





रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात बिज्जी री। कुण बिज्जी ? बै ई बिज्जी, जिका ‘बातां री फुलवाड़ी’ रै मिस आपणै लोक री बातां आखी दुनिया तंई पुगाई। बै ई बिज्जी, जिका तपसी दांई आपणी लोककथावां भेळी करणै सारू गांम-गांम ढाणी-ढाणी डबकता रैया, बै ई बिज्जी, जिकां नै साहित्य अकादमी राजस्थानी भासा रो पैलड़ो पुरस्कार दियो, बै ई बिज्जी, जिकां री कहाण्यां माथै बॉलीवुड री चावी ठावी फिल्मां ‘दुविधा’, ‘पहेली’, ‘परिणिति’ अर ‘चरणदास चोर’ बणी अर बै ई बिज्जी जिका नै विद्वान कुंतारा राजस्थान रो सेक्सपियर अर भारतेंदू हरिसचंद्र मानै।
01 सितम्बर नै बां रो जलमदिन है। जे बिज्जी आपणै बिच्चाळै होवता तो आज सौ बरस रा होवता, पण बै तो 2013 में ई सौ बरस ले लिया। अबै तो आपां बां रो जलमसईको मना रैया हां। इणी मौकै बिज्जी नै याद करता थकां चूरू में प्रयास संस्थान री कान्नी सूं 31 अगस्त अर 01 सितम्बर रो मोटो उच्छब राखिज्यो है।
‘भगवान भले दिन दे !’ सूं आपरी कहाण्यां अर बात सरू करणिया विजयदान देथा जिका लाडां कोडां अर सनेव सूं ‘बिज्जी’ री पिछाण राखै, राजस्थानी लोक परम्परा नै आगै बधावणिया आगीवाणां में गिणीजै। बां रो जलम ‘बोरूंदा’ गांव में होयो, जिकै नै बिज्जी रै काम सूं न्यारी ओळखाण मिली। बां रा दादोसा जुगतीदान जी देथा डिंगल काव्य धारा रा ख्यातनांव कवि हा। बां रा जीसा सबलदान जी भी चारणी काव्य परम्परा रा चावा कवि गिणीजै। पछै बिज्जी लारै क्यूं रैवता !
बिज्जी लगैटगै 800 सूं बेसी लोककथावां नै भेळी कर नै पुनर्सृजित करी जिकी 14 न्यारै-न्यारै भागां में ‘बातां री फुलवाड़ी’ रै रूप में छपी अर आपणै सामीं आई। इण संकलन सूं देस दुनिया नै राजस्थानी वात शैली री सबळाई रो ठाह पड़ियो। चावा-ठावा लोककर्मी कोमल कोठारी साथै रळ’र बिज्जी बोरूंदा में रूपायन संस्थान री थरपना करी जठै लोक साहित अर कळावां नै पोखणै रो जबरो काम होयो है। बिज्जी रो रचना संसार देखां तो 21 बरस री उमर में ई बां री पैली हिंदी कविता पोथी ‘ऊषा’ छपी। लेखन अर पठन-पाठन रा रसिया बिज्जी 1959 में मायड़ भासा री सेवा चाकरी रो बीड़ो उठायो जिण में आखी उमर रम्या रैया। लोक कथावां पेटै तो वां रो काम है ई, पण बां री कहाण्यां भी घणी चावी ठावी बणी। बां रा चावा कहाणी संग्रै अलेखूं हिटलर, दुविधा व अन्य कहानियां, चौधराइन की चतुराई, उलझन, अंतराल, सपनप्रिया है। उपन्यासां री बात करां तो महामिलन, त्रिवेणी घणा महताउ है, बां रो अेक जेबी उपन्यास तीडोराव भी है। इण रै अलावा ’राजस्थानी हिंदी कहावत कोष’ जिको आठ भागां में छप्योड़ो है, घणो चावो है। इण संकलन में लगै टगै 1000 कैबतां रा हिंदी माईना बताइज्या है। विजयदान देथा साहित्यिक अर लोक संस्कृति री पत्रिकावां ‘प्रेरणा’, ‘परंपरा’, ‘वाणी’ रा सम्पादक भी रैया। लोक साहित्य अर राजस्थानी भासा में सरावणजोग कारज सारू बां नै 2007 में पदमश्री सम्मान मिल्या। 2012 में बिहारी पुरस्कार सूं सम्मानित होया। कहीजै तो ओ भी है कै विजयदान देथा नोबेल पुरस्कार सारू ई नामित होया हा।
10 नवम्बर 2013 नै बिज्जी सौ बरस पूरा करग्या। पण बै साहित जगत नै अेक इसी थाती सूंप’र गया है जिण रो उजास जुगां जुगां तंई रैवैला। बिज्जी नै साचा सरधा पुसब चाढणै रो अेक तरीको ओ भी है कै हेत री हथाई में आज बिज्जी री जगचावी पोथी ‘बातां री फुलवाड़ी’ सूं अेक चावी कथा ‘अेक चिड़कली री अटकळ’ बांचो-
अेक ही चिड़ी। वा नित हरमेस राजा रै बाग में मीठा-मीठा फळ खावती। घणो ई बिगाड़ करती। राजा हैरान परेसान। घणाई कळाप करिया पण चिड़ी फंदै में नीं फसी। संजोग री बात बा अेकर लीलै रेसम रै झीणै जाळ में पजगी। सिपाही उणनै पकड़नै राजा कन्नै लेयग्या। राजा आपरै दोनां हाथां में उणनै सैंठी पकड़’र कैयो-
‘निकामी चिड़कली ! तू म्हारै बाग रो घणो उजाड़ करियो, अबै थान्नै बाज रै पिंजरै में घलवाय’र जियामौत मरवासूं, घणा दिन होग्या तन्नै मौज माणती नै…!’
चिड़ी ही तो छोटी पण इदक चतुर। वा मौत रै डर सूं चळ-विचळ नीं होई। राजा नै निरांत सूं मीठी वाणी में कैयो-
‘मरणौ तेवड़नै ई म्है थारै बगीचौ में इतरो उजाड़ करियो। इण दुनिया में कुण अमर होय नै आयो है। म्हानै मारण वाळो बाज अर मरवावण आळा राजा किसा अमर रैयसी ! पछै म्हारै नैनै जीव रो कांई फिकर। राजा म्हैं मरण नै त्यार हूं। पण मरियां सूं पैली पिराचित सरूप थान्नै चार अमोलक बातां बतावणी चावूं। म्हूं थारो घणो उजाड़ करियो, अबै मरती बेळा थारो मंगळ करणो चावूं। आ म्हारै पेटै री मंसा है, थूं म्हारै माथै भरोसा कर !’
राजा नै तो उण चिड़कली नै मरावण री घणी अंतावळ ही, बोल्यो-‘नैनी अबूझ चिड़कली ! तू म्हानै अठी-उठी री बातां में क्यूं भरमावै ? म्है भवै ई थारी बातां में नीं आवूं, कैणो होवै जिको फुरती सूं कैय, अंतकाळ सूं पैली तन्नै इत्ती माया बगसूं हूं।’
चिड़ी कैयो- ‘राजा, अे फोरी पतळी बातां नीं है, थारै राजपाट में घणी काम आवैला। थूं ध्यान देय’र सांभलै। जीव नै थोड़ी ताळ ठाणै राख, म्है तो थारी वखड़ी में हूं, जिण बगत चावै मार न्हाखजै। इण बात रो इत्तो विचार क्यूं करै ! सीख री बातां बतायां पछै म्हूं आप ई जीवणो नीं चावूं। लै पैली बात सुण, अेकर बखड़ी में आयां पछै दुस्मीं नै भूल सूं ई पाछो जीवतो नीं छोड़णौ !’
राजा कैयो- ‘आ सीख तो म्हूं जाणूं हूं, तन्नै भवै ई नीं छोडूं। अबै दूजी बात कैय !’ जद चिड़ी कैयो-‘दूजी बात आ है कै अणहोणी माथै कदै पतियारो नीं करणो ! पतियारो करियां अंत पिछताणो पड़ै !’
राजा नै आ बात दाय आई। बोल्यो-‘नैनी चिड़कली ! थारी आ सीख तो घणी सिरै। बातां तो थारी नामीं पण करणी घणी माड़ी। तूं म्हारै बगीचौ रो सित्यानास कर न्हाख्यो। तन्नै मारूं तो म्हारो काळजो ठरै। अबै फुरती सूं तीजी बात कैय !’
चिड़ी कैयो-‘राजा ध्यान देय नै सुणजै, तीजी सीख आ है कै बीत्योड़ी बात रो पिछतावो नीं करणौ। पिछतावो करियां कीं हाथ नीं लागै। जीव कळपै सो इदकाई में…। राजा नै आ सीख ई मन भावती लागी, कैयो-‘अबै चौथी बात बता, पछै म्हूं म्हारी मन जाणीं करूं।
तद चिड़ी कैयो- ‘आ चौथी बात थारै सारू लाभकारी है। म्हारै मरियां थान्नै अमोलक खजानो हाथ आवैला। म्हारै पेट में ढेलड़ी रै इंडै जेड़ा पांच अमोलक हीरा है। अेक अेक हीरो अरबां रौ। आं हीरां सूं थारै खजानै में कदैई तोटो नीं आवैला। पण किणी दूजै रै हाथ सूं मरियां वै हीरा हाथ नीं आवैला। म्है खुद म्हारी मरजी सूं प्राण त्याग’र थारै पगां में आय पड़ूंला। म्हानै सायंती सूं अेकर रूंख माथै बैठण दे, म्हैं धूप ध्यान कर नै वै पांचू हीरा थान्नै सूंप’र जांवूला। किणी रै आगै ई आ बात मत करजै।’
राज अंत लोभी हो, हीरां री बात सुण नै उण रो जीव डिगियो तो अेहड़ौ डिगियो कै उण चिड़कली नै छोड़ दी। चिड़ी फुदक नै आंबै री डाळी माथै जा बैठी। राजा बेताब होय नै कैयो- ‘म्हारी रूपाळी नैनी चिड़कल ! फुरती कर, थारै मांयला अमोलक हीरा हाथ आयां ई म्हानै झख पडैला।
चिड़ी आंबै री डाळ माथै बैठी जोर सूं हांसी। हांसती-हांसती बोली-’राजा ! म्है तो जाणती थूं इत्तो मोटो राज संभाळै, थारै मांयनै कीं नै तो कीं अकल व्हैला इज पण थारै मांयनै तो अकल रा दो दाणां ई कोनी, थूं तो निपट अबूझ ढोर री गळाई है। म्है चिड़ी जात री होय नै थारै हाथां में आय’र छूटगी। अर थूं राजा होय नै म्हानै बखड़ी में आयां पछै छोड दी। म्हारी चार बातां थारै हियै तो नीं झरी नीं, सुणतां सुणतां ई पातरग्यो। म्हैं थान्नै अबारू अबारू ई कैयो, ‘बखड़ी में आयोड़ै दुस्मीं नै भवै ई नीं छोडणो, अर थूं म्हानै ई छोडदी। थारै जिसो मूरख फेर ई कोई इण धरती पर होवैला !’
‘म्है थान्नै दूजी सीख दी, ‘अणहोणी बात माथै भरोसो नीं करणो अर थूं सांपरदै भरोसो करियो। कीं न कीं तो मगज लड़ावतौ। मूरखां रा राजा, चिड़ी रै पेट में ढेलड़ी रै इंडै जेड़ा पांच हीरा किंकर खट सकै ! थोड़ो घणो तो विचार करियो होवतो। इत्तो खजानो होवतां ई थूं मंगतै गळाई फट हाथ मांड दियो। जाणै इण सगळी माया नै छाती माथै धर नै साथै ले जावैला। म्है थान्नै तीजोड़ी सीख दीन्ही ही कै बीत्योड़ी बात माथै पिछतावो नीं करणो। पछतावो करियां कीं हाथ नीं आवै। अबै इण सीख नै मान, थारै कीं हाथ नीं आवैला। थूं म्हानै छोडणै री मूरखता करी अबै पिछतावै री मती कर। फालतू जीव कळपैला, राजी खुसी आपरै म्हलां में जा।’
राजा रो उतरयोड़ो मूंडो देख नै चिड़ी फेर कैयो- ‘चीकणै घड़ै पाणी री छांट नीं लागै, थान्नै सीख देवणी बिरथा है। थारै मरजी आवै बित्तो कळप, धाप-धाप नै पछता, म्है तो आ उडी।
अर चिड़ी तो फर-फर करती उडगी अनै राजा हाथ मसळतो उडती चिड़कली कान्नी चितबंगियो होवै ज्यूं भाळतो रैयो। उण रै नांव सूं सिंघ खोड़ा होवता हा, पण नैनी सी चिड़कली उणरी बखड़ी में आयोड़ी छूटगी अर वो उण रो कीं नी बिगाड़ सक्यो। फेर माजणो पड़यो जिको इदकाई में….।
बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं








