


गोपाल झा.
स्वामी विवेकानंद का नाम आते ही आंखों के सामने एक तेजस्वी संन्यासी की छवि उभरती है, गेरुआ वस्त्र, प्रखर दृष्टि और ओजस्वी वाणी। भारत का शायद ही कोई बच्चा हो, जिसने उनके नाम से परिचय न पाया हो। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि स्वामी विवेकानंद जैसा बनो, उनके जैसा सोचो, उनके जैसा देश से प्रेम करो। परंतु प्रश्न यह नहीं है कि हम उन्हें पहचानते हैं या नहीं, प्रश्न यह है कि हम उन्हें समझते कितना हैं। उनके विचारों को आत्मसात कितना करते हैं। स्वामी विवेकानंद को अक्सर हिंदुत्व का बड़ा प्रचारक कहा जाता है। शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण आज भी भारतीय चेतना का गौरवशाली अध्याय है। उस मंच से उन्होंने जिस प्रकार हिंदुत्व की व्याख्या की, उसने पूरे विश्व को चकित कर दिया। हिंदुत्व की ऐसी उदार, मानवीय और विराट तस्वीर सामने आई, जो संकीर्ण सीमाओं को तोड़ती हुई मानवता के शिखर तक पहुंचती थी। पर दुर्भाग्य यह है कि आज उसी हिंदुत्व को संकीर्णता, कट्टरता और असहिष्णुता के रंग में रंगने की कोशिशें हो रही हैं।
आज हम देखते हैं कि भगवा वस्त्र धारण कर लेने मात्र से कोई स्वयं को धर्म का ठेकेदार घोषित कर देता है। मंचों से ऊंचे स्वर में धर्म की बातें होती हैं, लेकिन भीतर राजनीति की धूर्त चालें चलती हैं। धर्म सेवा का मार्ग होना चाहिए, पर वह सत्ता की सीढ़ी बना दिया गया है। नतीजा यह कि हिंदू धर्म के अनुयायी भी हिंदुत्व पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे हैं। यह स्थिति न हिंदुत्व के हित में है, न समाज के।
ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद को पढ़ना, समझना और महसूस करना और भी जरूरी हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि हिंदुत्व कभी संकीर्ण नहीं हो सकता, कभी असहिष्णु नहीं हो सकता और कभी मानवता का विरोधी नहीं हो सकता। उनके लिए हिंदुत्व का अर्थ था, कण-कण में ईश्वर का वास, नर में नारायण की भावना और प्रत्येक जीव में उसी परम सत्ता की झलक। यह दृष्टि विभाजन नहीं करती, यह जोड़ती है। यह घृणा नहीं सिखाती, करुणा जगाती है।
स्वामी विवेकानंद कहते थे कि हर मनुष्य के भीतर दिव्यता है। आत्मा अनंत है, अमर है और शाश्वत है। हिंदू धर्म का उद्देश्य इसी दिव्यता से परिचय कराना है। मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्ति से जोड़ना है। उन्होंने गर्व के साथ कहा था कि हिंदू धर्म वह भूमि है, जिसने न केवल सहिष्णुता सिखाई, बल्कि सभी धर्मों की स्वीकृति भी दी। यह कथन केवल धार्मिक उदारता नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक चेतना का प्रमाण है।
शिकागो सम्मेलन में उन्होंने कहा था, ‘मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने संसार को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया।’ यह वाक्य हिंदुत्व के विराट स्वरूप की उद्घोषणा है। यहां हिंदुत्व किसी एक संप्रदाय का वर्चस्व नहीं, बल्कि समूची मानवता का आलिंगन है। लेकिन आज, जब दूसरे धर्मों की कमियां गिनाकर स्वयं को बड़ा साबित करने की होड़ मची है, तब यह सवाल स्वतः उठता है, क्या यही वह हिंदुत्व है, जिसकी कल्पना स्वामी विवेकानंद ने की थी?
स्वामीजी सांप्रदायिक कट्टरता के प्रखर आलोचक थे। उन्होंने चेतावनी दी थी कि कट्टरता ने कई बार इस धरती को रक्त से रंगा है और कई सभ्यताओं को मिटा दिया है। उनका विश्वास था कि मानव समाज को उन्नत करना है तो ऐसी सोच को त्यागना ही होगा। कितनी दूरदर्शिता थी उनमें? उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था कि धर्म के नाम पर सत्ता की लालसा कितनी विनाशकारी हो सकती है।
उनके लिए धर्म केवल पूजा-पाठ या ध्यान तक सीमित नहीं था। उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग, तीनों को जीवन से जोड़ा। वे कहते थे कि ईश्वर की सच्ची पूजा दीन-दुखियों की सेवा में है। ‘जीव सेवा ही शिव सेवा है’, यह वाक्य हिंदुत्व की आत्मा को परिभाषित करता है। जहां सेवा है, वहीं ईश्वर है। जहां करुणा है, वहीं धर्म है।
स्वामी विवेकानंद ने वेदांत को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर देखा। उनके अनुसार हिंदू धर्म केवल परंपराओं का बोझ नहीं, बल्कि तार्किक, वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण जीवन दर्शन है। उन्होंने मानवता की सेवा को ही ईश्वर की आराधना माना। यही कारण है कि वे करोड़ों दिलों में बसते हैं।
आज जब हम उनका जन्मदिवस मनाते हैं, तब केवल उनके प्रसिद्ध वाक्यों को दोहराना पर्याप्त नहीं। यह समझना जरूरी है कि ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ कहने से पहले यह जान लें कि हिंदुत्व है क्या। अगर हमने हिंदुत्व को करुणा, सहिष्णुता, सेवा और समभाव के रूप में समझ लिया, तो निश्चय ही हम सच्चे अर्थों में स्वामी विवेकानंद के अनुयायी कहलाने योग्य होंगे। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं




