नहीं, हमारे रोजमर्रा के निर्णयों में भी जरूरी है।
महिला सशक्तिकरण की बात करना आसान है, लेकिन उसे व्यवहार में अपनाना अधिक महत्त्वपूर्ण है। पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने उन्हें नेतृत्व के अवसर दिए हैं। फिर भी, जहाँ निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के स्थान पर परिवार का कोई पुरुष सदस्य वास्तविक निर्णय लेने लगता है, वहाँ महिला की स्वतंत्र भागीदारी का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय ने 11 फरवरी 2026 को राज्यसभा में दी गई जानकारी में बताया कि महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर पुरुष परिजनों द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने की समस्या की जाँच के लिए गठित समिति की सिफारिशें स्वीकार की गई हैं। इनमें महिला प्रतिनिधियों की क्षमता बढ़ाने, कानूनी सुरक्षा और वास्तविक नेतृत्व को मजबूत करने जैसे उपाय शामिल हैं।
यह हर महिला प्रतिनिधि की स्थिति नहीं है। अनेक महिलाएँ स्वतंत्र रूप से अपनी जिम्मेदारियाँ निभाती हैं। लेकिन जहाँ महिला के पद पर होने के बावजूद निर्णय कोई और लेता है, वहाँ हमें यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि क्या उसे वास्तविक अधिकार मिल रहे हैं?
यही बात परिवारों में भी लागू होती है। बेटी को शिक्षित करना, लेकिन उसे अपने करियर का निर्णय न लेने देना; महिला से जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करना, लेकिन उसकी राय को महत्त्व न देनाकृये विरोधाभास हैं। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल अवसर देना नहीं, बल्कि उसे अपने अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करने देना भी है।
राजस्थान के राजसमंद जिले का पिपलांत्री गाँव एक सकारात्मक पहल का उदाहरण है। भारत सरकार के एक आधिकारिक दस्तावेज में वर्णित इस पहल के अनुसार, गाँव में बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाने की परंपरा शुरू की गई। इसके साथ बेटी के भविष्य और शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है। इस पहल ने बेटियों के स्वागत को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया। इस उदाहरण का महत्त्व केवल पौधे लगाने में नहीं है। यह दिखाता है कि किसी सामाजिक विचार को व्यवहार में उतारने के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकते हैं।
यदि हम बेटियों के सम्मान की बात करते हैं, तो उनके जन्म, शिक्षा और भविष्य को महत्त्व देना होगा। यदि हम पर्यावरण की चिंता करते हैं, तो पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल भी करनी होगी। यदि हम गाँव के विकास की बात करते हैं, तो केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे वर्ष अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
हर गाँव की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। पिपलांत्री का उदाहरण यह दावा नहीं करता कि एक ही तरीका हर जगह सफल होगा। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने गाँव की जरूरतों के अनुसार शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक सहयोग से जुड़ी पहल करें। बदलाव के लिए हमेशा बड़े पद या बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। सही दिशा में लगातार किए गए छोटे प्रयास भी समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।
जब समाज में कोई समस्या आती है, तो हम अक्सर दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन हमें अपनी भूमिका भी समझनी होगी। यदि हम जातिगत भेदभाव का विरोध करते हैं, तो अपने व्यवहार में भी समानता अपनानी होगी। यदि हम महिला सशक्तिकरण चाहते हैं, तो महिलाओं की बात सुननी और उनके निर्णयों का सम्मान करना होगा। यदि हम एकता चाहते हैं, तो दूसरों की समस्याओं के समय भी साथ देना होगा।
बदलाव की शुरुआत कुछ सरल कदमों से हो सकती है
-किसी व्यक्ति को उसकी जाति या आर्थिक स्थिति के आधार पर कमतर न समझना।
-महिलाओं की राय को महत्त्व देना और उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर देना।
-चुनाव में दबाव और प्रलोभन के बजाय सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देना।
-किसी के साथ अन्याय होने पर उसकी पहचान देखने के बजाय न्याय का साथ देना।
-गाँव की समस्याओं पर केवल शिकायत करने के बजाय समाधान के लिए सामूहिक प्रयास करना।
ये कदम छोटे लग सकते हैं, लेकिन जब लोग इन्हें अपने व्यवहार में अपनाते हैं, तो बदलाव की नींव मजबूत होती है।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि समाज की पुरानी सोच एक दिन में नहीं बदलती। इसके लिए समय, जागरूकता और निरंतर प्रयास की जरूरत होती है। लेकिन बदलाव में समय लगना, शुरुआत न करने का कारण नहीं बनना चाहिए।
आने वाली पीढ़ी को कैसा समाज देना चाहते हैं?
हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे शिक्षित हों, सफल हों और बेहतर जीवन जिएँ। लेकिन क्या केवल शिक्षा और आर्थिक सफलता ही पर्याप्त हैं? यदि कोई बच्चा शिक्षित होने के बावजूद दूसरे बच्चे को उसकी जाति या आर्थिक स्थिति के कारण कम समझता है, तो उसे समानता का वास्तविक अर्थ सीखना बाकी है। हमें आने वाली पीढ़ी को केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ना भी सिखाना होगा। उन्हें समझाना होगा कि असहमति का अर्थ अपमान नहीं है और किसी दूसरे के अधिकारों के लिए खड़ा होना भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।
बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमारा व्यवहार भी देखते हैं। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी भेदभाव से ऊपर उठे, तो हमें अपने जीवन में समानता, सम्मान और सहयोग को अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
समाज में एकता, समानता और बदलाव की बातें करना आसान है। कठिन काम है उन विचारों को अपने व्यवहार में उतारना।
पंचायत चुनाव हों, परिवार हो, शिक्षा हो या सामाजिक जीवन, हर जगह हमारी सोच और हमारे फैसले मायने रखते हैं। समाज की प्रगति केवल सड़कों, इमारतों और तकनीक से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि कमजोर व्यक्ति की आवाज सुनी जाती है या नहीं, महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलती है या नहीं और भेदभाव के विरुद्ध लोग खड़े होते हैं या नहीं।
हमें दूसरों से बदलाव की अपेक्षा करने के साथ स्वयं भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। यदि हम चाहते हैं कि समाज में समानता हो, तो हमें समानता का व्यवहार करना होगा। यदि हम एकता चाहते हैं, तो हमें अपने दायरे से बाहर निकलकर दूसरों की समस्याओं को भी समझना होगा। बदलाव केवल सुनाने के लिए नहीं, करके दिखाने के लिए होना चाहिए। एकता केवल कहने के लिए नहीं, निभाने के लिए होनी चाहिए।
क्योंकि समाज तब बदलता है, जब लोग केवल दूसरों से सवाल पूछना बंद करके स्वयं से भी सवाल पूछते हैं; जब वे केवल अपने अधिकारों की बात नहीं करते, बल्कि दूसरों के अधिकारों का सम्मान भी करते हैं; और जब वे केवल अपने लोगों के साथ नहीं, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए सबके साथ खड़े होते हैं। अब सवाल हम सभी से है, क्या हम केवल एक बेहतर समाज की बातें करते रहेंगे, या उसे बनाने की जिम्मेदारी भी उठाएँगे?




