




रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात लक्खणां रै लाडां री। कम तो लक्खणां री लाड्यां ई कोनी पण भूंड तो लाडां रै ई पांती आवै। घणी चौधर तो बे ई करै ! कुण है अे लक्खणां रा लाडा अर क्यूं भूंडीजै, आओ पड़ताल करां। अेक दूहो है-
बारा कोसां बोली पलटै, बनफळ पलटै पाक्यां
बरस छतीसां जोबन पलटै लक्खण नीं पलटै लाखां
अबै लक्खण तो लक्खण है, बै कद बदळीजै ! अर जे बदळीजै तो बान्नै लक्खण कैवै ई कुण। लक्खण दो भांत रा होवै, आछा अर माड़ा। आछी संगत सूं आछा लक्खण, माड़ी सूं माड़ा। लक्खण लिंग भेद नीं करै, लुगाई जेकर सूरबायरी है तो आदमी होवै लक्खणां रो लाडो। अर जे कठैई घर में धणी लुगाई दोनूं ई लक्खणां रा लाडा है, तो फेर बठै रामजी ई भली करै तो करै, नीं पछै देखो नितुकै नवा कोतक, नवा तमासा…! उण घर रै टाबरां नै दोस ई कांई, देखसी बियां ई तो करसी।
कोई इणी कुबाण, जिकी आपनै नीचो दिखा सकै, उण सूं बेगो खेड़ो छुड़ावणो चाहीजै। पुड़िया खावणआळां नै ई देखलो, थूक-थूक आखी धरती रा कूणा कचूणा तंई लाल कर न्हाख्या है बेटी रै बापां। जाबक ई नीं संकै, कोई बान्नै पूछणियो होवै, लाडी क्यूं आपरै बाप रो नांव काडो ! नीं थां सूं सावळ बोलीजै, नां थारा मूंडो पूरो खुलै, दांतां री बत्तीसी खोइजगी जिकी न्यारी… अर कैंसर होयां पछै थारी दुरगति होवणै में सक ई कांई…। पण फेर ई ‘ऊंचा लोग ऊंची पसंद’ री उडारी भरता अे लक्खणां रा लाडा कुबाण नीं छोड़ै। सागी रंग ढंग दारूड़ियै लाडां रा लाधै, पण लक्खण नीं छूटै। डोडा, अफीम अर पोस्त पीवणियां री बात तो करां ई के…!
कई लक्खणां रै लाडां नै देखां, बात-बात में गाळ काडबो करै। बात पछै करै पैली गाळ ठरकावै, मा-भैण अेक कर राखी है आं धणियां ! बां रै सारू गाळ ‘अनुप्रास’ है, भासा रो च्यवनप्रास है। कई लिखारां नै ई आ कुबाण है, बेटा कहाणी कविता में ई गाळ काडता नीं संकै, ठरको ओ राखै, आ तो लोक री भासा है, लिखणी ही पड़ै। अरे गैलसप्पो, साहित लोक नै सुधारै, संस्कारित करै, उण नै सांवठो करै…अर थे ! कांई कर रैया हो ? बां भोळै स्याणां नै कुण समझावै !
लक्खणां पर पूरो ग्रंथ लिख्यो जा सकै। के आदमी के लुगाई, कुबाण रो छेड़ो ई नीं। चप्पलां फटकारणै सूं लेय’र कालर खावणिया तकात लाध जिसी आपनै। चुगली चांटै रा कारीगर तो गळी-गळी पड़्या है जिका आपरी कारीगरी सूं सिर फुड़ाय देवै। तिल रो ताड़ बणावणिया ई घणाई लाधै। राड़ नै बुझावण में नीं, उण नै बधावण में मजा लेवणिया आपां रोज देखां ई हां। कठैई कुटाई चालती होवै, तो हाथ हळका करणिया मतैई आ ढुकसी, बान्नै बात सूं कीं लेवणो देवणो ई कोनी, बस बैवती गंगा में हाथ धोवण री कुबाण है, बा कियां छूटै !
लक्खणां पेटै बात चेतै आई, कै भाईजी नै बाळपणै सूं ई कुबाण पड़गी हाथ री सफाई दिखाणै री। इस्कूल में संगळियां रै बस्तै सूं पिलसण रबड़ सरकावता होळै-होळै आनी दुआनी नै ई धार देवण लाग्या। कोई मौको नीं छोडता, जद कद पकड़िजता तो सेवा ई होवती। दो-तीन बिरियां मास्टरजी ई जरकायो, पण बाण तो बाण होवै, बा मार सूं कद छूटै।
मायत बरजै, कीं समझावै अर चोखा संस्कार देवै तो भलंई…। पण मायत ई तो पछै बां रा ई, बै सूल कठै सूं होवता। कैबत है, ‘जिसी ईंट बिस्याई खोरा, घणा नीं तो थोड़ा थोड़ा’ पण इण कैबत नै उल्टी करां तो दूजो रूप सामीं आवै, ‘जिस्या खोरा बिसी ईंट, जिस्यो लट्ठो बिसी छींट’।
अेकर ढळती सी सिंझ्या मेें भाईजी रै रिस्तै सारू छोरी आळा घरै आयोड़ा हा। भाईजी स्यान सकल रा तो घणाई सरूप है, देखताई दाय आयग्या। परसंग्यां सलाह करी, दिनुगै कीं रिपियो नारेळ देय’र जिस्यां। गरमी रा दिन हा, जीमा जूठै पछै सग्गा चौकी पर हथाई घोटण लाग्या। कांई ठाह कद मांखर भाईजी तो तिबारी में बड़्या अर खूंटी टंग्योड़ै अेक चोळै री जेब साफ करग्या। अंधारै में निगै ई नीं करी, कै चोळो छोरी रै बाप रो है।
दिनुगै न्हावा धोई रै पछै सग्गै चोळो सम्भाळ्यो तो ठाह पड़ियो, बेटी आ के बणी ! कैवां ई तो कुण नै ! इत्तै में भाईजी रा जीसा बोल्या-
‘जोसी, रिपियै नारेळ आळो सरेव कर लेवता, अबार मुहुर्त कीं सावळ बतावै।’
जोसी लाई कांई कैवै, सरेव तो कोई करग्यो, हजार पांच रो फदीड़ लागग्यो। बण हौळसीक सागै आयोड़ै आपरै साळै नै बात बताई। इयां कियां…आ थोड़ी होवै…कैवता ई कोछा लागस्यां…बात नै ढाबो। खुसर-पुसर सुण’र भाईजी रा जीसा बूझ्यो। सग्गै रै साळै संकतै सै बात बताई, जीसा रा कान खुस’र हाथ में आयग्या, आपरी उलाद छान्नी थोड़ी होवै, मन ई मन गाळ सरकाई, गईवाळ, अठैई पूगग्यो के !!
रिस्तो तो के होणो हो, सग्गां रै फदीड़ लागग्यो अर भाईजी रै बेहिसाब रा गदीड़… बस इत्ती बात है, आगै आप जाणीजाण हो, के होयो होसी।
लक्खणां पेटै आपणै लोक में भोत सी सीख दिरीजी है। दो दूहो बांचो दिखाण-
लक्खण बिना नीं लख सकै, माणस रो मिजाज
बाणी बरणौ, बोलणो, साचा लक्खण समाज
कुल दीपै लखणां थकी, औगुण थकी विणास
जाकै साचा लखण है, जग में पावै जास
हथाई में बातां जद गेड़ चढै ठमै ई कोनी, पण बगत रो कैवणो है, बगत रैवता चेतो ! आज री हथाई रो सार ओ है कै आपरा लक्खण आप संवारो, दूजा नै कोई अड़ी कोनी। बोलण सूं पैली दस बिरियां सोचणो। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार हैं







