





गोपाल झा
लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता, दोनों का अपना महत्व है। एक ओर पत्रकारिता का दायित्व सत्ता, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थानों के कामकाज की पड़ताल करना है, तो दूसरी ओर प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा भी जरूरी है। चुनौती तब पैदा होती है, जब निजता की रक्षा के लिए बनाया गया कानून सार्वजनिक हित में की जाने वाली पत्रकारिता के रास्ते में बाधा बन सकता है। केंद्र सरकार के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) कानून को लेकर उठ रही चिंताओं को इसी संदर्भ में समझने की जरूरत है।
डिजिटल माध्यमों का विस्तार होने के बाद समाचार-पत्रों और टेलीविजन चैनलों के लिए ऑनलाइन उपस्थिति अनिवार्य होती जा रही है। बड़ी संख्या में पाठक और दर्शक अब मोबाइल स्क्रीन के जरिए समाचार पढ़ते और देखते हैं। ऐसे में डिजिटल पत्रकारिता पर लागू होने वाले किसी भी कानून का प्रभाव केवल मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नागरिकों तक सूचना पहुंचने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।
डीपीडीपी कानून का घोषित उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना और उसके इस्तेमाल के लिए जवाबदेही तय करना है। यह उद्देश्य अपने आप में महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का अनधिकृत इस्तेमाल, उसका दुरुपयोग या सार्वजनिक हो जाना गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। लेकिन कानून के प्रावधानों को लागू करते समय यह भी देखना होगा कि व्यक्तिगत निजता की रक्षा और जनहित में सूचनाओं के खुलासे के बीच उचित संतुलन बना रहे।
यहीं से खोजी पत्रकारिता को लेकर सवाल उठते हैं। भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितताओं और सार्वजनिक पदों के दुरुपयोग से संबंधित खबरों में कई बार ऐसे दस्तावेजों और सूचनाओं का इस्तेमाल होता है, जिनमें किसी व्यक्ति की पहचान या अन्य व्यक्तिगत विवरण शामिल हो सकते हैं। यदि इन सूचनाओं के संग्रह, सत्यापन और प्रकाशन पर कानूनी बाधाएं बढ़ती हैं, तो पत्रकारों के लिए जनहित से जुड़े मामलों की पड़ताल कठिन हो सकती है।
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने इसी आशंका को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। कल यानी 27 अक्टूबर 2026 को शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के लिए निर्धारित की। एसोसिएशन का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी खबरों, समयबद्ध रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू सूचना का अधिकार भी है। वर्ष 2005 में यूपीए सरकार द्वारा लागू सूचना का अधिकार कानून ने नागरिकों को सरकारी कामकाज से जुड़ी सूचनाएं प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम दिया। पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में इसकी भूमिका रही है। लेकिन डीपीडीपी कानून के साथ आरटीआई कानून में किए गए संशोधन को लेकर भी सवाल उठे हैं। इसलिए यह बहस केवल पत्रकारों की सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात से जुड़ी है कि नागरिकों को सार्वजनिक संस्थानों के कामकाज की जानकारी किस सीमा तक मिल सकेगी।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी व्यक्ति के निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करना पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं हो सकता। किसी घोटाले की खबर में निजी जानकारी तभी प्रकाशित की जानी चाहिए, जब उसका स्पष्ट संबंध जनहित से हो और तथ्यों की पुष्टि पर्याप्त साक्ष्यों से की गई हो। निजता की रक्षा और खोजी पत्रकारिता के बीच टकराव की स्थिति में कानून को ऐसा रास्ता देना चाहिए, जिससे निर्दाेष नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें और भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग से जुड़े मामले भी सामने आ सकें।
भारतीय पत्रकारिता पहले से ही विश्वसनीयता की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे माहौल में तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्वतंत्र संपादकीय निर्णय और जवाबदेही पहले से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि पत्रकारों को स्रोतों की पहचान उजागर होने या व्यक्तिगत डेटा से संबंधित प्रावधानों के दुरुपयोग का वास्तविक भय सताता है, तो इससे खबरों की पड़ताल प्रभावित हो सकती है।
अंततः, लोकतंत्र में न निजता की कीमत पर पत्रकारिता होनी चाहिए और न निजता के नाम पर जनहित की पत्रकारिता बाधित होनी चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून के उद्देश्य और उसके व्यावहारिक प्रभावों के बीच संतुलन स्पष्ट करे। मीडिया संस्थानों को भी अपनी जवाबदेही और तथ्य-जांच के मानकों को मजबूत करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और जनता के जानने के अधिकार को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए। इस सवाल का जवाब केवल मीडिया के भविष्य के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं





