




राज कुमार सोनी
दूसरी पातशाही श्री गुरु अंगद देव जी, जिन्हें भाई लहना जी के नाम से भी जाना जाता है, का सम्पूर्ण जीवन सेवा, समर्पण और कठोर आध्यात्मिक अनुशासन का अद्भुत उदाहरण रहा। श्री गुरु नानक देव जी ने उन्हें गुरु गद्दी के योग्य सिद्ध करने के लिए सात अत्यंत कठिन परीक्षाओं से गुज़ारा, जिन्हें ‘जतपंसे’ कहा जाता है।
पहली परीक्षा में गुरु नानक देव जी ने कीचड़ से सनी घास-फूस की एक गंदी गठरी सिर पर उठाने का आदेश दिया। भाई लहना जी ने अपने रेशमी वस्त्रों की परवाह किए बिना तुरंत आज्ञा का पालन किया। दूसरी परीक्षा में गुरु जी ने एक कटोरा गंदे नाले में फेंककर उसे निकाल लाने को कहा। जहां उनके पुत्र श्री चंद जी और लखमी चंद जी ने मना कर दिया, वहीं भाई लहना जी नाले में उतरकर कटोरा निकाल लाए।
इसी प्रकार धर्मशाला में मरी हुई चुहिया को बाहर फेंकने का कार्य, जिसे उस समय हेय माना जाता था, उन्होंने सहर्ष किया। एक तूफानी रात में गुरु जी ने उन्हें करतारपुर की धर्मशाला की टूटी दीवार रात में ही पुनः बनाने का आदेश दिया, जिसे उन्होंने बिना किसी संकोच के पूरा किया।
एक अन्य परीक्षा में गुरु नानक देव जी ने कहा कि कीकर (कांटेदार) के पेड़ से फल और मिठाइयां गिर रही हैं, उन्हें इकट्ठा करो। जब सभी लोग चकित रह गए, तब भी भाई लहना जी ने आज्ञा मानते हुए पेड़ को हिलाया। कड़ाके की सर्द रात में गुरु जी ने उन्हें रावी नदी के तट पर जाकर गंदे कपड़े धोने का आदेश दिया, जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार किया।
अंतिम और सबसे कठिन परीक्षा में गुरु नानक देव जी ने एक चादर से ढके मृत शरीर की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘इसे खाओ।’ भाई लहना जी ने निर्भय होकर केवल इतना पूछा, ‘स्वामी, मैं किस ओर से प्रारंभ करूं?’ यह उनके पूर्ण समर्पण और विश्वास की पराकाष्ठा थी। इन सभी परीक्षाओं में सफल होने के बाद गुरु नानक देव जी ने उन्हें अपना ‘अंग’ घोषित किया, ‘लहना’ से ‘अंगद’ नाम दिया और गुरु गद्दी सौंप दी।
श्री गुरु अंगद देव जी ने पंजाबी भाषा की वर्णमाला को सुव्यवस्थित कर गुरुमुखी लिपि को एक आधिकारिक और मानक रूप प्रदान किया। उन्होंने गुरु नानक देव जी की वाणी को लिपिबद्ध कराया तथा स्वयं 63 श्लोक (शब्द) रचे, जो आगे चलकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हुए।
उन्होंने खडूर साहिब को गुरुमत प्रचार का प्रमुख केंद्र बनाया और अपने जीवन के अंतिम 13 वर्ष वहीं व्यतीत किए। शिक्षा के महत्व को समझते हुए उन्होंने बच्चों के लिए विद्यालय स्थापित किए तथा युवाओं के शारीरिक विकास और अनुशासन हेतु ‘मल-अखाड़ा’ परंपरा की शुरुआत की।
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा प्रारंभ की गई लंगर प्रथा को श्री गुरु अंगद देव जी ने एक सुदृढ़ संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। उनकी पत्नी माता खीवी जी ने लंगर व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो उस काल में महिलाओं की सामाजिक सहभागिता और नेतृत्व का सशक्त उदाहरण है।
एक अवसर पर मुगल बादशाह हुमायूं, शेरशाह सूरी से पराजित होकर गुरु जी के पास आया। उस समय गुरु जी समाधि में लीन थे, इसलिए हुमायूं को प्रतीक्षा करनी पड़ी। अहंकारवश उसने तलवार निकाल ली। तब गुरु जी ने निर्भीक स्वर में कहा, ‘यह तलवार अपनों के सामने तो निकल रही है, युद्धभूमि में कहां थी?’ यह सुनकर हुमायूं को अपनी भूल का बोध हुआ और उसने गुरु के चरणों में सिर रखकर क्षमा मांगी।
गुरु अंगद देव जी ने अपने पुत्रों के स्थान पर सेवा, विनम्रता और समर्पण के आधार पर भाई अमरदास जी को अपना उत्तराधिकारी चुना, जो आगे चलकर सिख पंथ के तीसरे गुरु बने। श्री गुरु अंगद देव जी का जीवन ‘सेवा’ और ‘सिमरन’ का अनुपम आदर्श है। आज उनके प्रकाश पर्व के पावन अवसर पर समस्त साध संगत को लख-लख बधाइयां।
-लेखक भाजपा पर्यावरण प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश मंत्री हैं





