






गोपाल झा
राजस्थान में जब कांग्रेस नेता अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनका एक स्लोगन खूब चर्चा में रहा था, ‘हर गलती कीमत मांगती है।’ उस दौर में सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर इस स्लोगन की पट्टियां चस्पा नजर आती थीं। संदेश सीधा था, गलती कैसी भी हो, उसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। राजनीति में तो यह सिद्धांत और भी ज्यादा लागू होता है। यहां एक गलत फैसला न केवल कुर्सी छीन सकता है, बल्कि वर्षों में बनाई गई राजनीतिक जमीन भी खिसका सकता है।
हनुमानगढ़ में इन दिनों ‘पॉलिटिकल मिस्टेक’ नामक सियासी नाटक चल रहा है। इसके प्रमुख किरदार हैं निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल, भाजपा और कांग्रेस। तीनों के पास अपने तर्क हैं, अपने राजनीतिक हित हैं और अपनी-अपनी मजबूरियां भी। मगर घटनाक्रम पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि एक खेमे की गलती दूसरे के लिए अवसर बनती रही और एक के फैसले ने दूसरे की नाराजगी को हवा दी। नगरपरिषद की राजनीति से शुरू हुआ टकराव अब भाजपा-विधायक संबंधों, कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियों और पंचायतराज चुनाव की रणनीति तक पहुंच गया है। सवाल यह है कि इन गलतियों से किसने क्या खोया और आने वाले चुनावों में किसे इसकी सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है?
विधायक गणेशराज बंसल, 7 गलतियां, जिनकी कीमत चुकानी पड़ी
- विरोधियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा सख्ती
गणेशराज बंसल की राजनीतिक यात्रा में पहली बड़ी चूक सभापति बनने के बाद विरोधियों के प्रति कठोर रवैया अपनाने को माना जा सकता है। पूर्व सभापति राजकुमार हिसारिया हों या अन्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, नगरपरिषद की कार्रवाइयों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे। शहर में ऐसे प्रकरणों की चर्चा हुई, जिनमें विरोध करने वालों के मकान या दुकानों की पैमाइश के लिए नगरपरिषद की टीमें पहुंचने की बात सामने आई।
नियमों के तहत कार्रवाई करना प्रशासन का अधिकार है, लेकिन जब ऐसी कार्रवाइयों को राजनीतिक विरोध से जोड़कर देखा जाने लगे तो सत्ता की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। लोकतंत्र में असहमति को जगह देना नेतृत्व की परिपक्वता का परिचायक है। बंसल की सख्ती ने समर्थकों के बीच उनकी मजबूत छवि बनाई हो सकती है, लेकिन विरोधियों को एकजुट होने का अवसर भी दिया। यही वह बिंदु है, जहां ताकत का प्रदर्शन राजनीतिक कमजोरी में बदल सकता है। - निर्दलीय बोर्ड बनाने की जिद
नगरपरिषद चुनाव में निर्दलीय बोर्ड बनाने का फैसला बंसल की दूसरी बड़ी राजनीतिक चूक के रूप में देखा जा सकता है। भाजपा की ओर से बोर्ड गठन को लेकर विकल्प सामने आने की चर्चा रही, लेकिन विधायक ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के आधार पर आगे बढ़ना पसंद किया। उनकी मंशा अपने जनाधार और राजनीतिक स्वायत्तता को साबित करने की रही होगी, लेकिन सवाल यह था कि क्या इस लड़ाई की कीमत चुकाने के लिए वे पूरी तरह तैयार थे?
निर्दलीय विधायक की अपनी ताकत होती है, लेकिन सरकार के पास प्रशासनिक तंत्र और अन्य संसाधन होते हैं। सरकार को समर्थन देने के बावजूद उसके स्थानीय नेतृत्व से टकराव मोल लेना जोखिम भरा कदम था। यदि मकसद शहर की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करना था, तो उसके लिए संवाद और समझौते के रास्ते भी खुले रखे जा सकते थे। राजनीतिक जिद तत्काल संतोष दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में विकल्प सीमित कर देती है। - जातीय समीकरणों का असंतुलित प्रबंधन
बंसल की राजनीति में जातीय और भाषायी समीकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। राजनीतिक चर्चाओं में एक जाति विशेष की नाराजगी का सवाल उठता रहा, जबकि दूसरे सामाजिक समूहों में उनकी मजबूत पकड़ की बात भी सामने आती रही है। यहां गलती किसी जाति के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन को पर्याप्त महत्व न देने में हो सकती है।
राजनीति में हर समूह को एक साथ खुश रखना संभव नहीं होता। लेकिन किसी एक समूह की नाराजगी के बदले दूसरे समूहों से मिलने वाला समर्थन कितना टिकाऊ है, इसका आकलन जरूरी है। यदि नया समर्थन पुराने नुकसान की भरपाई कर दे तो रणनीति सफल हो सकती है, लेकिन यदि नाराजगी स्थायी राजनीतिक विरोध में बदल जाए तो वही रणनीति बोझ बन जाती है। - विरोध के बावजूद उसी सामाजिक समूह से चेयरपर्सन बनाना
जिस सामाजिक समूह को लेकर बंसल के साथ टकराव की चर्चा रही, उसी समूह की पार्षद को चेयरपर्सन बनाने की स्थिति ने उनकी रणनीति पर सवाल खड़े किए। राजनीतिक समझौते गलत नहीं होते। कई बार परिस्थितियां नेता को अपने पुराने रुख में बदलाव करने के लिए मजबूर करती हैं। लेकिन समझौते का राजनीतिक संदेश संभालना भी जरूरी होता है।
यदि पहले का रुख और बाद का फैसला एक-दूसरे के विपरीत दिखाई दें, तो समर्थकों के मन में असमंजस पैदा हो सकता है। विरोधियों को भी सवाल उठाने का अवसर मिलता है। राजनीति में फैसले की व्यावहारिकता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह बताना है कि फैसला क्यों लिया गया। - परिवारवाद के मुद्दे पर सवालों के घेरे में आना
बंसल ने जिस परिवारवाद और वंशवाद की राजनीति पर सवाल उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन बनाई, नगरपरिषद चुनाव में पत्नी और पुत्री को मैदान में उतारने के फैसले ने उन्हें उसी मुद्दे पर आलोचना का सामना करने की स्थिति में ला दिया। परिजनों का चुनाव लड़ना अपने आप में गलत नहीं है। प्रत्येक नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है। लेकिन जब कोई नेता परिवारवाद के विरोध को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाता है, तो उसके अपने फैसलों की कसौटी भी कठोर हो जाती है। यहां सवाल चुनाव लड़ने के अधिकार का नहीं, राजनीतिक कथनी और करनी के बीच दिखाई देने वाले अंतर का है। - सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से संवाद में दूरी
मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के फोन नहीं उठाने या अपेक्षित संवाद नहीं रखने के आरोपों को भी बंसल की राजनीतिक चूकों में गिना जा सकता है। किसी जनप्रतिनिधि का सरकार से मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन संवाद के रास्ते बंद करना उसके लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है। विशेषकर निर्दलीय विधायक के लिए सरकार के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। राजनीतिक असहमति को संवाद के जरिए संभाला जा सकता है, लेकिन संवादहीनता अविश्वास को बढ़ाती है। इसका नुकसान केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास कार्यों और राजनीतिक निर्णयों पर भी पड़ सकता है। - जेल से बाहर आने के बाद जांघ पर ताल ठोकना
जेल से बाहर आने के बाद समर्थकों के बीच जांघ पर ताल ठोकने का बंसल का अंदाज समर्थकों को शक्ति प्रदर्शन लगा होगा। लेकिन राजनीति में हर प्रतीक का अर्थ केवल समर्थकों की नजर से तय नहीं होता। विरोधी इसे चुनौती के रूप में भी पढ़ सकते हैं। पहलवानी के अखाड़े में ताल ठोकना सामने वाले को ललकारने का संकेत है। मगर जब सामने राजनीतिक सत्ता हो, तब हर चुनौती का जवाब केवल ताकत के प्रदर्शन से नहीं दिया जा सकता। कानूनी और राजनीतिक मोर्चों पर संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। समर्थकों की तालियां तत्काल उत्साह बढ़ा सकती हैं, लेकिन राजनीति में दीर्घकालिक सफलता के लिए संयम भी उतना ही आवश्यक है।
भाजपा: 7 गलतियां, जिन्होंने अपने ही समीकरण उलझाए - विधायक को अपना नहीं मानना
भाजपा की सबसे बड़ी चूक यह रही कि समर्थन लेने के बावजूद स्थानीय स्तर पर गणेशराज बंसल के साथ भरोसे का रिश्ता मजबूत नहीं हो सका। पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रताप को विश्वास में लिए बिना सुमित रणवां को चेयरमैन बनवाने के घटनाक्रम ने जिले में सत्ता के दो केंद्र होने का संदेश दिया। प्रदेश नेतृत्व की जिम्मेदारी थी कि दोनों पक्षों को साथ बैठाकर विवाद सुलझाने का प्रयास करता। ऐसा नहीं होने से कार्यकर्ताओं के सामने असमंजस पैदा हुआ कि राजनीतिक फैसलों में किसकी बात अंतिम है। संगठन की ताकत तभी काम आती है, जब उसके भीतर कम से कम बुनियादी स्तर पर एकरूपता हो। जब कार्यकर्ता ही नेतृत्व के दो केंद्रों के बीच उलझ जाए, तो चुनावी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अंदरूनी खींचतान में खर्च हो जाता है। - नगरपरिषद चुनाव से पहले समझौते को स्पष्ट रूप नहीं देना
यदि विधायक और भाजपा के बीच किसी साझा रणनीति की संभावना थी, तो उसे समय रहते स्पष्ट करना चाहिए था। अस्पष्ट समझौते दोनों पक्षों को अपनी-अपनी व्याख्या करने का अवसर देते हैं। नतीजा यह हुआ कि विधायक ने अपने हिसाब से फैसले लिए और स्थानीय भाजपा नेतृत्व अपनी राजनीतिक गणना करता रहा। राजनीतिक गठबंधन केवल समर्थन के बयान से नहीं चलते। उनमें जिम्मेदारियों, चुनावी रणनीति और भविष्य के सहयोग को लेकर स्पष्टता जरूरी होती है। पहले से तय व्यवस्था होती तो टकराव की गुंजाइश कम हो सकती थी। - अपने दम पर जीत का अतिआत्मविश्वास
स्थानीय भाजपा नेतृत्व ने अपने दम पर चुनाव जीतने की उम्मीद पाली और इसके लिए मेहनत भी की। लेकिन अपेक्षित नतीजे नहीं मिले। इससे सवाल उठता है कि क्या पार्टी ने शहर के वास्तविक राजनीतिक समीकरणों, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और विधायक के जनाधार का सही आकलन किया था? संगठन का झंडा और चुनाव चिह्न महत्वपूर्ण हैं, लेकिन स्थानीय चुनावों में व्यक्तिगत संपर्क, सामाजिक समीकरण और स्थानीय नाराजगी भी निर्णायक होते हैं। पार्टी की ताकत को वास्तविक परिस्थितियों से ऊपर मान लेना चुनावी रणनीति की बड़ी कमजोरी साबित हो सकता है। - मुकदमों और पुलिस कार्रवाई से राजनीतिक टकराव बढ़ने देना
चुनाव परिणामों के बाद विधायक के खिलाफ मुकदमे और गिरफ्तारी, निर्दलीय पार्षदों को मतदान से रोकने की कथित कोशिश तथा पुलिस बल के दुरुपयोग के आरोपों ने विवाद को और गहरा किया। आलोचकों ने इसे कानून के शासन के बजाय ‘डंडाराज’ कायम करने की कोशिश के रूप में पेश किया। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और प्रत्येक कार्रवाई की कानूनी स्थिति अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इतना स्पष्ट है कि यदि कार्रवाई को प्रतिशोध के रूप में देखा जाने लगे, तो सरकार और पार्टी दोनों की छवि प्रभावित होती है। - सरकार के कदम का श्रेय लेकर खुद फंसे नेता
माना जा रहा है कि विधायक व उनके समर्थकों पर हुई कार्रवाई में स्थानीय नेताओं का कोई रोल नहीं था, सब कुछ उच्च स्तर पर चल रहा था लेकिन स्थानी नेतृत्व ने यह संदेश दिया कि वे ही सब कुछ करवा रहे हैं। यह कदम उनके लिए ‘आ बैल मुझे मार’ वाली साबित हुआ। लोगों ने इसे बदले की राजनीति का परिचायक और निंदनीय बताया। हनुमानगढ़ में सरकार और भाजपा के प्रति अविश्वास का माहौल बनने की चर्चा इसी संदर्भ में हुई। सत्ता की ताकत का इस्तेमाल यदि राजनीतिक संदेश के रूप में दिखाई देने लगे, तो उसका उलटा असर भी हो सकता है। - पंचायतराज चुनाव में विधायक को दूर रखना
पंचायत समितियों और जिला परिषद के चुनाव में बंसल के जनाधार को साथ लेने की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता था। स्थानीय स्तर पर भाजपा के प्रति नाराजगी की स्थिति में विधायक के समर्थित उम्मीदवारों के साथ तालमेल बनाना पार्टी के लिए एक विकल्प हो सकता था। जीत के बाद सहयोग की गुंजाइश रखने वाली रणनीति से भाजपा कुछ सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर सकती थी। यह कहना संभव नहीं कि ऐसा करने पर पार्टी को निश्चित रूप से सफलता मिलती, लेकिन किसी संभावित सहयोगी को पूरी तरह अलग कर देना राजनीतिक विकल्पों को सीमित करता है। - समझौते की खबर पर स्थानीय नेतृत्व को विश्वास में नहीं लेना
प्रदेश स्तर पर समझौते की खबर सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर उसे नकारने और सोशल मीडिया पर खंडन की चर्चा ने भाजपा के भीतर संवादहीनता उजागर की। समझौता हुआ तो स्थानीय नेतृत्व को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए थी। स्थानीय नेताओं को अनदेखा करने से नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक रूप से अलग-अलग संदेश जाने से पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठते हैं। प्रदेश नेतृत्व की रणनीति तभी सफल हो सकती है, जब स्थानीय नेतृत्व को उसके उद्देश्य और राजनीतिक लाभ समझ में आएं।
कांग्रेस, 7 गलतियां, जिनसे अपने ही पार्षद दूर होते गए - गणेशराज बंसल को ‘फ्री हैंड’ देना
कांग्रेस की पहली बड़ी चूक 2019 में बंसल को चेयरमैन बनाने के बाद उनके साथ संगठनात्मक संतुलन कायम नहीं रख पाना रही। पूर्व मंत्री चौधरी विनोद कुमार के नेतृत्व में बंसल को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलने की चर्चा रही, जबकि पार्षदों और स्थानीय नेतृत्व के बीच समन्वय कमजोर होता गया। किसी नेता को जिम्मेदारी देना और उसे पूरी तरह संगठन से अलग छोड़ देना दो अलग बातें हैं। कांग्रेस नेतृत्व को पार्षदों से नियमित संवाद रखना चाहिए था, उनकी समस्याएं सुननी चाहिए थीं और समय रहते समाधान का प्रयास करना चाहिए था। जब संगठन का संपर्क कमजोर पड़ता है, तो पद पर बैठा नेता अपने स्वतंत्र राजनीतिक नेटवर्क को मजबूत करता जाता है और पार्टी का प्रभाव सीमित होने लगता है। - अविश्वास प्रस्ताव से पहले पार्षदों की बैठक नहीं बुलाना
उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान मतदान से पहले पार्षदों से संवाद करने और उनकी शिकायतें सुनने का अवसर था। लेकिन असंतोष मतदान तक पहुंच जाए और नेतृत्व उसकी वजह समझने का प्रयास न करे, तो यह संगठनात्मक कमजोरी है। बैठक करने से सभी मतभेद दूर हो जाते, इसकी गारंटी नहीं थी। लेकिन संवाद से नाराजगी के कारण सामने आते और समाधान की संभावना बनती। राजनीति में कई बार हार का कारण विरोधियों की ताकत नहीं, बल्कि अपने लोगों की अनसुनी शिकायतें होती हैं। - विरोध करने वाले पार्षदों से दूरी बनाना
अविश्वास प्रस्ताव में शामिल पार्षदों से दूरी बनाए रखने के बजाय नेतृत्व को उनके असंतोष की वजह जाननी चाहिए थी। राजनीतिक दल में विरोध करने वाला प्रत्येक व्यक्ति दुश्मन नहीं होता। कई बार उसकी नाराजगी संगठन को अपनी कमियां सुधारने का अवसर देती है। बताया जाता है कि ऐसे कई पार्षद बाद में बंसल के करीब होते गए। यदि ऐसा हुआ, तो कांग्रेस ने अपने ही असंतुष्ट नेताओं को प्रतिद्वंद्वी के राजनीतिक आधार में बदलने दिया। यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी का मामला नहीं, बल्कि संगठनात्मक प्रबंधन की विफलता का संकेत भी है। - टिकट के इच्छुक पार्षदों को साथ नहीं रख पाना
नगरपरिषद चुनाव से पहले कम से कम 10 से 12 तत्कालीन पार्षदों के कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक होने की चर्चा रही। लेकिन पार्टी के भीतर कथित तौर पर ‘गद्दार’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल से उनके लिए माहौल असहज हुआ और वे पार्टी से दूर होते गए। यदि कांग्रेस समय रहते इन पार्षदों से संवाद करती, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समझती और टिकट वितरण में व्यावहारिक रणनीति अपनाती, तो परिणाम अलग हो सकते थे। राजनीतिक आकलन के मुताबिक, बेहतर समन्वय से पार्टी की पार्षद संख्या 20 से अधिक होने की संभावना बन सकती थी। यह निश्चित परिणाम नहीं, लेकिन खोए हुए अवसर की ओर संकेत जरूर करता है। - रणनीति के बिना चुनाव मैदान में उतरना
नगरपरिषद चुनाव हो या पंचायत चुनाव। कांग्रेस में रणनीतिक कौशल नहीं दिखा। कुछ लोग ही नेतृत्व के निकट दिखे और फौरी निर्णय लेते रहे। इससे कांग्रेस अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम नहीं ला सकी। विश्लेषकों में इस बात की हैरानी देखी गई कि जो बीजेपी जी जान जुटकर नगरपरिषद चुनाव में महज 15 सीटें हासिल कर पा रही है, वहीं कांग्रेस घर बैठे 10 सीटों पर जीत हासिल कर पाई और एक सीट टाइ हो गई। अगर पार्टी रणनीतिक कौशल दिखाती तो यह आंकड़ा 20 पार कर सकता था। - भाजपा के साथ कथित गुप्त बैठक पर चुप्पी
नगरपरिषद चुनाव के बाद भाजपा नेताओं के साथ कथित गुप्त बैठक की चर्चा सामने आई, लेकिन इस पर स्पष्ट स्थिति नहीं बन पाई। बैठक की पुष्टि के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। फिर भी राजनीतिक संचार के स्तर पर अस्पष्टता ने सवालों को जगह दी। विपक्षी दल के लिए अपने राजनीतिक रुख को स्पष्ट रखना जरूरी होता है। बैठक हुई थी तो उसके उद्देश्य पर स्थिति रखी जा सकती थी और चर्चा निराधार थी तो उसका खंडन किया जा सकता था। चुप्पी ने पार्टी को अपनी बात रखने के बजाय दूसरों की व्याख्याओं पर निर्भर रहने की स्थिति में ला दिया। - पंचायत चुनाव में भी एकजुटता की कमी
पंचायतीराज चुनाव में पार्टी ने सबक लेने की जहमत नहीं उठाई। टिकट वितरण में गंभीरता का अभाव, एक-दूसरे नेताओं को पटखनी देने की जिद। सबकी अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं। जिला परिषद चुनाव में जिस तरह पार्टी ने परिवारवाद को बढावा दिया है, आम जन में चर्चा तेज है। वहीं, एकजुटता के बिना पार्टी चुनावी समर में है। जबकि चुनाव हमेशा एकजुट होकर लड़ा जाता है।
आगे क्या: अब पंचायत चुनाव में किसकी गलती पड़ेगी भारी?
हनुमानगढ़ की मौजूदा राजनीति में तीनों खेमों की गलतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। गणेशराज बंसल ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के भरोसे फैसले लिए, लेकिन सरकार और स्थानीय भाजपा नेतृत्व के साथ संतुलन बनाए रखने में कठिनाइयां सामने आईं। भाजपा ने विधायक के जनाधार को अपने साथ जोड़ने की संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं किया और स्थानीय नेतृत्व के बीच संवाद की कमी से अपने समीकरण उलझाए। कांग्रेस अपने ही पार्षदों और स्थानीय नेताओं के साथ संवाद बनाए रखने में कमजोर रही, जिससे विरोधियों को राजनीतिक अवसर मिला।
अब पंचायतराज चुनाव इन तीनों की रणनीतियों की परीक्षा होंगे। भाजपा के सामने संगठनात्मक एकजुटता साबित करने की चुनौती है। विधायक इस चुनाव में कुछ कर पाएंगे, संदेह हैं, क्योंकि पार्टी ने उन्हें अलग-थलग कर दिया है। वहीं, कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह अपने पुराने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व को साथ लेकर चले तथा भाजपा और विधायक के बीच टकराव से पैदा होने वाले अवसरों को रणनीतिक रूप से भुनाए। हालांकि, चुनावी नतीजे केवल इन गलतियों से तय नहीं होंगे। उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे, जातीय समीकरण, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं का रुख भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। लेकिन इतना तय है कि राजनीतिक दलों की अंदरूनी कमजोरियां चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती हैं।
राजनीति में गलती करना असामान्य नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि नेता अपनी गलती पहचानकर उसमें सुधार करता है या उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेता है। हनुमानगढ़ में गणेशराज बंसल, भाजपा और कांग्रेस, तीनों के सामने यही कसौटी है। ‘हर गलती कीमत मांगती है।’ अब देखना यह है कि पंचायत चुनाव में किसकी राजनीतिक गलती सबसे महंगी साबित होती है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं





