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राजस्थान के सीमावर्ती जिले हनुमानगढ़ की राजनीति में एक बार फिर बड़ा शक्ति-संतुलन बदलता नजर आ रहा है। लंबे समय से चल रही तनातनी और कानूनी दांवपेच के बाद निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल और राज्य सरकार के बीच ‘सीजफायर’ यानी संघर्ष विराम की सूचनाएं छनकर बाहर आ रही हैं। उच्चस्तरीय सियासी गलियारों में हुई एक गोपनीय बैठक के बाद दोनों पक्षों के बीच सुलह का रास्ता निकला है। इस समझौते की धुरी हनुमानगढ़ जिले में आगामी पंचायत, जिला परिषद और स्थानीय निकाय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को मजबूत करने की शर्त पर टिकी बताई जा रही है। राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन; समय और सियासी जरूरतें ही फैसलों की दिशा तय करती हैं। हनुमानगढ़ का मौजूदा घटनाक्रम इसी राजनीतिक यथार्थ का प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर उभर रहा है।
नगरीय निकाय चुनाव परिणामों के बाद से ही विधायक गणेशराज बंसल और उनके करीबी समर्थकों के खिलाफ प्रशासन व पुलिस का शिकंजा कसता चला गया था। स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब पुलिस ने विधायक के खिलाफ 23 साल पुराने एक मामले में कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, 15 दिन के भीतर ही हाईकोर्ट ने उस मुकदमे को निरस्त कर दिया, लेकिन इसके बावजूद उनके व समर्थकों पर दर्ज मुकदमों की झड़ी नहीं थमी।
इस बढ़ते कानूनी दबाव के बीच विधायक अपने राजनीतिक वजूद और समर्थकों के कुनबे को बचाने के लिए सरकार से संवाद का रास्ता तलाश रहे थे। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने पूर्व में जयपुर स्थित बीजेपी प्रदेश मुख्यालय जाकर प्रदेशाध्यक्ष के समक्ष अपना पक्ष रखने की कोशिश की थी, मगर उस समय उन्हें मिलने का समय नहीं मिला। सूत्र बताते हैं कि इसके बाद पार्टी के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और सरकार के शीर्ष प्रतिनिधियों के साथ विधायक की सीधी बातचीत की जमीन तैयार की, जिसके बाद यह समझौता संभव हो सका।
सूत्र बताते हैं कि सुलह की यह पहल सिर्फ विधायक की मजबूरी नहीं, बल्कि बीजेपी की संगठनात्मक अनिवार्यता भी थी। किसान आंदोलन के दौर के बाद से ही किसान बाहुल्य हनुमानगढ़ जिले के ग्रामीण इलाकों में बीजेपी लगातार रक्षात्मक रुख में रही है। पार्टी का पारंपरिक जनाधार शहरी क्षेत्रों में मजबूत रहा है, मगर ग्रामीण राजनीति में उसे अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है। हालिया नगरीय निकाय चुनावों में भी 8 में से केवल 4 बोर्ड ही बीजेपी बना पाई, जिस पर भी विपक्ष ने सत्ता के खुले दुरुपयोग और जोड़-तोड़ के आरोप लगाए थे।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने हाल ही में जिले को लेकर एक गोपनीय आंतरिक सर्वे कराया था। इस सर्वे के निष्कर्ष बीजेपी नेतृत्व के लिए चौंकाने वाले और चिंताजनक थे। रिपोर्ट में साफ रेखांकित किया गया कि यदि गणेशराज बंसल को पूरी तरह दरकिनार या चुनावी प्रक्रिया से दूर रखा जाता है, तो भी बीजेपी को कोई लाभ नहीं होगा बल्कि इसका फायदा सीधे तौर पर कांग्रेस को होगा। बीजेपी कभी कांग्रेस को मजबूत नहीं देखना चाहेगी, इसी सियासी नुकसान से बचने के लिए संगठन ने अपने तेवर नरम किए और विधायक से हाथ मिलाना ही व्यावहारिक विकल्प समझा।
सूत्रों के मुताबिक, उच्चस्तरीय बैठक में तय फॉर्मूले के अनुसार, सरकार ने विधायक के सामने स्थानीय राजनीति में अपनी जीत सुनिश्चित करने की स्पष्ट शर्तें रखी हैं। मसलन, हनुमानगढ़ जंक्शन और टाउन पंचायत समिति में हर हाल में बीजेपी का बोर्ड बने। जिला परिषद में बीजेपी स्पष्ट बहुमत हासिल करे और पार्टी सिंबल पर जीतकर आने वाले डायरेक्टर को ही जिला प्रमुख बनाया जाए। बदले में विधायक को यह लचीलापन दिया गया है कि वे अपने जिताऊ और वफादार समर्थकों को जिला परिषद डायरेक्टर के लिए बीजेपी के आधिकारिक सिंबल पर चुनाव लड़वा सकते हैं। पार्टी का स्पष्ट संदेश है कि उन्हें किसी भी गुटबाजी से परे केवल ‘जिताऊ और टिकाऊ’ चेहरे चाहिए।
समझौते की खबरों के बीच खुद विधायक गणेशराज बंसल से संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन उनका फोन बंद मिला। वहीं उनके आवास से जानकारी मिली कि वे शहर से बाहर हैं, हालांकि उनके समर्थकों ने बातचीत बेहद सकारात्मक रहने के संकेत दिए हैं।
दूसरी ओर, स्थानीय बीजेपी संगठन अभी इस घटनाक्रम पर फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। बीजेपी जिलाध्यक्ष प्रमोद डेलू ने आधिकारिक पुष्टि से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई औपचारिक सूचना नहीं है, लेकिन यदि शीर्ष नेतृत्व का ऐसा कोई निर्णय होता है और विधायक पार्टी हित में काम करते हैं, तो संगठन पार्टी आदेशों की पूरी पालना करेगा।
कुल मिलाकर, यह सीजफायर जहां विधायक बंसल को मुकदमों की तपिश से राहत दिला सकता है, वहीं बीजेपी के लिए ग्रामीण क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाने का जरिया बन सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि जमीनी स्तर पर बीजेपी के पुराने नेता व कार्यकर्ता इस नए समीकरण को किस रूप में स्वीकार करते हैं और आने वाले चुनावों में यह ‘रणनीतिक दोस्ती’ क्या गुल खिलाती है।





