



डॉ. जितेंद्र अग्रवाल
मूत्राशय पेट के निचले भाग में स्थित एक लचीला, थैलीनुमा अंग है, जिसका मुख्य कार्य गुर्दों द्वारा छाने गए मूत्र को कुछ समय के लिए संचित रखना है। जब मूत्राशय की भीतरी दीवार की कोशिकाएँ अनियंत्रित रूप से विभाजित होकर बढ़ने लगती हैं, तो यह स्थिति मूत्राशय का कैंसर कहलाती है। यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, परंतु साठ वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों और विशेष रूप से पुरुषों में इसकी संभावना अधिक देखी जाती है। यदि प्रारंभिक अवस्था में ही इसकी पहचान कर ली जाए, तो आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों की सहायता से इसका सफल और प्रभावी उपचार संभव है।
मूत्राशय के कैंसर का सबसे प्रमुख और आम संकेत मूत्र में रक्त आना है, जिसे चिकित्सकीय दृष्टि से अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
पेशाब का रंग हल्का गुलाबी, चमकीला लाल या कभी-कभी गहरा भूरा दिख सकता है। कई बार रक्त की मात्रा इतनी सूक्ष्म होती है कि वह नंगी आँखों से नहीं दिखती और केवल प्रयोगशाला जाँच में ही सामने आती है।
कई बार रक्तस्त्राव एक बार होकर अपने आप रुक जाता है। इसे समस्या का समाधान न समझें; दर्द न होने पर भी मूत्र में रक्त आना चिकित्सकीय परीक्षण की मांग करता है। महिलाओं के संदर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक होता है कि रक्तस्त्राव मूत्र मार्ग से है अथवा जननांग से।
बार-बार पेशाब की इच्छा होना, अचानक तेज वेग महसूस होना, विसर्जन के समय जलन या चुभन, रात में बार-बार उठना, धार का कमजोर होना तथा बार-बार मूत्र संक्रमण होना।
रोग के बढ़ने पर पीठ के निचले हिस्से या कमर में लगातार दर्द, बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन घटना, अत्यधिक थकान, भूख न लगना और पैरों में सूजन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये सभी लक्षण केवल कैंसर के कारण ही नहीं होते। पथरी, सामान्य संक्रमण अथवा पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) की वृद्धि भी ऐसे ही लक्षण उत्पन्न कर सकती है।
यद्यपि किसी व्यक्ति में कैंसर का सटीक कारण निर्धारित करना कठिन है, किंतु कुछ कारक इस बीमारी के खतरे को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देते हैं, तंबाकू और धूम्रपान इस रोग का सबसे बड़ा जोखिम कारक है। तंबाकू में मौजूद विषैले रसायन रक्त में घुलकर गुर्दों द्वारा छाने जाते हैं और मूत्र के माध्यम से मूत्राशय में पहुँचते हैं। मूत्राशय की आंतरिक सतह जब लंबे समय तक इन घातक रसायनों के संपर्क में रहती है, तो कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का जोखिम बढ़ जाता है। रंग, वार्निश, छपाई, धातु, चमड़ा और पेट्रोलियम उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले रसायनों के दीर्घकालिक संपर्क में रहने वाले कर्मियों में यह खतरा बढ़ जाता है।
पूर्व चिकित्सा इतिहास पूर्व में किसी अन्य रोग के लिए ली गई विशिष्ट रासायनिक औषधियाँ (कीमोथेरेपी) या पेल्विक क्षेत्र पर दी गई विकिरण चिकित्सा (रेडिएशन) भी इस जोखिम को बढ़ा सकती है। बढ़ती आयु के साथ शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता घटने और अनुवांशिक कारणों से भी संवेदनशीलता बढ़ जाती है। रोग की पहचान और परीक्षण संदेह होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक विभिन्न परीक्षणों के माध्यम से बीमारी की पुष्टि करते हैं, पेेशाब की सामान्य जाँच के अलावा कोशिका परीक्षण (साइटोलॉजी) किया जाता है, जिससे असामान्य या घातक कोशिकाओं की पहचान होती है।
सोनोग्राफी (अल्ट्रासाउंड): इस सरल तकनीक से मूत्राशय और आसपास के अंगों की संरचना तथा किसी संभावित गांठ की उपस्थिति का आकलन किया जाता है।
सिस्टोस्कोपी: यह सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। इसमें एक अत्यंत पतली, कैमरे से युक्त नली को मूत्र मार्ग से अंदर डालकर मूत्राशय की भीतरी परत का सीधा और स्पष्ट दृश्य देखा जाता है।
ऊतक परीक्षण (बायोप्सी): यदि कोई संदिग्ध उभार या गांठ दिखाई देती है, तो उसका छोटा सा नमूना लेकर सूक्ष्मदर्शी द्वारा जाँच की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर शल्यक्रिया द्वारा गांठ को काटकर निकाला जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बीमारी कितनी गहरी है।
सीटी स्कैन अथवा एमआरआई: जब कैंसर की पुष्टि हो जाती है, तब यह जानने के लिए कि रोग मूत्राशय की दीवारों से बाहर या शरीर के अन्य भागों में तो नहीं फैला, विस्तृत स्कैनिंग की जाती है।
उपचार की विधियाँ
मूत्राशय कैंसर का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी केवल आंतरिक सतह तक सीमित है या मांसपेशियों की परत तक पहुँच चुकी है।
यदि कैंसर सतह तक सीमित है, तो इसे मूत्र मार्ग के माध्यम से ही शल्य उपकरण द्वारा निकाल दिया जाता है। इसके पश्चात बीमारी के दोबारा उभरने से रोकने के लिए मूत्राशय के भीतर विशेष औषधीय घोल या रोग-प्रतिरोधक टीके दिए जाते हैं। यदि कैंसर मूत्राशय की गहरी मांसपेशियों तक पहुँच गया हो, तो व्यापक उपचार की आवश्यकता होती है। इसमें रासायनिक चिकित्सा (कीमोथेरेपी), प्रतिरक्षा चिकित्सा (इम्यूनोथेरेपी), लक्षित दवाएँ अथवा संपूर्ण मूत्राशय को निकालने की शल्यक्रिया की जाती है।
हालांकि हर स्थिति में इस बीमारी को रोकना संभव नहीं है, परंतु जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाकर जोखिम को काफी हद तक घटाया जा सकता है। धूम्रपान और तंबाकू का पूर्ण त्याग करें, कार्यस्थल पर सुरक्षा उपकरणों का उपयोग सुनिश्चित करें, पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल पिएं और संतुलित आहार लें।
मूत्र में रक्त आना कभी भी सामान्य नहीं होता। इसे केवल ‘गर्मी’ या ‘साधारण संक्रमण’ मानकर नजरअंदाज न करें और बिना चिकित्सकीय परामर्श के घरेलू उपचार में समय नष्ट न करें। समय पर की गई जाँच ही जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है।
-लेखक जाने-माने यूरोलॉजिस्ट हैं और एसएलजी हॉस्पिटल नजदीक राजकीय जिला अस्पताल हनुमानगढ़ टाउन से संबद्ध हैं








